- घनश्याम कुमार एवं धर्मेंद्र प्रताप सिंह
शोध
सार
: यात्राएँ किसी भी संस्कृति या समाज को जानने-समझने का सबसे सशक्त माध्यम हैं। इसके सहारे हम अनुभव जगत की एक अलग ही दुनिया देखते हैं, अपवाह और वास्तविकता से परिचित
होकर
इसके
अंतर
को
जान
सकते
हैं।
आज
के
हिन्दी
गद्य
साहित्य
को
यात्रा-वृत्तान्त
पुष्पित
और
पल्लवित
कर
रहा
है।
राहुल
सांकृत्यायन,
अज्ञेय,
मोहन
राकेश,
निर्मल
वर्मा,
धर्मवीर
भारती,
असगर
वज़ाहत,
पंकज
विष्ट,
अजय
सोडानी
आदि
से
होते
हुए
यह
विधा
दिनोंदिन
समृद्ध
होती
जा
रही
है।
रामशरण
जोशी
का
नाम
इसी
कड़ी
में
लिया
जा
सकता
है।
रामशरण
जोशी
के
यात्रावृतांत
भारत
के
पड़ोसी
देशों
एवं
भारत
के
आदिवासी
समाज
के
आचार-विचार,
व्यवहार,
खान-पान,
वेषभूषा
और
समय
के
साथ
उनके
जीवन
में
होने
वाले
वैश्विक
परिवर्तन
को
मजबूती
से
रेखांकित
करते
हैं।
उनके
यात्रा
वृतांत
में
आदिवासी
समाज
के
ऊपर
हुए
अत्याचार,
संसाधनों
से
परिपूर्ण
होने
के
बावजूद
जबरन
विस्थापन,
औद्योगिकीकरण
से
जीवन
शैली
में
परिवर्तन
को
लक्षित
किया
जा
सकता
है।
भारत
के
पड़ोसी
जनों
के
आत्मिक
और
भावनात्मक
लगाव
को
रेखांकित
किया
गया
है।
रामशरण
जोशी
ने
अपनी
लेखनी
से
आदिवासी
समाज
का
जो
चित्र
खींचा
है,
वह
साहित्य
में
विरले
ही
दिखाई
पड़ता
है।
उन्होंने
छत्तीसगढ़,
उड़ीसा,
मध्यप्रदेश,
झारखंड,
बिहार
के
आदिवासियों
की
समस्याओं
को
भाषा
और
पहचान
दी,
जो
अयस्क
के
पहाड़
और
रंगीन
पानी
पीने
के
लिए
बाध्य
हैं।
रामशरण
जोशी
के
ये
यात्रा
वृत्तान्त
केंद्र
से
दूर
बसे
जनों
से
बातचीत
करने
और
उनके
जीवन
संघर्ष
को
समझने
का
आधार
है।
प्रस्तुत
शोध-पत्र
यात्रावृत्तांतकार
की
पुस्तक
‘अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर’
और
‘यादों
का
लाल
गलियारा
: दंतेवाड़ा’
को
आधार
बनाकर
वैश्वीकरण
के
आलोक
में
भारत
के
आदिवासी
समाज
और
पड़ोसी
देशों
की
राजनीतिक-सामाजिक
गतिविधियों
की
पड़ताल
करने
का
प्रयास
किया
गया
है।
बीज शब्द
: यात्रावृत्तान्त,
मामा
लोग,
पाइकमन,
पूँजीवाद,
औद्योगिकीकरण,
बंधुवा,
लाल
गलियारा,
दंतेवाड़ा,
गुंडाधूर,
दँतेश्वरी
माई,
माओवाद,
नक्सलवाद,
विदेश
नीति।
मूल
आलेख
: यात्राएँ जीवन
का
उत्सव
हैं
चाहे
सफर
छोटा
हो
या
बड़ा,
उसके
हरेक
पल
का
स्मृति
के
पन्नों
पर
अंकित
हो
जाना
तथा
बिना
किसी
व्यवधान
के
उसको
जीना
एक
सुखद-कोमल
कल्पनाओं
से
खुद
को
सिंचित
करना
है।
यह
मनुष्य
के
अनुभव
जगत्
को
विस्तीर्ण
करता
है।
जब
हमारी
स्मृतियों
और
दुनियाँ
के
रमणीय
स्थलों
को
इंटरनेट,
टेलीविजन,
मोबाईल,
कृत्रिम
बुद्धिमत्ता
के
सहारे
देखा
जा
रहा
हो,
ऐसे
में
वहाँ
के
जन-जीवन
को
प्रत्यक्ष
देखना,
वहाँ
की
कलाकृतियों
को
देखकर
महसूस
करना,
अच्छी
और
बुरी
चीज़ों
का
स्वाद
लेना
अपने
आप
में
विशेष
है।
यात्राओं
के
रोमांस
को
बयां
करते
हुए
‘यात्रा
चक्र’
में
धर्मवीर
भारती
लिखते
हैं
कि-
“जब
सचमुच
यात्राएँ
कीं
तो
पाया
कि
यात्राओं
का
रोमांच
तो
होता
है
पर
वैसा
नहीं।
हम
अपरिचित
देश
में
जाते
हैं।
अनजानी
भाषा,
अनजाने
लोग,
अपरिचित
प्रकृति-परिवेश
और
अलग
तरह
का
रहन-सहन,
इन
सबसे
परिचय
का
एक
रोमांच
तो
होता
ही
है,
पर
एक
और
चीज़
होती
है।
इन
यात्राओं
में
आप
केवल
एक
भौगोलिक
बिन्दु
से
नहीं
गुजरते।
एक
इतिहास
के
मोड़
से
भी
गुजरते
हैं
और
वे
सब,
उनका
देश
उनका
समाज
भी
इतिहास
के
एक
दौर
से
गुजर
रहा
होता
है।
यात्राओं
में
स्थान
(भूगोल)
के
साथ
समय
(इतिहास)
का
भी
यह
आयाम
जुड़
जाय
तो
यात्रा
का
रोमांच
और
भी
सार्थक
हो
उठता
है।”1
ठीक
इन्हीं
तरह
के
अनुभव
से
होते
हुए
हिन्दी
के
सुप्रसिद्ध
हस्ताक्षर,
पत्रकार
रामशरण
जोशी
के
यात्रावृत्तांत
गुज़रते
हैं।
उनके
यात्रावृत्तांत
में
संपृक्त
हैं-
वे
सभी,
जिनसे
उनकी
मुलाकात
होती
है,
उनकी
पीड़ाएँ,
रोजमर्रा
के
जद्दोजहद
और
सरकार
के
लोक-लुभावन
योजनाएँ।
उनकी
यात्राओं
में
देश-विदेश
की
धरती
पर
रह
रहे
लोगों
का
आत्मिक
हुआ
है।
रामशरण
जोशी
पेशे
से
पत्रकार
हैं
और
उनका
जन्म
राजस्थान
के
अलवर
में
6 मार्च,
1944 को
हुआ।
भारत
के
प्रतिष्ठित
संस्थानों
में
अध्ययन-अध्यापन
और
पत्रकारिता
में
विशेष
ख्याति
प्राप्त
करने
वाले
रामशरण
जोशी
ने
हिन्दी
जगत
को
अनेक
पुस्तकें
दी
जिनमें
यात्रा
वृतांत
के
रूप
में
'आदमी,
बैल
और
सपने’(
2008), ‘अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर’
(2012) तथा
‘यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा’
(2015) प्रसिद्ध
हैं।
इन
यात्रा-वृतांतों
के
सहारे
लेखक
ने
भारत
और
पड़ोसी
देशों
के
जनमानस
के
अंतर्मन
की
पीड़ा
को
सहज-सरल
शब्दों
में
प्रस्तुत
किया
है।
पत्रकारिता
और
साहित्य
में
गहरा
संबंध
है
और
पत्रकार
के
रूप
में
उन्होंने
जो
यात्राएँ
की
उनका
साहित्यिक
अवलोकन
ये
यात्रा-वृतांत
करते
हैं।
‘अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर’
में
उन्होंने
भारत
के
पड़ोसी
देश
पाकिस्तान,
श्रीलंका,
चीन,
काबुल
और
मॉरीशस
तथा
नामीबिया
की
यात्राओं,
वहाँ
की
राजनीतिक-सामाजिक
व्यवस्था,
जनजीवन,
महिलाओं
की
दशा
आदि
का
उल्लेख
किया
है
और
‘यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा’
में
भारत
के
आदिवासी
और
पिछड़े
इलाके
के
लोगों
का
आँखों
देखी
दारुण
कथा
कही
है।
ये
यात्रा
वृतांत
केवल
भौगोलिक,
सांस्कृतिक,
ऐतिहासिक
ही
नहीं;
बल्कि
राजनीतिक
दकियानूसी,
पूँजीवाद
के
दुष्प्रभाव,
बाज़ारवादी
संस्कृति
के
तले
गुम
होती
मानवीय
आत्मनिर्भरता
और
न्यायपूर्ण
जीवन
संरचना
के
धूमिल
होने
की
कथा
कहते
हैं।
उर्दू
अदब
के
मशहूर
हस्ताक्षर
जौन
एलिया
का
एक
शेर
है-
“इस
समुन्दर
पे
तिश्ना-काम
हूँ
मैं
/ बान
तुम
अब
भी
बह
रही
हो
क्या”।
‘बान’
जो
उत्तर
प्रदेश
में
बहने
वाली
एक
नदी
का
नाम
है,
जिसके
किनारे
जौन
एलिया
का
घर
हुआ
करता
था।
उसकी
याद
जौन
को
बहुत
सताती
थी।
रामशरण
जोशी
के
यात्रा
वृतांत
‘अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर’
में
उल्लिखित
पात्र
एक
सीमा
तक
उसी
जन्मभूमि
के
लगाव
की
बात
करते
हैं।
इस
यात्रा
में
कुछ
यात्री
ऐसे
मिलते
हैं,
जिनके
मन
में
अपनी
जन्मभूमि
को
लेकर
अगाध
श्रद्धा
और
बंटवारे
के
असहनीय
दर्द
मौजूद
हैं।
इसमें
पाकिस्तान
से
संबंधित
तीन,
काबूल,
श्रीलंका,
मॉरीशस,
नामीबिया
और
चीन
से
संबंधित
एक-एक
अध्याय
मौजूद
हैं।2
रामशरण
जोशी
एक
पत्रकार
के
रूप
में
भारत
और
पड़ोसी
देशों
की
विदेश
नीति
का
जनता
पर
पड़ने
वाले
प्रभाव
का
विश्लेषण
करते
हैं।
इसके
लिए
वे
पत्रकारों,
बुद्धजीवियों
से
विचार-विमर्श
करते
हैं।
पाकिस्तान
की
पहली
यात्रा
के
दौरान
लेखक
की
मुलाकात
होटल
के
एक
कर्मचारी
से
होती
है,
जो
बताता
है
कि
वह
दिल्ली
के
पहाड़गंज
का
रहने
वाला
है।
वह
अपने
माँ
के
बारे
में
बताते
हुए
कहता
है
कि-
“मेरी
अम्मी
ने
कितनी
बार
कहा
है
कि
मैं
दिल्ली
जाऊं?
दोनों
में
कई
बार
बहस
होती
है–
मैं
कहता
हूँ,
‘दिल्ली
में
कौन
है
हमारा?
हिंदुस्तान
में
कौन
जानता
है?
सब
रिश्तेदार
तो
पाकिस्तान
में
हैं।’
तब
रुआसी
मायूसी
से
अम्मी
कहतीं
हैं,
‘रिश्तेदार
न
सही
हिंदुस्तान
तो
है।
वह
हमारा
मुल्क
है।
पहाड़गंज
की
मिट्टी
को
ही
अपनी
पेशानी
पर
लगा
आना।
कुछ
मेरे
लिए
ले
आना।’”3
यहाँ
जन्मस्थली
से
लगाव
और
उससे
बिछुड़ने
का
दर्द
बयान
किया
गया
है
जो
प्रत्येक
मनुष्य
की
सहज
प्रवृत्ति
है।
पुस्तक
की
शुरुआत
‘विडंबनाओं
के
बंदी’
में
लिखते
हैं
कि-
“1972 में
बांगलादेश
के
जन्म
ने
पाकिस्तान
के
इस
‘मिथ’
को
ध्वस्त
कर
दिया
कि
मजहब
से
आधुनिक
राष्ट्र
की
अखंडता
को
सुरक्षित
रखा
जा
सकता
है।
यदि
ऐसा
होता
तो
इराक,
तुर्की
तथा
दूसरे
मुस्लिम
देशों
में
मुक्ति
आंदोलन
का
जन्म
न
होता।”4
रामशरण
जोशी
का
मानना
है
कि
धर्म
के
आधार
पर
बने
देश
की
बुनियाद
कमजोर
होती
है
और
उसका
परिणाम
वहाँ
के
लोगों
को
लंबे
समय
तक
भुगतना
पड़ता
है।
‘यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा’
यात्रा
वृत्तान्त
दो
भाग,
छह
अध्याय,
दो
आख्यान
तथा
दो
परिशिष्ट
में
विभक्त
है।5
1970 से
2015 के
मध्य
भारत
के
पिछड़े
तथा
आदिवासी
प्रदेश
की
जो
यात्रा
रचनाकार
द्वारा
की
गई
उसका
विवरण
और
विश्लेषण
विवेच्य
कृति
में
किया
गया
है।
रामशरण
जोशी
‘आदिवासी
समाज
और
शिक्षा’
नामक
पुस्तक
में
लिखते
हैं
कि-
“इन
द्वीपों
से
मेरा
जुड़ाव
सातवें
दशक
के
प्रारंभ
में
ही
हो
गया
था।
सन्
1971 में
टाइम्स
आफ
इंडिया
के
सहयोगी
प्रकाशन
‘दिनमान’
साप्ताहिक
द्वारा
मुझे
मध्य
प्रदेश
स्थित
बस्तर
के
आदिवासियों
के
बीच
मतदान
की
प्रवृति
के
बारे
में
लिखने
के
लिए
अधिकृत
किया
गया
था।”6
इस
यात्रा
वृतांत
की
शुरूआत
यहीं
से
होती
है।
इसके
शीर्षक
में
मौजूद
‘गलियारा’
का
अर्थ
बताते
हुए
रचनाकार
लिखता
है
कि-
“गलियारा
प्रतीक
है
प्रतिवाद
का,
प्रतिरोध
का,
अस्मिताबोध
का,
समांतर
सृजन
और
वैकल्पिक
व्यवस्था
के
निर्माण
का।”7
इस
गलियारे
में
बस्तर,
दंतेवाड़ा,
सरगुजा,
झारखंड,
बिहार,
उड़ीसा,
पश्चिम
बंगाल,
अबूझमाड़,
तेलंगाना
आदि
क्षेत्रों
के
साथ
कनाडा,
अलबर्टा
के
आदिवासी
क्षेत्र,
जहाँ
उनके
विकास
से
संबंधित
सरकार
की
अनेकों
योजनाओं
के
रहते
हुए
भी
वंचना
को
बहुआयामी
स्तर
पर
जीते
लोग
को
दिखाया
है।
वंचना
के
बारे
में
लेखक
का
मत
है
कि-
“वंचना
के
साथ
अनिवार्य
रूप
से
बेदखली,
उत्पीड़न,
अमानवीयकरण,
परायापन
और
सघन
चुप्पी
जुड़े
होते
हैं।”8
उल्लिखित
वृत्तांत
इसी
वंचना
की
मार्मिक
आख्यायिका
प्रस्तुत
करता
है।
इसकी
शुरुआत
ही
बलिदान
से
होती
है
जिसको
आदिवासी
समाज,
अपने
हक-हकूक
के
लिए
खुशी-खुशी
करते
हैं।
आदिवासी
समाज
जो
जंगलों
में
है,
जिसके
पास
प्रकृति
ने
रत्न,
खनिज,
पेड़-पौधों
आदि
की
संपदा
दी
है,
वह
स्वयं
को
प्राकृतिक
संपदा
का
संरक्षक
मानता
है
और
उसकी
सुरक्षा
के
लिए
पूँजीपतियों
और
सरकार
से
लड़ाई
में
पिछड़ता
जा
रहा
है।
ताकतवर
लोग
द्वारा
जंगलों
से
इन्हें
बेदखल
कर
निकाला
जा
रहा
है
और
विरोध
करने
पर
हत्या
कर
दी
जाती
है।
कुछ
को
तो
जीवनपर्यंत
जेल
में
डाल
दिया
जाता
है।
इन
हाशिये
के
जनों
का
अपराध
क्या
है?
इसका
उत्तर
देते
हुए
रामशरण
जोशी
‘प्रस्थान’
में
लिखते
हैं
कि-
“प्रकृति
ने
उन्हें
सोना,
चांदी,
लोहा,
बॉक्साइट,
मैगनीज,
ताँबा,
एल्यूमुनियम,
कोयला,
तेल,
हीरे-जवाहरात,
अनंत
जल-जंगल-जमीन
का
स्वाभाविक
स्वामी
बना
दिया;
समता,
स्वतंत्रता,
आत्मनिर्भरता
और
न्यायपूर्ण
जीवन
की
संरचना
से
समृद्ध
किया।
इसलिए
इस
जन
ने
अन्य
की
व्यवस्था
में
हस्तक्षेप
नहीं
किया।
यदि
अन्यों
ने
किया
तो
इस
जन
ने
उसका
प्रतिरोध
भी
जरूर
किया।
इस
आत्म-रक्षात्मक
प्रतिरोध
का
मूल्य
इस
जन
को
अपने
असंख्य
व
अवर्णनीय
दैहिक
बलिदान,
विस्थापन,
पलायन,
परतंत्रता,
शोषण
और
उत्पीड़न
के
रूप
में
अदा
करना
पड़ा।”9
आदिवासी
जो
प्राकृतिक
संपदा
से
समृद्ध
हैं,
उनका
शोषण
सभी
जगह
हो
रहा
है
और
इच्छा
के
विरुद्ध
उन्हें
विस्थापित
किया
जा
रहा
है।
आदिवासी
समाज
न
तो
किसी
को
बेवजह
परेशान
करते
हैं
और
न
ही
किसी
धर्म
की
आलोचना
करते
हैं।
धन्य-धान्य
से
युक्त
इन
समुदायों
को
अपने
तुच्छ
स्वार्थों
और
अनितंत्रित
भोग-विलासिता
के
कारण
पूँजीपतियों
द्वारा
बलि
का
बकरा
बनाया
जा
रहा
है
जिसमें
सरकार
पूँजीपतियों
का
साथ
दे
रही
है।
समय
के
साथ
हो
रहे
परिवर्तन
को
‘लाल
गलियारा’
के
माध्यम
से
व्याख्यायित
करते
हुए
रामशरण
जोशी
कहते
हैं
कि-
“1976-77 में
बस्तर
में
‘लाल
गलियारा’
नहीं
था,
यह
सिर्फ
एक
सयाना-शांत
जिला
था।
दंतेवाड़ा,
किरंदूल,
बीजापुर,
भोलापटनम्,
अबूझमाड़,
सुकम,
कोंटा,
नारायणपुर
के
वन-पर्वत
जन
मेमने-खरगोश
से
थे,
फुदक
लिया
करते
थे।
बस!”10
इन
मेमने-खरगोश
से
जनों
की
स्थिति
में
चार-पाँच
दशक
के
उपरांत
काफी
बदलाव
आ
गया
था।
सरकारी
किताबों
और
फ़ाइलों
में
जहाँ
सुख
समृद्धि
के
द्वारा
खुले
थे,
वहीं
रचनाकार
जब
इन
क्षेत्रों
से
वर्ष
2013 में
दूसरी
बार
गुजरते
हैं,
तो
उनकी
आँखें
चुँधिया
जाती
है।
उनके
मन
में
कई
सारे
प्रश्न
एक
साथ
आ
जाते
हैं
जिनका
समाधान
अब-तक
नहीं
किया
जा
सका
है।
इस
यात्रा
वृतांत
में
आततायी
संस्कृति,
विस्थापन,
पलायन,
मुठभेड़,
जोहार,
प्रकृति
से
प्रेम-द्वेष,
बड़ी
कंपनियों
के
सरकारी
अमलों
से
साठगाँठ,
राजनैतिक
नैतिकता
का
विघटन,
माओवाद
के
पक्ष
में
ग्रामीणों
का
समर्थन
दिखता
है।
इसके
प्रथम
भाग
को
छह
अध्याय
में
रखा
गया
है,
जिसके
शीर्षक
है-
‘लाल
गलियारे
में
प्रवेश’,
‘सलाम
जगदलपुर!’,
‘जोहार
दंतेवाड़ा!’,
‘बस्तर
से
वापसी
और
अबूझमाड़
से
मुठभेड़!’,
‘दंतेवाड़ा
गलियारे
से
अलबर्टा
गलियारे
में!’
और
‘काल
यान
के
झरोखे’।11
और
इसके
दूसरे
भाग
में
दो
आख्यान
तथा
दो
परिशिष्ट,
जिसके
शीर्षक
हैं-
‘बैलाडीला
और
आततायी
संस्कृति’,
‘विस्थापन,
पलायन
और
त्रिशंकु’,
‘कतरनों
की
सतह
से
उभरता
चार
दशक
पुराना
लाल
गलियारा’
और
‘चित्रों
में
झलकता
आज
का
लाल
गलियारा’।12
समाचार
कतरनों
के
माध्यम
से
वर्तमान
समाजशास्त्रियों
और
जन
सामान्य
को
तब
की
स्थिति
का
अवलोकन
निश्चय
ही
झकझोरेगा।
रामशरण
जोशी
के
रिपोर्ट
ने
प्रथम
गैर-कांग्रेसी
जनता
पार्टी
सरकार
और
बिहार
सरकार
को
झकझोर
कर
रख
दिया
था।
‘यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा’
मामा
लोग
(आदिवासी),
पाइकमन
(बाहरी
लोग
या
गैर-आदिवासी)
और
सरकार
के
संबंधों
की
परतों
को
खोलती
है।
मामा
लोगों
की
आर्थिक,
राजनीतिक,
सामाजिक
तथा
धार्मिक
मान्यतायें,
पाइकमन
की
सभी
मान्यताओं
से
अलग
हैं।
पुस्तक
में
‘पाइकमन’
शोषक
वर्ग
और
‘मामा
लोग’
शोषित
वर्ग
के
रूप
में
उल्लिखित
हैं।
पाइकमन
को
सहयोग
राजनैतिक
व्यवस्था
या
सरकार
का
पूरा
समर्थन
प्राप्त
है।
औद्योगिकीकरण
के
प्रभाव
का
आँकलन
करने
के
उद्देश्य
से
लेखक
जब
इन
क्षेत्रों
में
जाते
हैं,
तो
पाइकमन
के
अत्याचारों
की
कहानी
सुन
कर
दंग
रह
जाते
हैं।
इनकी
करतूतों
को
बताते
हुए
गृह
मंत्रालय
के
संयुक्त
सचिव
डॉ.
शर्मा
कहते
हैं
कि-
“सब
कुछ
कर
रहे
हैं।
आदिवासियों
की
जमीनें
हड़प
रखी
हैं।
बेनामी
खेती
की
जा
रही
है।
घरों
में
आदिवासियों
को
नौकर
रखा
जाता
है।
उनकी
जमीने
जोती
जाती
हैं।
फसलें
हड़पी
जाती
हैं।
झाड़
कटाई
की
जाती
है।
ठेकेदारों,
फॉरेस्ट
विभाग
से
मिलकर
इमारती
लकड़ी
बेची
जाती
है।
अवैध
शराब
का
धंधा
किया
जाता
है।”13
इन
मामा
लोगों
के
धार्मिक
मान्यताओं
के
साथ
भी
खिलवाड़
किया
गया
है।
इन
क्षेत्रों
में
अनेकों
हिन्दू
देवी-देवताओं
के
निवास
को
देखकर
वर्ष
1971 की
यात्रा
के
दौरान
इस
क्षेत्र
की
धार्मिकता
से
भी
कई
जगह
तुलना
की
है।
जोशी
जी
पहली
बार
जब
यहाँ
आते
हैं,
तो
यहाँ
न
ही
गणेश
भगवान
की
प्रतिमा
होती
है
और
न
ही
ढंग
का
स्कूल;
लेकिन
चालीस-इकतालीस
वर्ष
के
पश्चात्
इन
क्षेत्रों
में
हिन्दू
देवी-देवताओं
की
भरमार
हो
जाती
है।
इनमें
एक
बात
सोचनीय
है
कि
आदिवासी
बहुलता
क्षेत्र
में,
आदिवासियों
की
आस्था
का
कोई
भी
ख्याल
सरकार
नहीं
रख
सकी।
इतना
ही
नहीं
धार्मिक
स्थान
के
जीर्णोंउद्धार
के
नाम
पर
पूरे-के-पूरे
मंदिर
की
संरचना
को
ही
परिवर्तित
किया
जा
रहा
है।
इन
परिवर्तनों
को
देखकर
वृत्तांतकार
लिखते
हैं
कि-
“क्या
गुंडाधूर
की
काल्पनिक
मूर्ति
को
नकूलनार
में
स्थापित
नहीं
किया
जा
सकता
था?
महाराणा
प्रताप-चेतक
चौराहे
के
स्थान
पर
गुंडाधूर
चौराहा
बनाया
जा
सकता
था।
दँतेश्वरी
माई
के
मंदिर
के
सामने
गुंडाधूर
की
विशाल
मूर्ति
लगाई
जा
सकती
थी।
मंदिर
के
परिसर
में
भूमकाल
विद्रोह
को
चित्रकथा
में
उकेरा
जा
सकता
था।
पर
ऐसा
कभी
नहीं
हुआ,
दंतेवाड़ा
से
लेकर
जसपुर
तक
केवल
प्रभुत्व
वर्ग
के
देवी-देवता,
नायक-नायिकाएँ,
धार्मिक
ग्रंथ
आपको
चिढ़ाते
हुए
मिल
जाएँगे।”14
यह
कहानी
केवल
दंतेवाड़ा
की
नहीं;
बल्कि
भारत
के
विभिन्न
हिस्सों
में
फैले
आदिवासी
समाज
की
कहानी
है।
पलामू
जो
पहले
बिहार
का
हिस्सा
था,
में
भी
ऐसे
चित्र
देखने
को
मिलते
हैं।
बिहार,
पश्चिम
बंगाल,
उड़ीसा,
झारखंड,
मध्यप्रदेश
सभी
जगहों
की
यही
गति
है।
खास
कर
उत्तर
भारत
के
विभिन्न
प्रांतों
के मुख्य जगहों के भ्रमण के उपरांत मैंने भी आदिवासी समुदाय के किसी बड़े मंदिर को नहीं देखा। झारखंड का देवघर, बिहार के भागलपुर, बांका, मुंगेर, पूर्णिया, मधेपुरा, कटिहार, उत्तर प्रदेश के बनारस, मिर्जापुर, लखनऊ, प्रयागराज,
दिल्ली,
चंडीगढ़,
मध्यप्रदेश
का
इंदौर,
भोपाल,
कर्नाटक
के
मंगलूर,
केरल
में
कोई
भी
प्रसिद्ध
मंदिर
जो
आदिवासी
समाज
से
संबंधित
हो
नहीं
देखने
में
आया।
ऐसा
नहीं
है
कि
उनके
देवी-देवता
नहीं
हैं,
पर
उनकी
प्रसिद्धि
वैसी
नहीं
होने
दी
गयी।
औद्योगिकीकरण
के
प्रभाव
के
अध्ययन
के
दौरान
की
गई
यात्रा
और
वर्तमान
में
की
गई
यात्रा
में
देखे
गए
नज़ारे
भिन्न
थे।
इन
क्षेत्रों
के
मामा
लोग
जो
मेमने-खरगोश
की
तरह
थे,
चार
दशक
बाद
उनकी
बलि
चढ़ाई
जा
रही
है।
स्त्रियों
की
हालत
बद-से-बदतर
हो
चुकी
है।
इस
समाज
की
स्त्रियों
की
दशा,
भारत
के
अन्य
समाज
की
स्त्रियों
की
दशा
से
काफी
अच्छी
हुआ
करती
थी।
अब
ये
पाइकमन
के
हत्थे
शोषित
हो
रहीं
हैं।
अनेकों
महिलायें
बिना
बाप
के
बच्चे
को
जन्म
दे
रही
हैं।
ये
पाइकन
उनकों
मनोरंजन
का
साधन
बना
बैठे
हैं।
रामशरण
जोशी
उनकी
अवस्था
का
मूल्यांकन
करते
हुए
लिखते
है
कि-
“मैं
देख
रहा
हूँ
ट्रक
में
करीब
बारह-पंद्रह
आदिवासी
युवतियाँ
हैं,
तीन-चार
उतर
रही
हैं।
दो-तीन
आदमी
भी
दिखाई
दे
रहे
हैं-गैर
आदिवासी
लग
रहे
हैं।
ये
लोग
युवतियों
के
साथ
छेड़छाड़
भी
कर
रहे
हैं।
युवतियाँ
हँसती
हैं,
उनकी
हरकतों
का
अनमने
भाव
से
विरोध
भी
कर
रही
हैं।...
युवतियाँ
कोई
गाना
शुरू
कर
देती
है
जिसे
मैं
समझ
नहीं
पा
रहा
हूँ।”15
आदिवासी
मजदूर
हो
चुके
हैं।
इस
समाज
की
अपनी
आर्थिक
व्यवस्था
थी
वो
अब
ध्वस्त
हो
चुकी
है।
आज
हम
जिस
आत्मनिर्भरता
की
बात
करते
हैं,
ये
पहले
वैसी
ही
थे।
अब
आदिवासी
कर्जे
में
डूबें
हैं
और
बंधुवा
मजदूरी
कर
रहे
हैं।
अपनी
ज़मीने
बेच
चुके
हैं।
औद्योगीकरण
का
पर्यावरण
पर
प्रभाव
ऐसा
है
कि
खनिज
संपदा
के
दोहन
हेतु,
ये
विनाश
दिखाई
ही
नहीं
पड़ते।
इनकी
कीमत
निरीह
जन
अपने
जान
से
चुकाते
हैं।
इसकी
विभीषिका
का
जिक्र
करते
हुए
लेखक
ने
लिखा
कि-
“किरंदुल
में
प्रवेश
करते
ही
मुझे
झटका
लगता
है।
मैं
देख
रहा
हूँ
चारों
तरफ
लोहे
के
पहाड़ों
से
निकल
रही
गेरुआ
गर्द
छाई
हुई
है।
अयस्क
लौह
गर्द
के
पहाड़
जन्म
ले
रहे
हैं।
पहाड़ों
के
छाती
पर
ट्रक
रेंग
रहे
हैं,
दानव
शक्ली
डंपरों
का
शोर
सुनाई
दे
रहा
है।
धुलाई
संयंत्र
से
निरंतर
लाल
पानी
निकल
रहा
है।
इसी
के
किनारों
पर
बसी
श्रमिक
बस्तियाँ,
झोपड़ियाँ
औद्योगिक
सभ्यता
के
फलने-फूलने
की
घोषणा
कर
रही
हैं।”16
इसने
प्रकृति
और
आदिवासी
सभ्यता
को
निगल
लिया
और
दुनियाँ
को
सुख-सुविधाओं
का
अंबार
दिया
है।
वैश्वीकरण
के
भँवरजाल
से
पढ़े-लिखे
बुद्धिजीवी
नहीं
बच
पर
रहे
हैं
तो
केंद्र
से
दूर
आदिवासी
समुदाय
कैसे
बच
सकता
है?
खासतौर
से
तब
जब
सरकार
के
सभी
औज़ार
पूंजीपतियों
के
संरक्षक
बने
हों।
पूरी
शिक्षा
व्यवस्था
उन्हें
अज्ञानी
सिद्ध
करने
में
लगी
हो।
रामशरण
जोशी
अपने
इन
यात्रा
वृत्तांतों
के
माध्यम
से
आदिवासी
और
सुदूर
अपनों
से
बिछड़े
लोगों
की
आवाज़
बनते
हुए
दिखाई
देते
हैं।
निष्कर्ष : रामशरण
जोशी
के
पत्रकारिक
यात्रा
से
निकले
हुए
ये
यात्रा
वृत्तांत
पिछड़े
और
बिछुड़े,
साधारण
जनों
की
मार्मिक
दशा
का
आंकलन
करने
के
साथ
ही
पाठकों
को
उनके
बारे
में
सोचने
को
विवश
करते
हैं। उनके वास्तविक पात्र की भाषा में एक दर्द है, अपनों से अलगाव की पीड़ा है, जबरन आधुनिक और धार्मिक बनने के चलन में अपनों और अपने मूल से कटने की कसमसाहट है, साथ ही, औद्योगिकीकरण के अनेकों
हथकंडे
मौजूद
हैं।
रामशरण
जोशी
की
लेखनी
सरकार,
सरकारी
अमलों
के
ढुलमुल
कार्य
और
उनके
दुष्परिणाम
को
सहते
मामा
लोग
के
भूखे-नंगे
की
तस्वीर
को
उकेरती
है।
अपने
अधिकार,
अपने
जल-जंगल-ज़मीन,
अपने
धार्मिक
मान्यताओं
पर
आरोपित
अन्य
मान्यताओं
के
प्रति
विद्रोह
का
सुदृढ़
लेखा-जोखा
है।
पूंजीवाद
और
औद्योगिकीकरण
के
नाकरात्मक
प्रभाव
से
विनाश
को
आत्मसात
करती
प्रकृति
के
प्रामाणिक
चित्र
मौजूद
हैं।
कुल
मिलाकर
रामशरण
जोशी
के
ये
यात्रावृत्तांत
साहित्य
जगत
ही
नहीं,
सम्पूर्ण
समाज
के
वैज्ञानिकों
के
लिए
एक
अमूल्य
निधि
है।
जिनके
सहारे
वर्तमान
पीढ़ी
उनसे
रु-ब-रु
होती
है
और
उनके
दर्द
के
साथ
जुड़
जाती
है।
मुख्य
धारा
से
दूर
जंगलों
के
निवासी
अपनी
और
अपनों
से
झोली
फैलाए
मांगती
नज़र
आती
है
स्वतंत्रता,
समता,
बंधुत्व।
संदर्भ :
- धर्मवीर
भारती,
यात्रा
चक्र,
चक्रार्पण,
वाणी
प्रकाशन,
नयी
दिल्ली,
द्वितीय
संस्करण
1999
- रामशरण
जोशी,
अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर,
कल्याणी
शिक्षा
परिषद्,
नई
दिल्ली,
संस्करण
2012
- रामशरण
जोशी,
अपनों
के
पास
अपनों
से
दूर,
कल्याणी
शिक्षा
परिषद्,
नई
दिल्ली,
संस्करण
2012, पृष्ठ- 70
- वही,
पृष्ठ-
11
- रामशरण
जोशी,
यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा,
अनुक्रम,
राजकमल
प्रकाशन
प्रा.
लि.,
नयी
दिल्ली,
प्रथम
संस्करण
2015
- रामशरण
जोशी,
अनु.
अरुण
प्रकाश,
आदिवासी
समाज
और
शिक्षा,
ग्रंथ
शिल्पी,
नई
दिल्ली,
पुनर्मुद्रण-
2012
- रामशरण
जोशी,
यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा,
अनुक्रम,
राजकमल
प्रकाशन
प्रा.
लि.,
नयी
दिल्ली,
पहली
आवृति
2024, पृष्ठ-124
- रामशरण
जोशी,
अनु.
अरुण
प्रकाश,
आदिवासी
समाज
और
शिक्षा,
ग्रंथ
शिल्पी,
नई
दिल्ली,
पुनर्मुद्रण
2012
- रामशरण
जोशी,
यादों
का
लाल
गलियारा
दंतेवाड़ा,
अनुक्रम,
राजकमल
प्रकाशन
प्रा.
लि.,
नयी
दिल्ली,
पहली
आवृति
2024, पृष्ठ- 08
- वही,
पृष्ठ-
11
- वही,
अनुक्रमणिका
- वही,
अनुक्रमणिका
- वही,
पृष्ठ-
45
- वही,
पृष्ठ-
55
- वही,
पृष्ठ-
71
- वही,
पृष्ठ-
73
शोधार्थी, हिन्दी विभाग,केरल केन्द्रीय विश्वविद्यालय, पेरिया कसारगोड, केरल, 671320

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