कविता विषयक संवाद
( सिद्धार्थ शंकर राय से योगेश शर्मा की बातचीत )
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| सिद्धार्थ शंकर राय |
योगेश : नमस्ते सर।
डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय : नमस्ते।
स्वागत है सर आपका आज के इस साक्षात्कार में।
धन्यवाद जी।
क्या दर्शनशास्त्र की तरह मनुष्य कविता के केंद्र में है? यदि ऐसा है भी, आपको क्या लगता है ऐसा कब से हुआ है?
देखिए, जो मनुष्य की जो सत्ता है... मनुष्य की सत्ता का जब से इतिहास है, वह इतिहास ही विचारों का इतिहास है। उससे पहले हम जिस मनुष्य की बात करते हैं, उसे हम 'सेपियंस' (Sapiens) नहीं मानते। जब से 'होमो सेपियंस' (Homo Sapiens) की बात कही गई है, विचार केंद्र में आया, यानी कॉग्निटिव सेंस (Cognitive Sense) आया। और दर्शन और कविता को बिल्कुल अलग-अलग करके देखना, यह दोनों के साथ ही एक तरह से ज्यादती होगी। दोनों के केंद्र में मनुष्य है। कविता के केंद्र में भी और दर्शन के केंद्र में भी। दर्शन को हम प्रायः यह मानते हैं कि यह विचार जनित चीज़ है और कविता को यह मानते हैं कि भाव जनित चीज़ है। लेकिन बुद्धि और भाव का साम्य, अगर इनका उद्गम स्थल देखेंगे, मनुष्य ही है। यह मनुष्य की निर्मिति है और मनुष्य के लिए है। अन्योन्याश्रित जिसे कहते हैं, यह अन्योन्याश्रय हैं विचार और कविता।
अच्छा, बात यह है कि हम दर्शन को यह मानते हैं कि दुनिया के जितने भी दर्शन हैं, यह बुद्धि केंद्रित हैं। लेकिन हमें यह ध्यान रखना होगा कि दर्शन के भीतर भी एक ऐसी शाखा रही है जो भाव पक्ष की तरफ बहुत झुकी हुई थी और सब्जेक्टिविटी (Subjectivity) की तरफ बहुत झुकी हुई थी। दर्शन में वस्तुनिष्ठता का जब से प्रवेश हुआ, तब से हम यह मानते हैं कि मनुष्य की विचारशीलता का आग्रह भी प्रबल हुआ। कविता के साथ यह है कि मनुष्य ने विचार करना शुरू किया होगा, विचार तब शुरू किया होगा न जब उसने अनुभूति की होगी? उसे यह एहसास हुआ होगा। तब वह कविता की तरफ गया होगा।
मनुष्य की उपस्थिति और उसकी बुद्धि का विकास, और बुद्धि के विकास के साथ-साथ ही उसकी भावनाओं का... उसके चिंतन का जो विकास हुआ, उसमें संगीत, कविता, नाटक सभी विधाएं एक साथ विकसित हुईं। इनको पृथक करके देखना एक तरह से मुकम्मल मनुष्य से, या जो मनुष्य से निकली हुई चीज़ें हैं, निःसृत हैं, उनके साथ अन्याय होगा। बल्कि इनको समग्रता में देखना चाहिए कि मनुष्य ने एक साथ... बहुमुखी विकास जिसे कहते हैं, सबको एक साथ देखना शुरू किया। और इसी के रूप में हमारी पूरी दार्शनिक प्रक्रिया और कला की अभिव्यक्ति साथ-साथ चलीं।
अब जब हम कहेंगे कि कब से? दर्शन और कविता... इसकी तिथि बता पाना इतिहास की तरह यह बड़ा मुश्किल प्रश्न है कि यह कब से। लेकिन जैसे मनुष्य ने विचार करना शुरू किया होगा, आज हम जितने जटिल विषयों पर विचार कर रहे हैं या जटिल विषयों को देख-समझ रहे हैं... शुरुआत में इतने जटिल विषयों पर मनुष्य ने विचार नहीं किया होगा। जितना भी उसने शुरू किया... सोचना, समझना, चीज़ों को परखना, उनकी प्रमाणिकता की जांच करना, अपनी अनुभूतियों को संरक्षित करना, स्मृति में ही सही... भाषा बाद में आई, लिपि बाद में आई, लेकिन पत्थरों पर उकेरना शुरू किया। जो चीज़ पत्थरों पर उकेरी गई वह सिर्फ विचार ही नहीं है, उसमें कविता भी है, उसमें कला भी है। भीमबेटका आप जाएंगे... पुरानी आकृतियां हैं उसमें, लेकिन उससे एक प्रमाण निःसृत होता है।
अलग करके नहीं देखना चाहिए। क्योंकि यह मनुष्य को खांचे में बांधकर देखना होगा। यह मनुष्य की क्षमता पर संदेह है। देखना चाहिए कि सब एक साथ मनुष्य ने इनका आरंभ किया, जब से उसने विचार करना शुरू किया, जब से उसने सोचना शुरू किया। अपने विचारों की अभिव्यक्ति के लिए उसने बहुत ही गूढ़ विषय भी चुने और बहुत सरल विषयों को, जिनसे उसकी भाव सत्ता थोड़ी प्रखर ढंग से प्रकट हुई... उसको भी उसने एक स्वरूप प्रदान किया। मैं इस रूप में इसे देखता हूँ।
जी, ठीक है। अभी हम जैसे आप बात कर रहे हैं कि पृथक नहीं देख सकते और एक... एक पूरी की पूरी उसमें एक शाखा है जो भाव केंद्रित है दर्शन में। ये जाहिर है। जो प्योर लॉजिक (Pure Logic) है यानी कि शुद्ध बुद्धि जिसे हम कहते हैं और कविता है, उसके बीच में आप कैसा संबंध देखते हैं? उसके विकासशीलता के क्रम में...
देखिए, इस बात को कहने के लिए मैं रामचंद्र शुक्ल की मदद लूँगा। और उन्होंने जब इस पर विचार करना शुरू किया, यह जो प्रश्न है, मुझे लगता है कि उनके समक्ष भी यह प्रश्न था। और 'चिंतामणि' निबंध जो है, निबंधों का संकलन है उनके... उसकी बहुत छोटी सी भूमिका है। और उस बहुत ही, कहते हैं कि बोलने वाली भूमिका, या बहुत कुछ कहने वाली भूमिका, या बहुत कम शब्दों में आप यह कह सकते हैं कि यह जो प्रश्न है या इसका उलझाव है, उसको स्पष्ट करने का प्रयास किया उन्होंने।
उस भूमिका में कहते हैं कि अपने निबंधों के बारे में कि ये निबंध मेरी विचार यात्रा में पड़ने वाले कुछ प्रदेश हैं। जिसमें यात्रा पर निकलती रही है बुद्धि, लेकिन हृदय को साथ लेकर। जैसा मैंने पीछे कहा कि इसको पृथक करके नहीं देखना चाहिए कि उसकी अनुभूतियां नहीं रही हैं। अगर यह नहीं है दर्शन की उत्पत्ति ही नहीं होती। अनुभूतियों से ही... कहते हैं न कि प्रामाणिकता करेंगे कैसे करेंगे? मान लीजिए कि हम बात करते हैं कि अग्नि हमें जलाती है। तथ्यों की प्रामाणिकता जिसे वस्तुनिष्ठता कहते हैं... कविता के साथ इसका संबंध और दर्शन के साथ भी संबंध है, और वस्तुनिष्ठ जिसे कहते हैं... लॉजिक जब आया, खास तौर से जब मॉडर्न फिलॉसफी (Modern Philosophy) आई, देकार्त (Descartes) वगैरह जब आए... देकार्त ने कहा कि 'मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ'।
देकार्त से जो असहमत लोग थे उन्होंने कहा कि चलिए मान लीजिए कि जो चीज़ें नहीं सोचतीं, क्या वो नहीं हैं? यह प्रश्न आया, हालाँकि बहुत स्थूल प्रश्न है यह, दर्शन के लिहाज़ से। देकार्त के अनुयायियों ने बहुत ही अच्छा उत्तर दिया इसका। उत्तर यह दिया कि नहीं, वे वस्तुएं भी हैं जो सोचती नहीं हैं, यानी निर्जीव हैं। लेकिन ये वस्तुएं हैं, इनकी उपस्थिति को प्रमाणित कौन करता है? जो सोचता है। भाई किसी भी चीज़ की प्रामाणिकता को कैसे जांचते हैं? गंध से, रंग से, है न? स्वाद से, छू कर, कहते हैं न कि स्पर्श से।
इंद्रिय जनित जो है।
हाँ, ये कौन करेगा? यह भी मनुष्य करेगा। यह अनुभूति का विषय है। लॉजिक और अनुभूति, वस्तुनिष्ठता, विज्ञान... यह भी अनुभूति जनित ही है। इसीलिए मैं कह रहा हूँ कि ये अंतरगुम्फित प्रश्न है। इसको अलग करके मत देखिए। रामचंद्र शुक्ल ने कहा न कि बुद्धि आगे चल रही है आधुनिक युग में, बुद्धि पक्ष है, लेकिन हृदय पक्ष गौण नहीं हो जाता। जैसे, मान लीजिए एक चित्र मैं आपको याद दिलाऊं... अपने देश में एक अप्रिय घटना हुई थी गोधरा में, एक... दो दृश्य उसके बहुत ही लोकप्रिय हुए। एक दृश्य यह था कि एक व्यक्ति जो है वो लाल रंग की या कुछ जैसा भी रंग हो, पट्टी बांधे हुए, दाढ़ी रखे हुए और हाथ में तलवार थी। यह तस्वीर अखबारों में खूब आई। और एक जो आई आँखों में बहुत ही करुणा थी, आंसू थे और हाथ जोड़े हुए जैसे अपनी जान की भीख मांग रहा हो। ये दोनों दृश्य हैं, चित्र हैं ये। चित्र से दोनों चीज़ें आईं। एक मनुष्य, हम उस चित्र को देखते हैं, हमारी जो भावात्मक संवेदनाएं हैं, या जो हमारा हृदय पक्ष है, वह भी सक्रिय हो उठता है। उसके भीतर भी भाव उमड़ते हैं और बुद्धि पक्ष से ही वो संवेदनाएं जाती हैं जो हमारे भाव पक्ष को जाग्रत करती हैं कि यह जो तस्वीर है ये किन जीवन स्थितियों को बयान कर रही है।
यानी दोनों का अगर एकीकरण न हो, किसी भी तरह के निष्कर्ष से, किसी भी तरह के चिंतन से, है न? या किसी भी तरह की कविता से, वह करुणा है, है न? कहा कि 'वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान'। गान बुद्धि पक्ष भी हो सकता है, उसमें बौद्धिकता हो सकती है। लेकिन आह से उपजना, मतलब अनुभूति पक्ष है। दोनों के अंतरगुम्फन पर एक साथ विचार करना चाहिए, खांचे की बजाय, जिसे हम 'टोटैलिटी' (Totality) कहते हैं... हालाँकि टोटैलिटी को बहुत ही साहित्य में कभी-कभी नकारात्मक भी मान लेते हैं, लेकिन संपूर्णता में देखने का आग्रह जरूर होना चाहिए। और यह मानना चाहिए कि इसका एक केंद्र है मनुष्य और ये चीज़ें मनुष्य के आसपास... विचार, हृदय, भाव, लॉजिक, तथ्य... केंद्र में मनुष्य है सबके और उसकी परिधि पर ये सारी चीज़ें घूम रही हैं। और मनुष्य के ज़रिए ही ये प्रभावित होती हैं और ये चीज़ें मनुष्य को प्रभावित भी करती हैं। यहीं से एक सामूहिकता भी बनती है, यह पक्ष भी उभर कर आता है।
ठीक है। इसी में हम देखते हैं कि जब कविता के पाठ की बात आती है, हमारे सामने एक सवाल आता है कि जो कविता का निर्वैयक्तिक पाठ है, उसके अपने खतरे होते हैं। और क्या जब हम साहित्य का निर्वैयक्तिक पाठ करते हैं, उसमें जो वैयक्तिक आस्वाद होता है, उसके स्खलन का खतरा बना रहता है?
देखिए, निर्वैयक्तिकता का जब सिद्धांत यह आया और हमने कहा कि बिल्कुल कविता को अलग कर दीजिए, किसने लिखा है आप भूल जाइए... लोगों ने कहा कि कहानी का विश्वास करो, कहानीकार का मत करो। यह कला की या कलावाद की उच्चता की घोषणा है, वस्तुतः। क्योंकि इतिहास विमुखता नहीं हो सकती। और कोई भी चीज़, हम मनुष्य हैं, कविता है, कहानी है, समाज का उत्पाद है? हम खुद समाज के उत्पादन के रूप में हैं। इसको उससे बाहर करके देखना बहुत ही अनुचित होगा और निर्वैयक्तिकता का मैं पक्षधर नहीं हूँ। यह जानना चाहिए कि रचनाकार, लेखक किस समय में था।
अगर मान लीजिए कि कबीर के जीवन की जो घटनाएं हैं या उनकी कविता की ऐतिहासिक व्याख्या आप करने लगें... निर्वैयक्तिक होने का यह मतलब हुआ कि हम इतिहास विमुखता की तरफ भी जा रहे हैं, समाज विमुखता की तरफ भी जा रहे हैं। यह बात क्यों आ रही है? किस पक्ष से आ रही है? कहाँ से यह स्वर आ रहा है? अगर उसकी आवाज़ को हम नहीं पहचानते, नहीं जानते, कभी-कभी यह खतरा होता है कि राजसत्ता में बैठा व्यक्ति...और वह निहायत ही दुख भरी कविता लिख रहा है। उसमें अनुभूति की सत्यता नहीं होगी?
बिल्कुल नहीं होगी ।
इसलिए जांच भी जरूरी है। एक बहुत ही मजेदार शब्द लेनिन (Lenin) ने प्रयुक्त किया। कहा कि देखो, दो तरह का जनवाद होता है। और लेनिन ने कहा कि एक होता है जो शब्दाडंबर, लफ्फाजी और कोरे वायदों का जनवाद होता है। वह भी कहता है कि हम जनता का भला करेंगे, हम आपके लिए ये चीज़ें लेकर आए हैं, हम आपके लिए इन चीज़ों को लाने की कोशिश की है... लेकिन वस्तुतः होता नहीं है, उसमें लफ्फाजी अधिक होती है। और एक होता है मेहनतकशों का जनवाद, जो सीधे उनके साथ खड़ा होता है। उस परिप्रेक्ष्य में आप देखेंगे, निर्वैयक्तिकता के सिद्धांत को बिल्कुल नहीं मानता, मैं सामूहिकता के सिद्धांत को मानता हूँ। और मैं सामूहिकता के परिप्रेक्ष्य में ही देखता हूँ कि सामाजिक यूनिट के तौर पर, समाज के उत्पाद के रूप में मैं देखने का पक्षधर हूँ।
उससे अलग करके रचनाकार को नहीं देखना चाहिए, क्योंकि रचनाकार भी समाज का ही उत्पाद है और रचना भी सामाजिक संपत्ति है। जब समाज का उत्पाद है और सामाजिक संपत्ति है, उसको बिल्कुल बाहर करके नहीं रख सकते। उसको समाज के परिप्रेक्ष्य में, हाँ परिप्रेक्ष्य बदलने की मांग हो सकती है कि इसको सिर्फ उसके परिप्रेक्ष्य में मत देखिए। इसके, इसके काल, उस काल में भी देखिए और कालातीत होने के संदर्भ में भी देखिए। लेकिन रचनाकार को बिल्कुल बाहर कर देना, बिल्कुल मैं उचित नहीं मानता और मैं निर्वैयक्तिकता के पक्ष में नहीं हूँ, मैं सामूहिकता के पक्ष में हूँ। और लेखक भी उसी समूह का हिस्सा है, उस समूह के संदर्भ में उसकी रचना का पाठ करूँगा। उस कालखंड के संदर्भ में करूँगा और काल के इतर भी करूँगा, कालातीत भी करूँगा कि आगे-पीछे से इसकी संबद्धता क्या है। नहीं हम इतिहास का क्रम भूल जाएंगे।
अगर हम रचनाकार को नहीं जानेंगे कि यह किस कालखंड की रचना है, इतिहास से, कहते हैं न कि भ्रमित होने का खतरा उत्पन्न होगा। फिर हमें एक, एक जो है न, ऐतिहासिक क्रम नहीं मिलेगा। और फिर मानव सभ्यता के इतिहास की कड़ियों को पड़ताल करना और उसके लिए जो सहायक सामग्रियाँ हैं या उसके जो मूल ग्रंथ हैं, उनके बारे में हम कैसे जांच करेंगे? ये कई सारे प्रश्न हैं।
मुझे एक बात याद आ रही है सर, अज्ञेय जी ने एक निबंध में लिखा है 'मनुष्य की स्वतंत्रता' के विषय में बात करते हुए कि आदमी समाज में रहकर ही स्वतंत्र है, समाज से बाहर वह स्वतंत्र नहीं है। मेरे ख्याल से आपकी बात की पूरक है ।
हाँ, जी।
कविता की व्याख्या के क्रम में, निर्वैयक्तिकता से आगे बढ़ते हुए एक सवाल उभरता है कि कविता की आलोचकीय अति व्याख्या होती है, उसको आप कैसे देखते हैं?
देखिए, निर्वैयक्तिकता से आगे जब हम बढ़ेंगे और कहेंगे कि आलोचक जो है कभी अतिशय की व्याख्या करता है, जो अति संभाव्य जिसे कहते हैं, असंभाव्य को संभाव्य बनाने की कोशिश करता है। ऐसा रचनाओं में भी हुआ और आलोचकों ने कई बार चीज़ों को 'मिसइंटरप्रेट' (Misinterpret) करने की कोशिश की और यह दो अर्थों में होता है। एक यह होता है जब हम किसी रचनाकार को बहुत ही उसको 'रिड्यूस' (Reduce) करते हैं, तब होता है। या हम बहुत सारे मामलों में उसे 'मैक्सिमाइज' (Maximize) करने की कोशिश करते हैं, यानी उसको अधिकता में ले जाने की कोशिश करते हैं। ये दोनों अर्थों में होता है।
और यहाँ पर रचना का जो प्रभाव है वह प्रमुख नहीं रह जाता, यहाँ पर आलोचक का विवेक प्रश्नांकित होता है। कि उसका आलोचकीय विवेक क्या कहता है? उसके आलोचकीय सिद्धांत क्या कर रहे हैं इस समय? प्रश्न उसका बनता है कि आलोचक का विवेक कितना है। अब जैसे मान लीजिए कि मैं एक उदाहरण दूँ और बड़े आलोचक का मैं उदाहरण दूँगा, नाम लेकर मैं कहूँगा कि जैसे देखिए, 'कविता के नए प्रतिमान' पुस्तक नामवर जी की। उसमें एक 'नूरा कुश्ती' है, उस पुस्तक में। और आप जानते हैं कि नामवर जी ने कहा कि, बाद में कहा कि लगभग 30 वर्षों बाद कि मैं उस पुस्तक की सारी स्थापनाओं को वापस ले रहा हूँ। लेकिन प्रमाण लिखित का है न, मौखिक का नहीं है, जैसा नामवर जी कहा करते थे खुद।
अब आप विचार करिए कि उसमें 'बिम्बधर्मिता बनाम सपाटबयानी'... केदारनाथ सिंह और रघुवीर सहाय को आमने-सामने रखकर बातचीत की गई है। और रघुवीर सहाय की सपाटबयानी की खूब प्रशंसा की गई है। उसके कारण, वजह क्या हैं, यह सोचना पड़ेगा, जानना पड़ेगा। लेकिन, और केदारनाथ सिंह के बिम्बों की, 'अनागत' कविता को उद्धृत किया है और अनागत को कहा कि ये जो बिम्ब हैं ये बहुत ही अमूर्त किस्म के बिम्ब हैं और इससे पूरी कविता की जो प्रक्रिया है और इसको समझने की प्रक्रिया है, वह बाधित होती है। और कवि विवेक को प्रश्नांकित किया है। यह चरित्रों की टकराहट है। मुझे आलोचकीय विवेक इसलिए संदिग्ध प्रतीत हुआ कि उसी कविता का जो सबसे आखिरी अध्याय है 'अंधेरे में पुनश्च'... अब बहुत रोचक सी बात है कि नामवर जी जिन जटिल बिम्बों के लिए, अमूर्तन वाले बिम्बों के लिए केदार जी को दोषी ठहराते हैं...
योगेश: उसी के लिए मुक्तिबोध की प्रशंसा करते हैं।
हाँ, मुक्तिबोध की अतिशय प्रशंसा करते हैं। और क्रांतिकारी सिद्ध करते हैं। एक ही पुस्तक के भीतर दो मानदंडों की उपस्थिति है। कौन सा मानदंड सही होगा? कौन सा नहीं होगा? मेरे जैसे व्यक्ति के लिए यह जो सारा मसला है यह विचारणीय बन जाता है और मैं सामान्य पाठक हूँ, उस नाते दुविधा की स्थिति उत्पन्न होती है कि ऐसा क्यों हुआ।
यह रचनाकार के निर्वैयक्तिकता का प्रश्न नहीं है। अब प्रश्न है कि आलोचकीय विवेक क्या है। आलोचक कितना निर्वैयक्तिक है। उसमें देखेंगे कि वो फिर वो उसकी तरह काम नहीं, उत्प्रेरक की तरह आलोचक काम नहीं कर रहा है। आलोचक अपनी जो सत्ता है, या जो अपनी सामाजिक सत्ता है, उसके जरिए रचना को 'डिस्टॉर्ट' (Distort) करने की कोशिश करता है। यहाँ पर उसका आधिक्य है। मैं उसको सामने रखकर, उदाहरण रखकर... इससे बचने की कोशिश होनी चाहिए। व्यक्तिगत आग्रहों को रचना पर आरोपित नहीं करना चाहिए, मूल्यांकन के समय में। मुझे लग रहा है कि मेरी बात स्पष्ट हो गई।
जैसे कविता में प्रतीक आते हैं और जाहिर है वो गद्य के प्रतीकों से बिल्कुल भिन्न स्तर पे होते हैं और उनकी बुनावट भी बिल्कुल अलग किस्म की होती है। जब हम बात करते हैं अर्थ की, व्यंग्यार्थ की विशेष रूप से, क्या आपको लगता है कि प्रतीक कविता में व्यंग्यार्थ पैदा करने में कोई विशेष भूमिका निभाते हैं?
कई एक बार। लेकिन प्रतीकों ने इससे भी बड़ा काम किया है, सिर्फ व्यंग्य नहीं पैदा किया है, बहुत सारे जीवन के प्रश्नों को, बहुत सारी भावों को, अनुभूतियों को प्रकट किया है। जो हमारी वाद वाली कविता थी, और खास तौर से जो जनपक्षधर कविता कहते हैं, प्रतीकों का बहुतायत प्रयोग जो है वह पॉलिटिकल संदर्भ में हुआ, राजनीतिक तौर पे और व्यंग्य के संदर्भ में हुआ। 'इंदु जी, इंदु जी क्या हुआ है आपको', ... या, या आप जाएंगे आप 'मास्टर' कविता पढ़ लीजिए, है न? या बहुत सारे प्रतीक जो है...
'आओ रानी हम ढोएंगे पालकी'।
हाँ, 'यही हुई है राय जवाहर लाल की'। उन प्रतीकों ने एक प्रतिपक्ष रचा है। लेकिन सिर्फ मतलब व्यंग्य के तौर पर ही नहीं है। जैसे 'मास्टर' कविता में 'घुन खाए शहतीरों पर की बारहखड़ी विधाता बांचे'... उन प्रतीकों ने उससे आगे बढ़कर काम किया है व्यंग्य के अतिरिक्त। प्रतीक को सिर्फ व्यंग्य तक सीमित कर देना, उसको मने रिड्यूस करना हुआ। बहुत सारे चित्र ऐसे निर्मित किए कि जो उसके बाहर भी गए और बहुत ही राजनीतिक मुहावरे के तौर पर आए। और यह कहना कि मतलब राजनीतिक मुहावरे, थोड़ा कहते हैं कि कविता में जो है वो 'कविता लाउड (Loud) हो गई', लेकिन बहुत ज्यादा बोल रही है कविता, 'आक्रोश में दांत किटकिटा रहे हैं'...
धूमिल के साथ जैसा हुआ।
धूमिल पर जैसा आक्षेप लगा। लेकिन धूमिल ने प्रश्न पूछा और प्रश्न यथावत है। कि 'क्या आजादी तीन थके हुए रंगों का नाम है, जिसे एक पहिया ढोता है, या आजादी का कुछ खास मतलब भी होता है?' और उस आजादी को लेकर आज हम जिस समस्या से या जिस चिंता से गुजर रहे हैं, याद कीजिए कि धूमिल का वह प्रश्न क्या आज मृत हो गया? या वह प्रतीक आज अधिक प्रासंगिक हो गया, अधिक जीवंत हो गया और अधिक कहने वाला हो गया?
जो हमारी संसदीय प्रणाली है, उस संसदीय प्रणाली पर राजनीति विज्ञान के लोग अलग ढंग से विचार कर रहे हैं और उसकी सीमाओं पर विचार कर रहे हैं। लेकिन हम साहित्य के विद्यार्थी होने के नाते अगर सोचें, आप विचार करेंगे कि जो संसदीय प्रणाली के बारे में प्रश्न उठाए गए... कि यह संसद क्या है? 'तेली की वह घानी है जिसमें आधा तेल है और आधा पानी है'। यह प्रश्न यह है कि जब संसद का चित्र हमें दिखाई देता है, यह चित्र इसलिए है न कि यह जन प्रतिनिधित्व का प्रतीक है। लेकिन सिर्फ व्यंग्य नहीं है, यह प्रश्न है। और इस प्रश्न में जनता की अपेक्षाएं हैं कि क्या हमारी अपेक्षाओं को यह चित्र पूरा कर रहा है? अगर वो अपेक्षाएं पूरी नहीं हो रही हैं, उनसे प्रश्न पूछना सिर्फ व्यंग्य नहीं है। यहाँ व्यंग्य जो है वो जनता का दुख है। और दुख की अभिव्यक्ति है। दुखों के जरिए, दुखों को बल्कि प्रतीक में बदल देने की यह मैं कहूँगा कि कला है कवि की। कि इन प्रतीकों के जरिए जनता के दुखों को, उसके संघर्षों को, उसकी जीवन स्थितियों को, जो भी उसकी अपनी विषमताएं हैं, उसकी रोजी-रोटी का, उसके रोजगार का, जितने भी प्रश्न हैं, उन सब पर विचार करना है। प्रतीक उससे आगे बढ़कर है। व्यंग्य कहने का एक शिल्प भर है, कि कहने की कहते हैं कि जी बात कहने की एक कला ढूंढ ली। कैसे कहेंगे? व्यंग्य के जरिए कह रहे हैं। थोड़ा आप मुस्कुरा लेंगे। लेकिन अगर आप उसके विश्लेषण में जाएंगे, अर्थबोध पर जाएंगे, आपको लगेगा कि नहीं यह व्यंग्य नहीं है।
जैसे भक्ति में, भक्ति काल में विनय के शिल्प में, प्रार्थना के शिल्प में बहुत सारी बातें कही गईं। लेकिन शिल्प बस प्रार्थना का है। बात प्रार्थना की नहीं है, भक्ति की नहीं है, बात जीवन की है। यहाँ बात व्यंग्य में कही गई है, लेकिन बात व्यंग्य की नहीं है। बात जीवन स्थिति की है, जनता की है, जनता की जो तमाम उसके राग-विराग, संघर्ष, दुख, पीड़ा सारी चीज़ें उसकी हैं। इसलिए प्रतीकों को इन संदर्भों में देखना चाहिए।
अभी जैसे आपने तिरंगे वाले बिम्ब का जिक्र किया, जाहिर है यहाँ पर बिंब और प्रतीक गुम्फित हो जाते हैं, मतलब कविता की पूरी विकास यात्रा में । यह एक व्यवस्था है कविता में क्राफ्ट की... तो जो 1991 के बाद उदारवाद की स्थिति उत्पन्न हुई और विमर्शमूलक कविता ने जन्म लिया भारत में, विशेष तौर पर हिंदी में। उदाहरण के लिए आदिवासी, दलित या अन्य विमर्श हैं, जैसे स्त्री विमर्श है... इनकी जो प्रतीक और बिंब व्यवस्था है, वो बिल्कुल अलग-अलग है। आप इनमें किस तरह से अंतर करते हो?
उसका 'लोक' अगर आता है, उसको एप्रिशिएट (appreciate) किया जाना चाहिए। उसकी अपनी भाषा आती है, उसको एप्रिशिएट किया जाना चाहिए। अब कोई कवि मान लीजिए कि सारंडा के जंगलों से आ रहा है, उसकी अनुभूति में, और कोई कवि सोनीपत का है, उसकी अनुभूति में अंतर होगा। क्योंकि दोनों अलग-अलग समाज के उत्पाद हैं। उनके जीवन संघर्ष अलग हैं और यहाँ के जीवन संघर्ष अलग हैं।
जैसे आपने इस प्रश्न को उठाया है, मैं आपको बताऊं कि इन बिंबों को अलग करने से पहले, इन बिंबों को एक ही चीज में ढालने की भी कोशिश हुई। मैंने आज से आठ-एक साल पहले एक सेमिनार में सुना था कि एक युवा कवि कह रहे थे कि "हमें अब चीजों को जाकर देखने की जरूरत नहीं है, हमें बहुत सारी चीजें इंटरनेट के एक क्लिक पर मिल जाती हैं।" मैंने सुना और मेरे मन में प्रश्न आया कि क्या सारंडा के जंगलों का दुःख भी आपको इंटरनेट की क्लिक पर मिल जाता है? क्या भूख भी इंटरनेट के जरिए आपको लग जाती है? या बिलबिलाते हुए बच्चों को आप इंटरनेट पर देखकर उनको दिलासा इंटरनेट से ही पहुँचा देते हैं?
कविता का अगर कोई सामाजिक दायित्व है, जन-जुड़ाव भी एक बड़ा कारण है। कविता किसके लिए? इस नाते अगर आप बिंबों को देखना शुरू करेंगे या प्रतीकों को देखना शुरू करेंगे, आप देखेंगे कि मान लीजिए कि कोई आदिवासी कवि आ रहा है... अनुज लुगुन की कविता आप पढ़ें या जसिंता की कविता आप पढ़ें। और मैं कह रहा हूँ कि महानगरीय जीवन के एक कवि की कविता पढ़ें। दोनों में अगर कोई आपको समान बात ढूँढनी हो... मैंने कहा न कि लोक से अगर वो ले रहा है और अपने लोक को अभिव्यक्त कर रहा है, यह बहुत अच्छी बात है और होना चाहिए, अलग होना चाहिए। क्योंकि उसके जीवन का स्वाद अलग है, जीवनानुभूति अलग है, इनकी जीवनानुभूति और जीवन का स्वाद अलग है।
लेकिन प्रश्न यह है कि जन सरोकार का कोई ऐसा कॉमन (common) बिंदु भी दोनों में है कि जिससे बातचीत की जा सके? जिस पर... क्योंकि मेरे लिए कविता अगर एक क्या है... सामूहिक चेतना का प्रश्न है। सामूहिक चेतना बनाने के लिए सामूहिक प्रश्नों की भी आवश्यकता पड़ेगी। सामूहिक प्रश्न हैं क्या दोनों के? दुःख दोनों के एक जैसे हैं क्या? तब बातचीत शुरू करते हैं। दोनों के दुःखों का कारण कौन है? यह भी पड़ताल करेंगे, तब इसका निदान होगा।
जैसे मान लीजिए कि एक कविता है अनुज की... वह पलाश फूल रहा है । अब उसमें आता है कि भाई गुफाओं को भी खबर है कि वेदांता का विज्ञापन टंग गया है। यह कविता 2008-07-08 के आसपास की कविता है। आज हसदेव में जाकर उस कविता की तख्ती लगाकर टांग दीजिए कि विज्ञापन टंगा है कि नहीं टंगा है हसदेव घाटी में? आज बस्तर में उस कविता को पढ़िए, लगेगा कि क्या बस्तर से इतर है? कितने पलाश के फूल फूलेंगे इस बार बसंत में, हमें नहीं पता... क्योंकि जंगल जल रहा है। जंगल क्यों जल रहा है? क्योंकि जंगल है ही नहीं। हमारे यहाँ जलने का जो प्रतीक है, वह मृत्यु का प्रतीक है। कि जल गए... खाक में मिश्रित हो जाना जिसे कहते हैं। वहां इस प्रतीक का अगर सदुपयोग करते हैं, कोई हर्ज नहीं है।
चलिए मान लीजिए एक नगरीय बोध की कविता ले लीजिए या एक स्त्री परक कविता ले लीजिए। दूसरा प्रश्न आता है कि वहां से जीवन लीला समाप्त हो गई, विस्थापन की समस्या आ गई। विस्थापन एक संभावित विस्थापन होता है। एक मांग होती है... "यह सवाल उसे शर्मिंदा कर देता है कि वह क्या कर रहा है आजकल?" थोड़ा पढ़ा-लिखा तबका है। वो अनपढ़ थे, उनका जीवन समाप्त हो गया। "क्या कर रहा है आजकल?" यह जो अकर्मण्यता है, या अकर्मण्यता का बोध है जो शर्मिंदगी पैदा कर रहा है, इसको उकेरना... और शर्म एक क्रांतिकारी भाव है। सार्त्र (Sartre) ने इसे कहा था। अगर शर्म आने लगे क्रांति हो सकती है शर्म से। लेकिन आए तब! है ना... यह प्रश्न है कि आ जाए अच्छी बात है।
उस भाव को... कि चलिए शर्मिंदगी की उसने बात की। कि भाई शर्मिंदा हो रहा है वह। उस शर्मिंदगी से क्या निकल के आ रहा है? वह डाका नहीं डालता, वादाखिलाफी भी नहीं करता, पर यह सवाल उसे शर्मिंदा कर देता है कि वह क्या कर रहा है आजकल। यह एक नगरीय चेतना को अभिव्यक्त करने वाली बात है। लेकिन इसमें भी आप देखेंगे कि उसका भी विस्थापन हो रहा है। किन मूल्यों से हो रहा है? जिस समाज से उसने एक आस्था को लेकर जन्म लिया न कि वह बेरोजगार नहीं रहेगा। है ना... उसके भीतर एक स्वाभिमान पैदा हुआ, वहां से वह भी डिरेल (derail) हुआ।
बिंदु की समानता कई जगहों पर मिलेगी। स्त्री मूलक कविताओं में आप आएंगे, ये कविताएं कमाल की हैं। जैसे चलिए मान लीजिए मैं दूसरे पक्ष को... मैं सिर्फ एक्टिविस्ट टाइप लोगों को नहीं लेता... मैं यह कह रहा हूँ कि आप जाइए और गगन गिल की कविता ले लीजिए। " एक दिन लौटेगी लड़की, कैसे लौटेगी?" [कविता का संदर्भ: एक दिन लौटेगी लड़की]। हथेली पर जीभ लेकर लौटेगी। यानी बोलने नहीं दिया जाएगा। हथेली पर जीभ का आ जाना, रक्तरंजित होकर एक लड़की का आना... इसको आप चाहें प्रतीक मान लें और मैं इसे बिंब मानता हूँ और इस बिंब को अगर हम इसका रेखांकन करें, बहुत ही विद्रूप व्यवस्था का चित्रण होगा इससे।
इन सबको... इन सब में न... इनको अलग की बजाय न, इनको यह देखना चाहिए कि इनके कॉमन पॉइंट क्या हैं? इनके कॉमन पॉइंट क्या हैं? ये सामान्य तौर पर कहां-कहां आपस में जूझ रहे हैं, बात कर रहे हैं। यह।
अभी जैसे हम बात कर रहे हैं कि कॉमन एक पॉइंट देखना चाहिए। यह एक इम्पोर्टेन्ट पॉइंट है । क्योंकि रमणिका गुप्ता की मेरे को बात याद आ रही है सर, विमर्शमूलक कविता की हम बात कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि हर विमर्श का एक दायरा होता है। आप कैसे देखते हैं, जो वर्चस्ववादी ताकतें हैं... कि उन्होंने जो किया है... अभी मेरी व्हाट्स एप के जरिए बात हो रही थी, एक युवा कवि से, पराग पावन से। वो भी मानते हैं कि जो वर्चस्ववादी ताकतें हैं जितनी, उन्होंने एक-एक विमर्श का नाम दे दिया और फिर से उनकी काव्यगत अभिव्यक्ति को हाशिए पर सरका दिया, जैसे स्त्री कविता या आदिवासी कविता, मुख्यधारा से काट [कर]। आप इसको कैसे देखते हैं ? क्या वर्चस्ववादी ताकतें हिंदी कविता में उस तरीके से काम करती हैं?
देखिए, इसको कहते हैं प्रवृत्तियों की पहचान। प्रवृत्ति की पहचान, यह कोई बुरी बात नहीं है। यह कविता को समझने की प्रक्रिया है। कि एक साथ कितनी सारी चीजें उपस्थित हैं हमारी कविता में। और चूँकि हम लोकतंत्र वाली व्यवस्था में हैं, उस परिप्रेक्ष्य में आप देखेंगे लोकतंत्र जो है वो अलग-अलग स्वरों, समूहों, संगठनों, समुदायों को एक जगह पर लाने का काम करता है। लेकिन उनकी अस्मिता को समाप्त कर नहीं लाता। यानी आपको अपनी आइडेंटिटी (identity) के साथ... आपको अपनी भाषा, बोली, रंग, रूप, जात, समुदाय... जहां से आप आते हैं, सबके संरक्षण के साथ उनके अधिकारों की बात है।
अगर कविता के भीतर ये अलग-अलग स्वर हैं- स्त्री, दलित और जिस [कवि ने] पीछे कह रहे थे कि किस समुदाय से कवि आ रहा है। इसको इस रूप में भी देख सकते हैं कि जिधर से कवि आ रहे हैं... जैसे मान लीजिए हम रविदास को लेते हैं, संत रविदास को या कबीर दास को लेते हैं। वहां से हम कहते हैं कि 'जी, शास्त्र के बरक्स हमारी लोक की भी एक परंपरा रही है और उसके ये प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं और इनके जरिए जो वंचितों का शास्त्र है, वह निर्मित होता है।'
अगर हम इनकी पहचान छोड़ दें और सबको एक ही में कर दें, दुविधा में और सुविधा में अंतर कैसे कर पाएंगे हम? यह पहचान जो है, यह वर्चस्ववादी शक्तियों ने उनको हाशिए पर नहीं धकेला है। यह उनकी पहचान, उनकी मुखरता है। वो अपना शास्त्र खुद रचें। और उनके शास्त्र को, उनके अधि... शास्त्र जब मैं कह रहा हूँ इसका मतलब यह है कि अधिकार। है ना... अधिकार, विधि, सिद्धांत, जीवन के नियमन की प्रणाली। जीवन के नियमन की प्रणाली को चुन रहे हैं और उनको कविता में शामिल करके कि भाई यह स्वर है, यहां से आ रहा है। हमारे इस समूह से आ रहा है और आप इसकी उपेक्षा नहीं कर सकते।
अगर एक साथ सबको मिलाकर सिर्फ यह पढ़ें, मोटे तौर पर कह देंगे कि सब जो है 'भक्त कवि' हैं। और भक्ति का तब इंटरप्रिटेशन (interpretation) क्या होगा आप जान रहे हैं आज के समय में। है ना... वो भक्ति किस... भक्ति किसी कवि के लिए भक्ति सिर्फ शिल्प में है। जैसे प्रार्थना पत्र कोई हम लिखते हैं ना, तमाम असहमतियों के बावजूद यह कहते हैं कि 'जी मैं बहुत आज्ञाकारी हूँ, है ना... लेकिन ये मेरी असहमतियां हैं और मैं हमेशा आज्ञाकारी रहूंगा।' शिल्प सिर्फ है। लेकिन असहमति का शिल्प भी है वो।
इनको ऐसे पहचानिए न इन कवियों को, इनकी कैटेगरी को बुरा नहीं मानना चाहिए। मैं यह कहता हूँ कि कोई हाशिए पर अब आपको नहीं कर सकता लोकतांत्रिक व्यवस्था में। इतनी पहचान मिल गई न कि आपकी आइडेंटिटी है। अगर उस पहचान को दर्ज न किया जाए, तब यह होगा कि सबमें शामिल करके इनकी पहचान को खत्म करो। ये अस्मिता इसीलिए कहा गया कि अस्मिताएं कहां... कितनी हैं अस्मिताएं? सबकी पहचान होनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि कोई समूह में कम है आप उसको समाप्त कर देना चाहते हैं? कोई बोली चार लोगों की बोली है वह अधिकार नहीं पाएगी? हम सिर्फ चार के समूह में हैं आप हमारी स्थानीयता को, हमारी अस्मिता को खत्म कर देंगे?
वर्चस्व वहां शुरू होगा जब हम चार लोगों को नगण्य मानना शुरू कर देंगे। मेजोरिटेरियन (majoritarian) का यह खतरा हो जाएगा। कि जी मेजोरिटेरियन वाला खतरा है। उस आइडेंटिटी को अगर दर्ज किया जा रहा है, संख्या बल से नहीं देखना चाहिए। देखना यह चाहिए कि उनकी उपस्थिति है या नहीं है। उनका अपना शास्त्र, नियम, जीवन शैली, सिद्धांत उपस्थित हैं या नहीं हैं। यानी उनके बगैर आज की कविता पर बातचीत नहीं कर सकते। यह एक उपलब्धि के तौर पर देखा जाना चाहिए।
आज की कविता का, समकालीन कविता का अगर आप कोई मानचित्र बनाएंगे, उसमें स्त्री, दलित, आदिवासी... इनके बगैर वह मानचित्र पूरा नहीं होता। पूरा नहीं क्या होता, मैं यह कहूंगा कि उसके बगैर वह मानचित्र बिल्कुल ही मतलब... यह कह सकते हैं कि एक बड़े दायरे को मैं समेट कर कहूँ... और अगर अध्ययन की सुविधा से और प्रवृत्ति-मूलकता के आधार पर मैं कहूँ, वह 70 फीसद है आज की समकालीन कविता का। क्योंकि पीछे से जो चली आ रही कविता है न, उसमें बहुत सारे लोग संभावना नहीं देख रहे हैं। बहुत सारे लोग इन जो नई उभरी हुई प्रवृत्तियां हैं, इसमें संभावना देख रहे हैं।
स्त्री कविता मतलब हमारी आधी आबादी की कविता है। दलित कविता मतलब आप सोच लीजिए इस देश की कितनी बड़ी आबादी की कविता है। इससे आप निकालिए न, वह 70-75-80 फीसद की कविता है? हाशिए की कविता नहीं है। अब ये मुख्यधारा की कविता है। और यही मुख्यधारा की कविता है, इसे स्वीकार करना पड़ेगा। इसको इस रूप में देखिए।
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| योगेश शर्मा |
जी, शुक्रिया सर इस बातचीत के लिए।
योगेश शर्मा
सीनियर रिसर्च फैलो, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
kaushikyogesh09@gmail.com
डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय
एशोसिएट प्रोफ़ेसर, हिंदी विभाग, केन्द्रीय विश्वविद्यालय हरियाणा, महेंद्रगढ़
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का दस्तावेज़ीकरण )
चित्तौड़गढ़ (राजस्थान) से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) अंक-62, अक्टूबर-दिसम्बर 2025
सम्पादक माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक-लेखन सम्पादक विष्णु कुमार शर्मा



बहुत ही ज्ञानवर्धक सार्थक बातचीत। दर्शन, कविता, समाज (उसकी इकाई के रूप में स्वतंत्रता), बिम्ब व प्रतीक इसके समांतर ही समकालीन हिंदी कविता स्वरों को लिए हुए यह आलेख पढ़ा ही जाना चाहिए। हालांकि यह आलेख आपसे यह उम्मीद भी करेगा कि आप इस आलेख के साथ कुछ और भी संदर्भित चीजों को पढ़ें। जिससे इस आलेख की तह में जाया जा सकें और महीन बिंदुओं को समझा जा सकें। भविष्य में भी कविता और दर्शन पर ऐसे सुगठित प्रश्नों के साथ ऐसी बातचीत आनी चाहिए। इसका इंतजार रहेगा...।
जवाब देंहटाएंआपका आलेख अत्यंत प्रभावशाली और प्रेरणादायक है। आपको भविष्य के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंबहुत ही अच्छा संवाद है । कविता में दर्शन , विमर्श आदि महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया है ।बहुत कुछ सीखने को मिला ।
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