स्मरण : ‘सब खिलौने ग़ज़ल में ढलते हैं - बशीर बद्र’ / आरती तिवारी

सब खिलौने ग़ज़ल में ढलते हैं - बशीर बद्र
- आरती तिवारी 



कुछ
शायर क़िताबों में रहते हैं, कुछ मंचों पर, कुछ पुरस्कारों और इतिहास के पन्नों में और कुछ ऐसे होते हैं जो चुपचाप आपकी ज़िन्दगी में दाख़िल हो जाते हैं; बिना दस्तक दिए! बशीर बद्र जी ऐसे ही एक शायर हैं।

मैं इनसे कभी नहीं मिली। कभी किसी मुशायरे के बाद इनके साथ चाय पी, किसी क़िताब पर इनका ऑटोग्राफ़ लिया। लेकिन अजीब बात है कि इनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए हमेशा लगा जैसे मैं इन्हें बरसों से जानती हूँ। जैसे किसी पुराने मोहल्ले का कोई बुज़ुर्ग हो, जो हर शाम चौखट पर बैठकर ज़िन्दगी की बातें करता था और हम बच्चे समझते थे कि वह कहानियाँ सुना रहा है, जबकि वह दरअसल जीवन समझा रहा होता था। शायद अच्छे शायर यही करते हैं। वे ग़ज़लें नहीं लिखते, इंसानी दुनियाँ का सच लिखते हैं। मैंने जब पहली बार पढ़ा

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता…”

तो लगा यह शेर किसी दीवान में नहीं, किसी माँ की आँखों में लिखा गया होगा। क्योंकि दुनिया का सबसे बड़ा सच यही है कि रिश्ते ताले नहीं होते जिन्हें बार-बार खोलकर देखा जाए कि ठीक काम कर रहे हैं या नहीं। रिश्ते तो मिट्टी के दीपक हैं जिन्हें ज़्यादा आज़माने पर टूट जाने का ख़तरा रहता है।

बशीर बद्र जी की सबसे बड़ी ख़ूबी यही है कि वे दर्शन को उपदेश नहीं बनने देते। वे उसे इंसानी अनुभव बना देते हैं। मुझे हमेशा लगता है कि इन्होंने शहरों को बहुत ध्यान से देखा था। सिर्फ़ उनकी सड़कें नहीं, उनका स्वभाव भी। वरना कोई कैसे लिख सकता है

कोई हाथ भी मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से

ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

यह शेर शहर के बारे में कम है, समय के बारे में ज़्यादा है। आज लोग एक-दूसरे की प्रोफ़ाइल जानते हैं, लेकिन तकलीफ़ नहीं। फ़ोन नंबर जानते हैं, लेकिन हालचाल नहीं। साथ होने का अभिनय बढ़ा है, साथ होने की क्षमता कम हुई है। शायर ने यह अकेलापन उस समय देख लिया था जब सोशल मीडिया चलन में भी था।

इंसानी जज़्बात के हर रंग में रंगी इनकी ग़ज़लों में प्रेम भी है लेकिन वह फ़िल्मी प्रेम नहीं है। यह तो प्रेम का वो रूप है जो हमारे एहसासों की गर्माहट बरकरार रखता है, जो ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होता, जो किसी के साथ होने पर भी उसकी मौजूदगी क़ायम रखता है। जब वे कहते हैं

मोहब्बत एक ख़ुशबू है हमेशा साथ रहती है

कोई इन्सान तन्हाई में भी तन्हा नहीं रहता

तो मुझे हमेशा लगता है कि प्रेम दरअसल स्मृति का दूसरा नाम है। कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन उनका होना नहीं जाता। जैसे किसी पुराने स्वेटर में बरसों बाद भी किसी अपने की ख़ुशबू रह जाती है। जैसे किसी क़िताब से अचानक एक सूखा हुआ फूल निकल आता है। बशीर बद्र ऐसे ही प्रेम के शायर हैं।

इनकी ग़ज़ल में बिखरी उदासियाँ भी दिल को उतनी ही गहराई से छूती हैं जितना कोई और एहसास। वे चीखती नहीं, धीरे-धीरे उतरती हैं, दिल के आँगन में किसी शाम की तरह और धूप के ढलने के बाद की ठंडक बनकर उसे राहत पहुँचाती हैं। कई बार इनकी ग़ज़लें रेडियो पर बजते किसी पुराने गीत की तरह महसूस होती हैं-

जहाँ पेड़ पर चार दाने लगे

हज़ारों तरफ़ से निशाने लगे

हुई शाम यादों के इक गाँव से

परिन्दे उदासी के आने लगे.....”

क्या कमाल की तस्वीर है! उदासी को परिन्दा बना देना। यादों को गाँव बना देना। यह सिर्फ़ शायरी नहीं है, चित्रकारी है। शब्दों की चित्रकारी....

बशीर बद्र जी को पढ़ते हुए अक्सर मुझे लगता है कि वे टूटे हुए लोगों के शायर हैं। लेकिन फिर भी टूटन का महिमामंडन नहीं करते। वे आपको रोना नहीं सिखाते। जीना सिखाते हैं

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है

जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा...”

कितना बड़ा आत्मविश्वास है इसमें! कोई शोर नहीं। कोई घोषणा नहीं। बस एक शांत विश्वास। जैसे कोई नदी पहाड़ से कह रही होतुम रास्ता मत दो, मैं अपना रास्ता ख़ुद बना लूँगी। या कि जब वो लिखते हैं

चाँद का टुकड़ा सूरज का नुमाइन्दा हूँ

मैं इस बात पे नाज़ा हूँ शर्मिंदा हूँ

तो ऐसा लगता है मानो हर इंसान को अपने वजूद पर नाज़ करना सिखा रहे हों। जैसे दुनियाँ की हर छोटी-बड़ी चीज़ की अहमीयत है और हर एक की अपनी ख़ास जगह है जिसे कोई नहीं ले सकता।

इनकी ग़ज़लों की इसी साफ़गोई ने इनके शेरों को सरहदों के पार लाखों दिलों की आवाज़ बनाया। उर्दू ज़बान के इस महबूब शायर ने उर्दू को कभी बोझ नहीं बनने दिया। इनकी ग़ज़लें पढ़ते हुए ऐसा कभी नहीं लगता कि हम किसी साहित्यिक परीक्षा में बैठे हैं। बल्कि ऐसा लगता है जैसे कोई अपना आदमी बात कर रहा है। बहुत धीरे, बहुत सलीके से, बहुत प्यार से! और शायद यही वजह रही कि इनके शेर आम लोगों की ज़बान पर चढ़ गए। किसी भी बड़े शायर की असली सफलता यही है कि लोग उसे सिर्फ़ उद्धृत (कोट) नहीं करते, बल्कि जीने लगते हैं। कभी-कभी मैं सोचती हूँ कि इनकी ग़ज़लों में घर बार-बार क्यों आता है? शायद इसलिए कि इन्होंने घर का उजड़ना देखा था। टूटना देखा था। खोना देखा था। तभी तो इस दर्द को लिख पाए

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,

तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में…”

यह शेर पढ़कर हमेशा लगता है कि यह सिर्फ़ ईंट और दीवारों की बात नहीं है। यह सपनों की बात है। विश्वास की बात है। उस जीवन की बात है जिसे बनाने में पूरी उम्र लग जाती है और फिर उनका यह शेर

उजाले अपनी यादो के हमारे साथ रहने दो

जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये…”

आरती तिवारी

वाराणसी, . प्र.

artitiwari1jan20@gmail.com

यह सिर्फ़ एक शेर नहीं, उम्र बढ़ने का दर्शन है। जब आदमी जवान होता है तो भविष्य में रहता है। जब परिपक्व होता है तो वर्तमान में और जब जीवन की शाम नज़दीक आती है, तो यादों भूलभुलैया में खो जाने को व्याकुल दिखाई देता है। बशीर बद्र जी की शायरी इनकी ग़ज़लें उन तमाम यादों की सबसे भरोसेमंद पहरेदार हैं।

वैसे तो मैं बशीर बद्र जी से कभी नहीं मिली। लेकिन सच कहूँ तो कई बार ऐसा लगा कि इनसे मिल चुकी हूँ। इनकी ग़ज़लों, तन्हाइयों, मोहब्बतों, उदास शामों के रास्ते। क्योंकि कुछ लोग शरीर से नहीं मिलते। वे अपने शब्दों से मिलते हैं और जो लोग शब्दों से मिलते हैं, वे अक्सर ज़्यादा देर तक साथ रहते हैं। इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भी शायद यही है कि इन्होंने ग़ज़ल को महफ़िलों से निकालकर लोगों के दिलों तक पहुँचा दिया। इन्होंने ही हमें सिखाया कि शायरी सिर्फ़ कहने की चीज़ नहीं होती, जीने की चीज़ भी होती है। शायद इसीलिए जब कभी ज़िन्दगी में शोर बहुत हावी होने लगता है तो  मैं इनकी किसी ग़ज़ल का दरवाज़ा खटखटा लेती हूँ। जिसकी दहलीज़ के अंदर हमेशा एक दीपक जलता हुआ मिलता है, एक कुर्सी खाली मिलती है और ऐसा लगता है जैसे बशीर बद्र जी मुस्कुराकर कह रहे हों-

            बैठो

            ज़िन्दगी पर थोड़ी बात करते हैं…”



अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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