संस्मरण : जगत् बुआजी जिंदा है / हेमंत कुमार

जगत् बुआजी जिंदा है
- हेमंत कुमार

            वह हुकहुकी (आतुर जिज्ञासा) की उम्र, वे धुकधुकी के दिन! जुलाई 1999 आसमान बदराया। खेतों की हथेली पर हल से खींची सीधी लकीरों में किसानों की उम्मीदें उगने लगी थी। जब से दसवीं की बोर्ड क्लास का रिजल्ट आया था मन में दोगाचित्ती थी। आगे क्या और कहाँ? आखिरकार शहर जाने की रुत सिर पर थी। शहर को लेकर डर और उत्सुकता दोनों। गाँव से मिलने शहर अब तक पिताजी के साथ थेलों में बैठकर बस में सफर करता हुआ आया था, आम, केलों, पेमली बेर, अचार के लिए हरी मिर्ची, कपड़े के थानों, गुड़, शक्कर, चीनी, कोर्स की किताबों आदि की सूरत में। अजाना और आकर्षक था शहर! गाँव कभी शहर जाता था बोरों में भरी फसल, ऊँट गाड़ी पर लदे मँगदूणे ( जलावण की लकड़ियों), आवे-कावे (ब्याह, मौसर आदि) के लिए कर्ज के पैसों से परम्परा की लीक पीटने, रीत निभाने को। सीधा और सादा था गाँव।  मगर यह सूरत दूसरी थी। हाल के बरसों में दसवें दर्जे के बाद गाँव के कई लड़के शहर आने लगे थे। एक बरस पहले बड़े भैया के शहर पढ़ने की बारी आई तो पिताजी ने स्कूल का पता लगाया। घर आकर बोले कोई 'विकलांगिया स्कूल' है या ऐसा ही कोई नाम है। अभी जीभ के आँटा रहा है। जीभ का आँटा निकला प्रवेश फार्म देखकर। स्कूल विकलांगिया नहीं चितलांगिया थी। सीकर के सरकारी स्कूलों में ऐसके स्कूल नामी थी। जिनका वहाँ प्रवेश नहीं होता वे चितलांगिया स्कूल में आवेदन करते। इसके अलावा जैन स्कूल और विदावत स्कूल ट्रस्ट की स्कूलें थीं।

            भाई फतेहपुरी गेट के पास किसी के साथ साझे में रहे एक बरस। अगले बरस मुझे भी पढ़ना था, वही चितलांगिया स्कूल। दो जने हो गए तो अलग कमरा लेना जरूरी हो गया। पिताजी का इकातरे- दो दिन से शहर आना-जाना लगा रहता। बस स्टेण्ड से बाजार तक के दुकनदार उन्हें पहचानते। एक दुकनदार मूळजी जो जन्मना ब्राह्मण होकर मर्जी से दर्जी बन गए थे, हालांकि मर्जी मन की होकर पेट की थी। उन्होंने बताया कि कमरा बुआ जी के यहाँ मिल जाएगा। बुआजी रिश्ते में सब की बुआजी थी, फुफाजी समेत बुआजी खुद की भी बुआजी ही लगती थी। सिर्फ पानी और बिजली के बिल को बुआजी का नाम लेने  की इजाजत थी।

           नानी गेट से सुभाष चौक की तरफ चलने पर भैरूजी की गळी के लगभग सामने सोढ़ाणियों की गळी। दाँयें कोने पर कतियाँ (कत्थई) रंग की दोनों बगल में पसीने से सिंचित बनियान और नीले रंग की सदाबहार पेंट में निवास करने वाले काळूजी की दीवार में बनी अलमारी में चाय की दुकान रहती थी। काळूजी पेट से साँस लेते थे। साँस लेते वक्त पेट बनियान का घूँघट ऊपर खिसका देता। साँस हरदम चलती थी तो पेट का घूँघट भी उघड़ा रहता। काळूजी को जब कभी लगता कि गली से कोई महिला गुजर रही है तो वे एक हाथ से बनियान का घूँघट पेट पर खींचते। पर घूँघट ऑटोमेटिक था, सो हाथ छोड़ते ही दुकान के शटर की तरह यथास्थान पहुँच जाता। पेट की देखादेखी दुकान ने भी एक पत्थर की पट्टी रखकर गली में अतिक्रमण कर रखा था।

           यहाँ से दस कदम पर बाएँ बाजू डेयरी, उसके चार-छह कदम आगे मूळजी की दुकान। उससे बीसेक कदम पर उत्तरमुखी रामूजी की आटा चक्की। जिस पर खुद रामूजी की हस्तलिपि में नीले पेंट से 'शरमा फ्लोर मिल' लिखा रहता। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है कि कहावत को चरितार्थ करने के लिए रामूजी की सफेद बनियान भी उनकी खाकी पेंट का रंग अख़्तियार किए रखती थी।

           चक्की से दाएँ मुड़ते ही वह ऐतिहासिक 'बुआजी -भवन' था। बाहर बारामदा। बारामदे के बाँयी ओर सीमेंट की एक कोठी। कोठी के पास 'आनंदभवन।' अंदर बंद चौक। चौक में फिर से पानी की दो सीमेंटेड कोठियाँ। रसोई और तीन कमरे नीचे। दो कमरे ऊपर। ऊपर के कमरों तक पहुँचने के लिए खड़ी सीढ़ियाँ। तीन सदस्य घर के मूल निवासी। एक बुआजी, दूसरे फूफाजी, तीसरा मुड़ा हुआ सरिया। तीनों ही 'दायित्ववान कार्यकर्ता!' एक का काम कमाना, दूसरे का काम बनाना, तीसरे का काम निपटाना। तीनों की तीन तरह की आवाज़ें। तीन तरह के रहवास। सो के पास वाले कमरे में बुआजी रहतीं। कोने वाले कमरे में फूफाजी। मुड़ा हुआ सरिया रहता बाहर 'आनंदभवन' में।

           तो ऊपर का एक कमरा तय हो गया। तीन सौ रूपये महीना भाड़ा। ऊपर के एक कमरे में हम दोनों भाई रहते। दूसरे में मुन्नालाल जी उर्फ मास्टर जी और उनका छोटा भाई गोरधन। गाँव से शहर आया तो कुछ बदलाव आया। कत्थई रंग की पेंट और क्रीम रंग का शर्ट सिल दिया मूळजी ने। नई आठ नम्बर की राख के रंग की लहर हवाई चप्पल। कमरे में गृहस्थी बसानी थी तो  चूल्हे की जगह केरोसिन से जलने वाला 'नूतन स्टोव' जिसकी बत्तियाँ उकसाकर माचिस की तिल्ली डालने पर नीली लौ जल उठती।  बड़े वाले भाई साहब के ब्याह में मिला 'रवि' कम्पनी का टेबल फेन, आटा गूँथने की परात के रोल में स्टील का टैणिया, सूखे आटे के लिए ढक्कन लगा पीपा, एक तवा, चिमटा, चकला-बेलन, लोटा, गिलास, थाली, दो टोपियों, एक रूई के सोड़िये (गद्दे) की आमद हुई। दो बाल्टियाँ, मग, साबुनदानी के  साथ नई गृहस्थी शुरू हुई। स्त्रीलिंग परात की भूमिका पुल्लिंग टैंणिए को मिली थी तो कुशल गृहिणी की भूमिका हम अकुशल 'गृहिणों' को। घर से बाहर की दुनिया में निकले लड़कों को रूम पर लौटकर अपनी  माँ, दादी, बहन आदि की भूमिका खुद ही निभानी होती है।

कमरे से सोढ़ाणी गली, सुभाष चौक, गणेश जी के मंदिर के पास माहेश्वरी भवन की गली से गुजरते हुए चितलांगिया स्कूल पहुँचना। उसी राह से वापसी। एक रोज सम्राट सिनेमा के पास फुटपाथ से दस रुपये में एक किताब खरीदी- 'विश्व में कौन, कहाँ, कैसे?' उसी में एक प्रश्न था - दुनिया का वह देश जिसमें एक भी महिला नहीं। उत्तर था -वेटिकन सिटी।' स्कूल भी वेटिकन सिटी ही था, पुरुष अध्यापक और छात्र! स्कूल का मुख्य दरवाजा यों तो कोतवाली रोड पर खुलता था पर पीछे खड़ी कन्या पाठशाला को देखने के लिए एक छोटा  दरवाजा पीछे की ओर भी विकसित हो गया था जो हमेशा नेता टाइप छात्रों से आबाद रहता। किशोर कामनाओं के बावजूद स्त्रीलिंग के नाम पर स्कूल में मेज-कुर्सी तो कमरे पर चड्ढी-बनियान और झाडू ही अवेलेबल थी। इसी से उपजी कुंठा ने राह में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न कर दी थी। यद्यपि स्कूल आर्ट्स का था पर कुछ छात्र जन्मजात वैज्ञानिक थे। एक ऐसे ही वैज्ञानिक रुचि वाले छात्र ने एक गधे का पूर्णतः स्वदेशी तकनीक से सफलतापूर्वक लिंग परिवर्तन कर दिखाया था। हुआ यों कि चितलांगिया स्कूल से फतेहपुरी गेट की तरफ चलने पर एक पुरानी दीवार के बचाव में किसी ने लिखा था ,"देखो, गधा मूत रहा है।" इसी प्राकृतिक क्रिया को संपादित करते हुए छात्र ने देखा कि उसके किए कराए का सारा श्रेय गधे को मिल रहा है। लिखे हुए गधे को देखकर उसके जेहन में देखा हुआ गधा साकार हो गया। '' की खड़ी पाई और की मात्रा गधे के अगले पैर।  '' की खड़ी पाई और ऊपर उठा आधा '' पिछली टाँग। गधा जैसे अभी रेंकने लगेगा - "आँऽआँ..चिक्..! आँऽआँ..चिक्…! आँऽआँ..चिक्..! किस्काँय…! किस्काँय…! किस्काँय…! आँयआँय..आँय..आँऽआँ..चिक्आँऽऽऽ!"

            उसने आहिस्ता नुकीला पत्थर उठाया। पहले स्टेज में 'रहा है' को 'रही है' बनाया। दूसरे चरण में गधे की उठी और मुड़ी हुई पिछली टाँग ( का उठा हुआ हिस्सा) का तिरछा खींचते हुए उसे 'राधा' बना दिया। ऑपरेशन सफल रहा। राम की चरण रज पाकर पत्थर की शिला अहल्या बन गई थी। छात्र की कला का स्पर्श पाकर गधा राधा बन गया।

            लौटते हैं कमरे पर। बुआजी! 75 वर्ष के आस-पास उम्र। इकहरी काया पर रंगीन धोती। नाक पर चश्मा। माथे पर मध्यम आकार की लाल बिंदी। सिर के बाल सफेद। माँग में होने होने के बीच लुकाछिपी खेलता हल्का का सिंदूर। हाथों में काँच की पतली लाल चूड़ियाँ। ऊपर का होंठ अंगुल भर चौड़ा। जब भावुक होतीं तो ये होंठ आँख फड़कने की तरह काँपता। थरथराता। आँसू कभी पलक तक नहीं आते। कोयों में पानी घुलकर रह जाता। तेज मिजाज। पक्की स्वाभिमानी। दबेल किसी की नहीं। चलाकर झगड़ती नहीं पर कोई ज्यादा श्याणपत (होशियारी) दिखाए तो पूरे मोहल्ले से अकेली मोर्चा मांडने को तैयार।

           पति? था तो सही पर साथ थोड़े ही दिनों का लिखा था। तेरह-चौदह की उम्र में ब्याह हुआ। ब्याह का अर्थ समझने लायक उम्र हुई तब तक पति बुआजी को जगत् बुआजी बनाकर कूच कर गया दुनिया से। मायके लौटी पर नहीं निभी। बनियों के परम्परावादी परिवार में विधवा जीवन की सौ बंदिशें। पर बंदिशें बुआजी को ज्यादा दिन बाँध ना पाई। अप्रत्याशित दुख ने मन की काँप मिट्टी को और मुलायम और चिकना और पक्का कर दिया। चिकना मन, मुलायम मन फिसल गया एक रोज। परिवार से, समाज से, ईश्वर से, भाग्य से बगावत करके बुआजी ने अपने दुहाग को सुहाग में बदल लिया। कैसे हल्की साँवली, कहरे बदन की बुआ गोरेगट्ट, लम्बे तगड़े नौजवान ट्रक ड्राइवर के संपर्क में आईं। घर से भागी कि ब्याह किया। इसका इतिहास तो फब्तियों और किंवदंतियों में ढल चुका था। पर यह सहज अनुमान का विषय है कि आज से सत्तर-अस्सी बरस पहले एक वणिक परिवार की विधवा का बाल-बच्चेदार, रसिक मिजाज, दूसरी जाति के विपन्न युवक के साथ गृहस्थी बसाना और ताउम्र उसे अपनी साधारण शक्ल-सूरत लेकिन गहरे प्रेम के बल कर बाँधकर रखना कितने कठिन कौशल का काम रहा होगा। अपने गहने और बचत जो कुछ भी था उसके पास, उससे यह ढमढेर (मकान) ही खड़ा हो पाया था पर जिंदगी की जरूरतें सिर्फ मकान तक ही तो सीमित नहीं। फिर फूफाजी के इश्क के अलावा कुछ दूसरे शौक भी थे।

           अस्सी की उम्र में भी वे दोपहर ग्यारह-बारह बजे के करीब नहा-धोकर बिना नागा डाई किए बालों को पीछे की ओर संवार कर, आँखों में हल्का सुरमा लगाकर सबसे पहले सुन्नाराण (सूर्यनारायण) को कलशी देते। साँझ-सवेरे छूँतरे फाँकते। बीड़ी नियमित पीते, गाँजा कभी-कभी। लोग-बाग यह भी कहते रहे कि फूफाजी चोरी-छिपे माल (गाँजा) बेचते भी हैं। प्रकट में उनकी आमदनी का जरिया था हफ्ते में एक-दो दिन रोडवेज की बस चलाना। पुराने ड्राइवर थे तो नियमित ड्राइवरों के कामकाज होने पर वे अपनी पृथुल काया पर डबल जेब का खाकी कमीज और खाकी पेंट पहन कर ड्राइवरी कर आते।

           मोहल्ले में बुआजी किसी के घर जातीं, कोई उनके घर आता। संभव है प्रेम करने के अपराध में समाज ने उनका बहिष्कार किया हो। प्रतिक्रिया में उन्होंने भी समाज का बहिष्कार कर रखा था। ईश्वर का भी। फूफाजी के विपरीत वे धार्मिक नहीं थी। मंदिर जातीं, पूजा-व्रत करतीं। धार्मिकता से इतनी तटस्थ महिला मैंने दूसरी नहीं देखी। जीवन के अभावों और आघातों ने पैसे की कीमत बुआजी को अच्छे से समझा दी थी। पाई-पाई को वे दाँत से पकड़तीं। मकान किराया उन्हें एडवांस चाहिए ही चाहिए। घर में पाव दूध आता एक टेम, जिससे दोनों बखत की चाय बनती। उसी में से शेष बचे दूध का दही जमता। सालासर स्टेण्ड की बजाय 'दंग की नसिया' के पास बैठने वाली मालिनों के पास सब्जियाँ सस्ती मिलतीं तो वे वहीं से सब्जियाँ खरीदतीं। कोई भी सब्जी एक पाव से ज्यादा एक साथ खरीदी जाती। खाते-पीते परिवार में मायका और भूतपूर्व ससुराल था सो बनाने-खाने का शौक इस 'अभूतपूर्व' जीवन में भी गया था। इसे पूरा करने के लिए वे एक साथ जरा-जरा सी दो-तीन सब्जियाँ बनातीं। अपनी कुलीनता, रईसी, पाक-कुशलता और ममता के प्रदर्शन का इकलौता साधन बनाई गई सब्जियाँ टेस्ट करवाना था। इसके सामने कंजूसी और गरीबी हार जाते। वे यह मानने को तैयार नहीं होतीं कि बनियों के घर के अलावा सूखी मेथी की मीठी लूँजी और किसी के घर में बन भी सकती है। कभी-कभी एक ही सब्जी को तीन-तीन रूप देती - दम आलू, दही आलू, आलू-गोभी। एक चीज उन्होंने जरूर ऐसी खिलाई जो अन्यत्र बननी तो दूर उसकी कल्पना भी मुश्किल है। बुआजी के घर का इकलौता मेहमान और रिश्तेदार कोई था तो वह था रामपाळ ड्राइवर। बुआजी के उस मेहमान का फूफाजी के साथ चिलम-स्यायी का रिश्ता था। वह जब आता तो किलो-डेढ़ किलो ताजा मटर लेकर आता था। जब तक चिलम तैयार होती वह मटर निकाल-निकाल कर खाता रहता। जब जाता तो बचे मटर और छिलके वहीं छोड़ जाता। बुआ जी उन्हीं मटर के छिलकों के पराठें बनातीं। बेहद लजीज। विधि पूछने पर बुआजी ने इस गुप्त विद्या को बताने से इनकार कर दिया। तब यह विद्या बड़े कौशल से चुराई गई। चौक से चौतरफा छत पर सीमेंटेड जालियों की फिरनी (रेलिंग) लगी थी। अगली बार रामपाळ का आगमन जिस दिन हुआ, उस साँझ ऊपर कमरे के आगे की गैलरी में गडोळ्या (घुटनों के बल) होकर फिरनी के छेदों में से झाँक-झाँक कर पराठों की तकनीक चुराई गई। बुआजी को चार-छह दिन बाद बनाकर खिलाई तो वे भाईसाहब की पाक-पटुता को मान गई। खूब खुश हुईं।

           बुआजी के जनविहीन जीवन में एक पड़ोसिन भी थी -मटकु भाभी! जो बाकी मोहल्ले के विपरीत आते-जाते दो बातें कर लिया करती। मटकु भाभी के परिवार में दो ही लोगों के दर्शन हमने किए थे। एक उनके ससुर जी जो शायद 'जसवंत छाप टेलीफोन बीड़ी' की छिब्बी (स्टीकर) से उतर कर साफा उतारकर चलने-फिरने लगे थे। दूसरी खुद मटकु भाभी थी जो सद्यस्नात गीले बालों में तनी पर वस्त्र सुखाती हुई आश्रमवासिनी सीता सरीखी लगती। नयन सुभग रूप राशि की स्वामिनी मटकु भाभी ससुराल में शायद संवादहीनता की स्थिति में ही थीं।

           एक और पात्र का प्रवेश था बुआजी के यहाँ -दुल्हन का। पर उससे पहले किस्सा मुड़े हुए सरिए का। मकान में जब पहली रात रुके तो दिन भर सामान शिफ्टिंग के कारण बेहद थके थे। सुबह नींद में एक अजीब आवाज़ सुनाई दी -खटखट् -खट्ट् -खळळ्खटखट् -खट्ट् -खळळखटखट् -खट्ट् -खळळ् जब उठे तो बुआजी ने आवाज लगाई, "छोरों! हाजत हो तो गटर में जाकर तीन मग पानी डालकर काँटा हिला देना। तभी साफ होगा।" पहले भाई साहब गए, फिर मैं। नहीं पार पड़ी तो बुआजी ने खुद सिखाया-" ऐसे पानी डालो, ऐसे काँटा हिलाओ -

            खटखट् -खट्ट् -खळळ्खटखट् -खट्ट् -खळळ्…  खटखट् -खट्ट् -खळळ् गिनकर तीन मग, ज्यादा पानी नहीं ढोळना है।" दूसरे दिन भी वही समस्या। तीसरे दिन भी। जैसे बच्चों को इंजेक्शन के नाम से डर लगता है वैसे मुझे चिटिए की तरह दोनों ओर से मुडे उस सरिए से डर लगने लगा। आखिर मूळ जी की दुकान के सामने एक खाली प्लॉट जिसके चारों ओर पत्थर की पट्टियाँ गड़ी थी, उसी में  ब्रह्म मुहूर्त में मुँह अँधेरे दबे पाँव सीढ़ियाँ उतरकर, सधे हाथों से बिना चूँचाट करवाए दरवाजा खोलकर इस समस्या का समाधान खोजा। बुआजी को जब पता चला तो वे परम प्रसन्न हुईं। नित्य दो मग पानी की बचत। एक तो बाहर भी लगना था। लघुशंका के लिए तो वे वैसे ही मना करती थीं-"मोट्यार तो कहीं कर सकता है।" लालच यह था कि कुई कुछ और दिन नहीं भरे। अतः मुए मुड़े हुए सरिए ने  'आनंदभवन' के आनंद से हमें वंचित ही रखा।

           बुआजी के घर तीसरे जिस प्राणी का प्रवेश था, वह थी दुल्हण। दुल्हण तीन-साढ़े तीन फिट की सत्तर साल सिंधी महिला थी जो बावन बरस पहले बँटवारे के वक्त पाकिस्तान से भागकर शरणार्थी के रूप में आई थी। खूब मेहनती। हट्टी-कट्ठी। शरीर में जान। आवाज़ में और भी ज्यादा। हिंदी और मारवाड़ी समझ लेती पर बोलती अपनी सिंधी जबान। बेहद ऊँची आवाज़ में लगातार बोलती जाती। बुआजी उससे फूफाजी के लिए छूतरे कुटवाती या रसोई के लिए हल्दी, धनिया, मिर्च! मिर्च वह मुँह पर चुन्नी का ढाटा बाँधकर कूटती -घम्मघम्मघम्म! दिनभर वह मोहल्ले में इसी तरह के कूटने-पीसने के काम करती। उसके मूसल का घमका तो समझ में आता पर उसकी सिंधी जबान का एक भी शब्द कभी समझ में नहीं आया। उससे ज्यादा तो सरिए की बोली समझ में आती थी -खटखट् -खट्ट् -खळळ... दुल्हण अपने मूसल के घमके की तरह अनजानी, अनसुलझी, अनबूझी आवाज़ थी जिसे ऊखल, मूसल, मसाले और छूँतरे समझते थे।

           बुआजी अछुपाई (स्वच्छता) पसंद थी। बेहद छोयली! दूसरे की गंदगी से गहरी जुगुप्सा रखने वाली। पर नियती ने उससे कम समझौते नहीं करवाए। फूफाजी जो बेहद तोंदियल शरीर के थे, कई बीमारियों से घिर गए। साँस की बीमारी, शूगर, बीपी और भी जाने क्या- क्या! कई बार पेशाब रोक नहीं पाते। कई बार आँगन से आनंदभवन तक कार (पानी की पतली रेखा) लग जाती! एक रोज फूफाजी ने चौक की टंकियों पर हाथ रखकर आसन्न प्रसवा गाय की तरह पीड़ा भरी आवाज में पुकारा - भगवान! राजू की माँ!

            बुआजी को वे सामान्य दिनों में 'बुआजी' ही कहते थे, पाँच वर्ष की उम्र में मर चुकी इकलौती संतान राजू की माँ नहीं। फूफाजी के इलाज के लिए बुआजी ने कोई कसर छोड़ी। दर्द निवारण के लिए किसी ने अजीब दवा बताई। बाहर 'आनंदभवन' में एक डिब्बा रखा गया और हम सबसे कहा गया कि कुछ दिन पेशाब इसी में करें। उसे गरम कर फूफाजी को फाहे बाँधे गए। पूरा घर घिन्ना गया। नाक पर कपड़ा बाँधकर बुआजी ने वह भी किया। बुआ ने उस आदमी के लिए सब किया जिसे उसने चुना, चाहा। भले ही दुनिया कहती रही कि यह तो धरमेंदर है, लुगाई-टाबर सब है इसके। ये तो मकान के लालच में बैठा है।

           आज फूफाजी का बळद सा शरीर, बुआजी की काँप मिट्टी सी साँवली चिकनी काया और वह मकान कुछ नहीं बचा है। पर बची है बिना मंगेतर को धक्का दिए, बिना ड्रम में काटकर भरे, समूचे समाज को ठेंगे पर रखकर, धन-संपत्ति को ठोकर मारकर प्रेम करने, चुनने, जीने और निभाने की कहानी। मीरा की तरह -'लियो री बजंता ढोल!'

      

हेमंत कुमार
सहायक आचार्य (हिंदी), श्री कल्याण राजकीय कन्या महाविद्यालय, सीकर
hemantk058@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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