‘बादलों में बारूद’ पर एक दृष्टि
- श्रीनिवास पंवार एवं अनिता रानी
बीज शब्द : पहाड़, संस्कृति, बुद्ध, विस्थापित तिब्बती, पर्यावरण, इतिहास, जनजाति, बारूद, जंगल, उदारीकरण, पूर्वोत्तर भारत।
मूल आलेख : मधु कांकरिया का जन्म कलकत्ता में (1957) हुआ, उनके कई उपन्यास और कहानी संग्रह प्रकाशित हैं। उपन्यासों में 'पत्ताखोर', 'सेज पर संस्कृत', 'ढलती साँझ का सूरज' चर्चित रहे हैं। ‘चिड़िया ऐसे मरती है', 'युद्ध और बुद्ध', 'जलकुम्भी' आदि उनके प्रमुख कहानी संग्रह हैं। ‘बादलों में बारूद' नाम से उन्होंने यात्रा-वृत्तांत भी लिखा है। ‘मेरी ढाका डायरी’ को भी उनका यात्रा-वृतांत माना जाता है। यात्रा-साहित्य एक नवीन विधा है और इसके विकासात्मक अध्ययन के क्रम में यह तथ्य सामने आता है कि यात्रा-साहित्य लेखन में पुरुषों का वर्चस्व रहा है। एक स्त्री का यात्रा-वृतांत और उसका अध्ययन, दुनियां को अलग दृष्टि से देखने के कारण भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अपनी पुस्तक ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ में राहुल सांकृत्यायन स्त्री घुमक्कड़ी पर बात करते हैं “यदि देश की तरुणियाँ भी घुमक्कड़ बनने की इच्छा रखें, तो यह खुशी की बात है।...जहाँ स्त्रियों को अधिक दासता की बेड़ी में जकड़ा नहीं गया, वहाँ की स्त्रियाँ साहस-यात्राओं से बाज नहीं आतीं।”[i]
‘बादलों में बारूद’ में कुल नौ अध्याय है। हर अध्याय एक नई यात्रा का वर्णन करता है। पहला अध्याय ‘जंगलों की ओर’ है जिसमें लेखिका झारखंड के जंगलों की उसमें रहने वाले लोगों के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति पर लिखती हैं। मधु कांकरिया की दृष्टि आदिवासियों के घरों पर पड़ती है, वो देखती हैं कि लकड़ियों के बीच रहने वालों के घरों में लकड़ी की एक कुर्सी भी नहीं है और इनके जंगलों से जाने वाली लकड़ियों से लोग आलीशान चीजें बनवाते है। जंगलों में रहने वाले लोग भूखे भले रह जाए पर उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है। ये लोहा बनाते है पर इनके घर ना लोहे का कोई बर्तन है, ना स्टील का वे आज भी मिट्टी के बर्तनों पर आश्रित है “ये दिन भर बॉक्साइट उत्खनन करते है, पर इनके घरों में आपको एल्युमिनियम के बर्तन नहीं मिलेंगे, अधिकतर घरों में अभी भी मिट्टी की हंडियाँ है”।[ii]
उनकी संस्कृति के सारे पर्व त्योहार कृषि संस्कृति पर आधारित है। आदिवासी अपने परम्परागत धंधे कृषि, ग्रामीण उद्योग, हस्त कारीगरी, ग्रामीण कला एवं शिल्प से दूर हटते हुए विकास के नाम पर तेजी से मजदूर में तब्दील होते जा रहे हैं क्योंकि बाजार का चरित्र बदल रहा है। देश में उदारीकरण के खुलते दरवाजों ने विकास के देशजबोध को कुचल डाला था। आदिवासियों ने उदारीकरण के बाज़ारवाद से हारकर पारंपरिक लोहा बनाना बंद कर दिया “जिस विधि से हम लोग लोहा बनाते थे वह थोड़ा महंगा पड़ता था, अब बाजार में सस्ता लोहा मिलने लगा है, हमारा लोहा बिकना बंद हो गया।”[iii]
दूसरी यात्रा विवरण का नाम ‘पहाड़ पलामू और आग’ है। इस यात्रा साहित्य में आदिवासी महिलाओं के श्रमिक जीवन पर प्रकाश डाला गया है। दस-बारह वर्षीय बच्चे को कुदाल चलाते देख लेखिका कहती है कि जीवन के कड़े यथार्थ से किस प्रकार बचपन से परिचय हो जाता है। आगे पलामू जाकर लेखिका देखती है कि वहाँ की अधिकांश भूमि पथरीली और बंजर है। लेकिन नक्सलवाद पनपता देख मधु कांकरिया उनके भविष्य के बारे में चिंतित है। “अभिशापित यह देश कि इसकी सर्वोत्कृष्ट युवा पीढ़ी, सिंह साहस वाली जांबाज पीढ़ी युवा होने के पहले ही जीवन की मुख्यधारा से दूर धकेल दी जाती है। धर्म या क्रांति के नाम पर बलि चढ़ा दी जाती है।"[iv] लेखिका जाति, धर्म इन सब से ऊपर मानवता, करुणा को रखती हैं "दुनिया को धर्म की नहीं करुणा की जरूरत है"।[v] देश में मंदिर पर मंदिर बनते हैं। मंदिरों की राजनीति होती है। किसी स्थान के स्थानीय मूल बाशिंदों को स्कूल और अस्पताल मूलभूत सुविधाएं तक नहीं होती हैं। लेकिन उनकी जगह करोड़ों रुपयों के मंदिर और मूर्तियाँ बनती हैं। “कहीं गली हुई नाक तो कहीं सड़ी हुई उंगलियाँ। ऐसे जीवन जो जिंदा थे मगर जीवित नहीं नज़र आ रहे थे”।[vi]
लेखिका की तीसरी यात्रा विवरण ‘साना-साना हाथ जोड़ि’ शीर्षक से है, लेखिका ने ये पंक्तियाँ नेपाली युवती से सीखी। इस यात्रा में लेखिका सिक्किम की राजधानी गंगटोक शहर की खूबसूरती का वर्णन करती है। इस विवरण में कंचनजंघा की चोटी है, हिमालय की विशालता है, पल-पल परिवर्तित प्रकृति है। “आश्चर्य! पल भर में ब्रह्मांड में कितना कुछ घटित हो रहा था। सतत प्रवहमान झरने, नीचे वेग से बहती तिस्ता नदी। सामने उठती धुंध। ऊपर मंडराते आवारा बादल”।[vii]
यात्रा-वृतांत का अगला भाग है ‘हिरना, देख बूझ बन चरना’। इस बार लेखिका की घुमक्कड़ी होती है, हिमालय की छाँव में बसे नेपाल में। मधु कांकरिया नेपाल के ना सिर्फ प्राकृतिक सौन्दर्य पर मुग्ध होकर रह जाती है, बल्कि वो नेपाल में आए ऐतिहासिक और राजनीतिक बदलावों को भी गंभीरता से देखती है। “राजाओं के देश नेपाल में आज जब नया शिलालेख लिखा जा रहा है... रोटी-रोटी चिल्लाती फ्रांसीसी जनता, रोम के बाजार में बिकते दास, जहाजों में जानवरों की तरह ठूंसे हुए गिरमिटिया, पीठ पर कोड़े खाते नीग्रो और थर-थर कांपते भारत के दलित जैसे चीख-चीखकर कह रहे थे कि हमारी सभ्यता का अधिकांश इतिहास क्रूरताओं का इतिहास है...”[viii] जर्मन लोगों की तरह नेपाली भी शायद राजतंत्र की उन भयावह स्मृतियों को याद नहीं रखना चाहते है। नेपाल में गणतंत्र की स्थापना से वहाँ आए सकारात्मक बदलाओं पर लेखिका खुश होती है। भारत-नेपाल के सांझे इतिहास, सांझी संस्कृति, भूगोल, नेपाल में चलती भारतीय मुद्रा रुपए आदि पर भी अपनी दृष्टि केंद्रित करती है।
यात्रा का पाँचवा क्रम है ‘बादलों में बारूद’। यात्रा-वृतांत का नामकरण भी इसी खंड के ऊपर किया गया है। रफ़्ता-रफ़्ता आगे बढ़ती इस यात्रा में लेखिका इस बार मेघालय जाती है। अनोखी संस्कृति, जादुई शिलॉन्ग शहर, गारो, खासी, जयंतिया जैसी पहाड़ी जनजातियों का देश- मेघालय। “हमारी कबीलाई संस्कृति की विशेषता ही यही है कि हमारे यहाँ मातृसत्तात्मक परिवार इस 21 वीं सदी में भी चलते हैं…।”[ix] लेखिका ने इस यात्रा विवरण का नाम ‘बादलों में बारूद’ क्यों रखा, यह समझना महत्वपूर्ण है। पूर्वोत्तर भारत अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है, जहाँ कई जातीय समूह, भाषाएँ, पहचान एवं परंपराएँ सद्भावनापूर्वक सह-अस्तित्व में हैं। हालाँकि, इस क्षेत्र में पिछले कुछ वर्षों में जातीय संघर्षों और सांप्रदायिक हिंसा के अनेक उदहारण सामने आए है। “पूरा नार्थ-ईस्ट आज बारूद के ढेर पर है। और क्यों न हो? हर जगह एक ही कहानी चाहे असम हो या मेघालय। नागालैंड हो या अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर हो या मिजोरम”।[x] हाल ही में मणिपुर में कुकी व मैतेई समुदाय के बीच हुई हिंसा, जिसमें लगभग डेढ़ साल तक मणिपुर सुलगता रहा।
यात्रा का अगला क्रम है ‘जाल, जहाज और मछुआरे’। इस बार लेखिका जाती है पश्चिम बंगाल के सुंदरवन। मधु कांकरिया सुंदरवन के सुंदरी वनों पर मोहित है, पर उन्हें वहाँ का यथार्थ भी जल्दी नज़र आ जाता है। ‘सुंदरवन में सबकुछ सुंदर नहीं है। जंगली बाघ चाहे कम हो रहे हैं, पर खर-पतवार की तरह बढ़ रहे हैं इंसानी बाघ’। सुंदरवन में इंसानों द्वारा विनाश की शुरुआत अठारहवीं सदी से होती है। मधु कांकरिया मीरजाफ़र के समय को याद करती है “सुंदरी पेड़ों (मैंग्रोव ट्री) की दुनियां के सबसे बड़े वन सुंदरवन में इंसानी महक की कहानी अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मीरजाफ़र की उस अभिसंधि से शुरू होती है जिसके तहत चौबीस परगना का वह भूखंड ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया गया”[xi] और अब राजनीतिक कारणों से सुंदरवन का दो तिहाई हिस्सा बांग्लादेश में चल गया।
अगले यात्रा विवरण को ‘देश में विदेश’ नाम दिया है। लेखिका इस बार चेन्नई शहर के साथ दक्षिण भारत के अपने अनुभव को बताती है। एक नजर में चेन्नई शहर भी आधुनिकता, तकनीकी, धर्म, संस्कृति, परंपरा और फैशन के संधि-स्थल पर खड़ा एक ऐसा शहर नजर आया, जो दो विपरीत ध्रुवों पर खड़ा था। “आधुनिकता से आक्रांत पर परंपरा के प्रति सम्मोहित दसवीं शताब्दी के पुराने नक्काशीदार मंदिर और 21वीं शताब्दी की विशाल स्वचालित मशीनों से लकदक बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल साथ-साथ”।[xii] मधु कांकरिया समुद्र को हर तमिलियन के भीतर पाती है। मछुआरों की अनंत जिजीविषा से प्रभावित होती है। दक्षिण भारत में प्रचलित राजनेता, नेता की ‘हीरो वरशिप’ से थोड़ी खिन्न भी होती है। केरल के रास्ते भारत में फले-फूले ईसाई धर्म और भारतीय संस्कृति में उसके घुलने-मिलने का भी वो विवरण देती है।
आठवें यात्रा विवरण का नाम है ‘बुद्ध, बारूद और पहाड़’। मधु कांकरिया की घुमक्कड़ी इस बार उन्हें लद्दाख ले जाती है। लोककथा सा लुभावना लद्दाख, लद्दाख में पहाड़ है, भोली जनता है, विस्थापित तिब्बती है, बौद्ध लामा है, चीन की टेढ़ी नजरें है, हमारी रक्षा करती भारतीय सेना है, और भी बहुत-बहुत कुछ है- प्राकृतिक सौन्दर्य। पर्यावरण प्रेमी लद्दाखी, लामा पर लेखिका ने काफी विस्तार से लिखा है। पर्यावरण प्रेमी सोनम वांगचुक भी लद्दाख से ही है, जिन पर प्रसिद्ध फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ भी बन चुकी है, आमिर खान ने इस फिल्म में सोनम वांगचुक का किरदार निभाया है। लद्दाख में पिघलते ग्लेशियर पर भी उन्होंने आवाज उठाई है “खनन और ऐसी गतिविधियाँ ग्लेशियरों को पिघला सकती हैं। इसके अलावा, लद्दाख सेना के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है और कारगिल तथा अन्य युद्धों में इसकी भूमिका रही है।[xiii]
लद्दाख में विस्थापित तिब्बती आज भी आजाद तिब्बत का सपना देख रह है। चीन ने तिब्बत पर जब कब्जा किया तो दलाईलामा इसके विरोध में आए। चीन ने दलाईलामा को मारने की कोशिश की। तब दलाईलामा और उनके समर्थकों ने हिमाचल, लद्दाख और नेपाल में शरण ली। नेपाल में भी मधु कांकरिया ने बाजार में बुद्ध से ज्यादा दलाईलामा की तस्वीर को बिकते देखा था। लगभग हर दुकान पर धर्मगुरु दलाईलामा की तस्वीर। शायद इसीलिए की तिब्बती के नाम को उन्होंने ही जिंदा रखा हुआ है। लामाओं की आँखों में आजाद तिब्बत का सपना तो है, बुद्ध के प्रति प्रेम है, मन में मानवीय भाव और करुणा है, पर साथ की कुछ कर्मकांड-अंधविश्वास भी है। “बुद्ध की इस नगरी में बुद्धत्व कहीं नहीं था। जिस कर्मकांड और पूजा-पाठ के विरुद्ध बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी वह आज तरह-तरह के कर्मकांड, अंधविश्वास और अंधश्रद्धा के दलदल में धंसा हुआ था”।[xiv] लेकिन सारे अधविश्वास और कर्मकांड के बावजूद पर्यावरण के प्रति लामा बहुत सचेत और सजग हैं। इनके पांच रंगों के प्रार्थना ध्वज में सारे रंग प्रकृति के सारे तत्त्वों की रक्षा के लिए हैं।
इस यात्रावृतांत के अंतिम अध्याय का शीर्षक है ‘देखती चली गई’। इस अध्याय में मधु कांकरिया दक्षिण भारत में कालडी स्थित आदिशंकराचार्य यूनिवर्सिटी की दो दिवसीय यात्रा पर जाती हैं। लेखिका महसूस करती है कि दक्षिण भारत के अधिकांश प्राचीन और ऐतिहासिक शहरों यहाँ तक की विकसित चेन्नई में भी एक समानता है - सब के सब देह से आधुनिक है पर दिमाग से पौराणिक।
मधु कांकरिया दक्षिण में विशेष तौर पर केरल में ईसाई धर्म के प्रसार का कारण दलितों से की गई सवर्णों की छुआ-छूत को मानती है। निम्न जातियों विशेषकर मछुआरों, खटिकों, श्रमिकों, कुम्हार, चमार और मेहतर आदि जिन्होंने अपनी सारी ऊर्जा और अपना सारा हुनर दूसरों के जीवन को सजाने-संवारने में खपा दिया, दूसरों के लिए जो ईंधन बने पर अपने ही घर में चूल्हा जला नहीं पाए। सवर्णों की छुआ-छूत ने जिन्हें मनुष्यों की तरह जीने नहीं दिया, इन गिरजाघरों की नींव में ही उन दलितों की उदासियां, आंसू और सिसकियां दबी पड़ी हैं। मानवीय त्रासदी के विविध पहलुओं की बारीक अभिव्यक्ति मधु कांकरिया के रचनाकर्म की विशिष्ट पहचान है।
मधु कांकरिया अपने साहित्य में एक नारीवादी दृष्टि रखती है उनकी नजर स्त्रियों पर बराबर रहती है। वह स्त्रियों की बराबरी को लेकर, उनकी अस्मिता को लेकर और उनके गरिमा पूर्ण जीवन को लेकर बराबर विचार करती है। अपनी प्रत्येक रचना के माध्यम से वो दुनियां के हर मनुष्य के लिए स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन लेखिका का ध्येय सामने रखती है।
निष्कर्ष: 'बादलों में बारूद' एक महत्त्वपूर्ण साहित्य कृति है जो मधु कांकरिया की सामाजिक चेतना और मानवीय करुणा को दर्शाता है। वे अपनी यात्राओं के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता के साथ-साथ मानवीय त्रासदी, सामाजिक-आर्थिक विषमता, उदारीकरण के नकारात्मक प्रभाव और पर्यावरण पर मंडराते संकट को उजागर करती हैं। यह यात्रा-वृतांत हमें न अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों से परिचित कराता है बल्कि यह भी दिखाता है कि पहाड़, संस्कृति और बारूद जैसे तत्व एक-दूसरे से किस प्रकार जुड़े हुए हैं – जहाँ प्रकृति का सौंदर्य है, वहीं जनजातीय शोषण और राजनीतिक संघर्ष की 'बारूद' भी मौजूद है। वे हर क्षेत्र के इतिहास, सामाजिक संरचना और राजनीतिक उथल-पुथल को गहराई से देखती हैं। यह यात्रा-वृतांत पाठकों को देश के विभिन्न अंचलों के यथार्थ पर गहन चिंतन के लिए प्रेरित करता है।
संदर्भ :
[i] राहुल सांकृत्यायन, घुमक्कड़-शास्त्र, राधाकृष्ण पेपरबैक्स, प्रथम संस्करण 2023, पृष्ठ सं. 84
[ii] मधु कांकरिया, बादलों में बारूद, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ सं. 28
[iii] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 17
[iv] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 56
[v] मधु कांकरिया, मेरी ढाका डायरी, राजकमल पेपरबैक्स, नई दिल्ली, 2025, पृष्ठ संख्या. 29
[vi] मधु कांकरिया, सेज पर संस्कृत, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली, पेपर बैक संस्करण 2010, पृष्ठ. 10
[vii] मधु कांकरिया, बादलों में बारूद, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2014, पृष्ठ सं. 60
[viii] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 75
[ix] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 76
[x] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 104
[xi] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 118
[xii] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 128
[xiii] https://www.downtoearth.org.in/climate-change/sonam-wangchuk-is-right-all-is-not-well-with-ladakh-s-glaciers-87278
[xiv] मधु कांकरिया, वही, पृष्ठ सं. 148
श्रीनिवास पंवार
शोध छात्र, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान
shriniwaspanwar1999@gmail.com, 8561919030
अनिता रानी
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर, राजस्थान
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा

मधु कांकरिया के यात्रा वृतांत पर आलेख। बधाई 🌷🌷
जवाब देंहटाएंबधाई! यात्रा वृतांत पर लेख।🍁
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