शोध आलेख : चौथीराम यादव की आलोचना-दृष्टि में नागार्जुन, धूमिल और रमाशंकर विद्रोही की कविता / वेदप्रकाश भारती एवं सुरेन्द्र प्रसाद सुमन

चौथीराम यादव की आलोचना-दृष्टि में नागार्जुन, धूमिल और रमाशंकर विद्रोही की कविता
- वेदप्रकाश भारती एवं सुरेन्द्र प्रसाद सुमन

 

शोध सार : हिंदी कविता का इतिहास केवल काव्य-रूपों का इतिहास नहीं है बल्कि, वह सत्ता और  समाज के जटिल संघर्षों का भी इतिहास है। समकालीन हिंदी कविता की जनपक्षधर परंपरा को समझने में आलोचक चौथीराम यादव की आलोचनादृष्टि विशेष महत्त्व रखती है। वे कविता को सौंदर्य की अमूर्त सत्ता मानकर सामाजिक संघर्ष, वर्गीय चेतना और प्रतिरोध की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति एवं सामाजिक हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं। हिंदी कविता में जनपक्षधर परंपरा ने सन्तकाव्य और प्रगतिवादी आंदोलन से ऊर्जा ग्रहण करते हुए जब रुपाकर ग्रहण किया तो उसी जनपक्षधर विश्वदृष्टि का चुनाव नागार्जुन, धूमिल और रमाशंकर यादवविद्रोहीबतौर रचनाकार करते हैं। यह ठीक है कि ये तीनों कवि अलग-अलग कालखंड के रचनाकार माने जाते हैं यद्यपि तीनों ही जनपक्षीय चेतना से जुड़े हैं जिसे चौथीराम यादव अपनी आलोचना में रेखांकित करते हैं। इन कवियों की रचनात्मकता को समझने के लिए जिस आलोचनादृष्टि की आवश्यकता पड़ती है वह केवल सौंदर्यशास्त्रीय नहीं बल्कि, आलोचना के लोकधर्मी, प्रगतिशील एवं जनवादी प्रतिमानों की मांग करती है। आलोचक चौथीराम यादव का आलोचनाकर्म इसी आवश्यकता की उपज है। वे साहित्य को जनपक्षधरता और सामाजिकसांस्कृतिक हस्तक्षेप की उद्दात मानवीय कसौटी पर कसते हैं।

बीज शब्द : जनपक्षधर, कविता, नागार्जुन, धूमिल, ‘विद्रोही’, प्रतिरोध, आलोचनादृष्टि, जनता, श्रम, इतिहास।

मूल आलेख : हिन्दी साहित्य की गद्य विधाओं में एक महत्वपूर्ण विधा आलोचना है। आलोचना साहित्य को विभिन्न कसौटियों पर रखकर परखने का कार्य करती है। आलोचना की शुरुआत मुख्यतया द्विवेदी युग से मानी जाती है। चौथीराम यादव मानते हैं कि सम्पूर्ण हिन्दी साहित्य एक प्रगतिशील साहित्य है। उनकी आलोचना दृष्टि उन मानकों को तोड़ते हुए आगे बढ़ती है जिसके केंद्र में सिर्फ ब्राह्मणवादी और सामंतवादी मानसिकता रही है। अपनी आलोचना के माध्यम से वे एक सशक्त रास्ता बनाते हैं। चौथीराम यादव हमारे समय के एक समर्थ प्रगतिशील आलोचक हैं। उन्होंने अपने आलोचकीय में आर्थिक विषमता के साथ-साथ सामाजिक भेद-भाव को भी शामिल किया है। वे उस व्यापक संस्कृति की बात करते हैं जिसे सारे संसार के मनुष्यों की एक सामान्य मानव संस्कृति कह सकते हैं। 

आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्यकिताब की भूमिका में आलोचक चौथीराम यादव लिखते हैं- “हिंदी का रचना-संसार जितना ही लोकतांत्रिक है, आलोचना उतनी ही अलोकतांत्रिक। क्या यह महज आकस्मिक संयोग है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल-निर्मित कविता के जनपद से कबीर बाहर पड़ जाते हैं तो आलोचना पर लंबी बहस चलाने वाले अशोक बाजपेयी के कविता-जनपद से नागार्जुन बेदखल हो जाते हैं।1

चौथीराम यादव की आलोचना का मूल आधार अम्बेडकरवादी एवं मार्क्सवादीजनवादी दृष्टिकोण है और केंद्र मेंलोकहै। उनके अनुसार कविता का मूल्यांकन उसके लोकपक्ष, प्रतिरोध और सामाजिक हस्तक्षेप से होना चाहिए। वे साहित्य को अभिजात्य विमर्श से निकालकर लोक की संघर्षशील चेतना से जोड़ते हैं।आधुनिकता का लोकपक्षऔरलोकधर्मी साहित्य की दूसरी धाराजैसी पुस्तकों के माध्यम से चौथीराम पारंपरिक मानकों की बजाय साहित्य को इन्हीं लोक की संघर्षशील चेतना से जोड़ने की बात करते हैं। चौथीराम यादव की आलोचना दृष्टि के बारे में नंद किशोर नंदन लिखते हैं- “हिंदी साहित्य जितना लोकतांत्रिक है, आलोचना उतना ही अलोकतांत्रिक। कहने वाले आलोचक एवं विचारक चौथीराम यादव की आलोचना-दृष्टि उनकी व्यापक लोक-चेतना और लोक चिंता की अभिव्यक्ति है। उन्होंने भारतीय समाज के शोषण-उत्पीड़न, संघर्ष, उत्थान-पतन, आशा-आकांक्षा एवं चतुर्दिक व्याप्त निराशा को देखने-परखने के लिए मार्क्सवाद से दृष्टि ही नहीं, ऊर्जा भी प्राप्त की है लेकिन साहित्य को मानवीय घरातल पर विवेचित-विश्लेषित करने के लिए जीवन को देखने वाली उस लोकधर्मी दृष्टि को स्वीकार किया है, जिसकी पहली और आखिरी शर्त मनुष्यता है।2 संपादक धर्मवीर यादव गगन और आशीष कुमार दीपांकरबात कहूं मैं खड़ी खड़ीकिताब की भूमिका में लिखते हैं- “आलोचना जब सर्जनात्मक आनंद देने लगती है तब वह रचना हो जाती है। जब वह साहित्य में लोकधर्मी बुद्धि का निर्वहन करने लगती है और उसी बुद्धि से कृति की व्याख्या करने लगती है तब वह लोकधर्मी आलोचना हो जाती है। चौथीराम यादव ऐसी ही आलोचन बुद्धि और प्रतिभा के प्रखर आलोचक हैं, जिसमें उनकी सामाजिक न्याय की विश्व दृष्टि स्वाभाविक रूप से सन्निहित है। इस कारण उन्हें हिंदी साहित्य आलोचना कालोकधर्मी आलोचककहा जाता है।3

हिंदी कविता में जनपक्षधरता की परंपरा कबीर से लेकर आधुनिक कविता तक निरंतर विकसित होती रही है। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में यह परंपरा नागार्जुन, धूमिल और विद्रोही जैसे कवियों में प्रमुखता और स्पष्ट रूप में सामने आती है। इन कवियों की रचनात्मकता को समझने में आलोचक चौथीराम यादव की दृष्टि इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि वे साहित्य को वर्ग-संघर्ष, सत्ता-संरचना और हाशिए के समाज के संदर्भ में पढ़ते हैं। चौथीराम यादव हिन्दी साहित्य के मूल स्वर के बारे में कहते हैं- “हिंदी साहित्य मूलतः लोकधर्मी साहित्य है और उसका मूल स्वर प्रतिरोध का स्वर है।4  

        चौथिराम यादव भारतीय चिंतन धारा के बारे में लिखते हैं- “भारतीय चिंता-धारा में लोकधर्मी चिंतन की प्रतिरोधी परंपरा उतनी ही पुरानी है जितनी वर्णाश्रम केंद्रित वर्चस्ववादी विचार-परंपरा। प्रतिरोध का स्वर मूलतः लोकवादी, भौतिकवादी, मानवतावादी एवं जनपक्षधर स्वर है जो तमाम वर्जनाओं से घिरी हुई वर्णवादी ज्ञान-सत्ता और दमनकारी राजसत्ता को समय-समय पर चुनौती देता आया है-चाहे मध्यकाल में सामंतों और पुरोहितों की संयुक्त सत्ता हो या औपनिवेशिक दासता के काल में ब्रिटिश सत्ता में, आजाद भारत में सामंतों-पूंजीपतियों के गठबंधन वाली लोकतांत्रिक सत्ता हो या फिर उत्तरशती में बाजारवाद द्वारा नियंत्रित एवं भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण से संचालित पूंजीवादी सत्ता। प्रतिरोधी चिंतन का मौलिक स्रोत चार्वाकों, लोकायतों, आजीवकों और बौद्ध दार्शनिकों का भौतिकवादी चिंतन है जो वर्चस्ववादी वैदिक-पौराणिक परंपरा के भाववादी चिंतन के विरुद्ध तनकर खड़ा है। चिंतन की तार्किक प्रणाली और भौतिकवादी दृष्टि के चलते यह अपने समय-समाज में व्याप्त ठहराव से बराबर हस्तक्षेप करती आई है।5  

चौथीराम यादव की दृष्टि में नागार्जुन की कविता

हिन्दी की आलोचना परंपरा ने लोक के आवाज और प्रतिरोध को किस तरह से साजिश करके बेदखल कर दिया है चौथीराम यादव उसके बारे में कहते हैं- “प्रतिरोध हिंदी का मूल चरित्र है। व्यंग्य-गर्भित आक्रोश-भरा प्रतिरोध का स्वर और खतरे से खेलने का अदम्य साहस या तो कबीर में दिखाई देता है या नागार्जुन में। हिंदी का रचना-संसार जितना ही लोकतांत्रिक है, आलोचना उतनी ही अलोकतांत्रिक। क्या यह महज संयोग है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल-निर्मित कविता के जनपद से कबीर बाहर पड़ जाते हैं तो आलोचना के लोकतंत्र पर बहस चलाने वाले अशोक वाजपेयी के कविता जनपद से नागार्जुन बेदख़ल हो जाते हैं।6  

चौथीराम यादव नागार्जुन को कबीर की परंपरा का आधुनिक विस्तार मानते हैं जिनमें व्यवस्था को ललकारने का अदम्य साहस है। नागार्जुन किसानों, मजदूरों, स्त्रियों एवं दलितों के जीवन-संघर्ष के कवि हैं। वे सत्ता के हर रूप राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक आदि पर प्रहार करते हैं। चौथीराम यादव कहते हैं- “नागार्जुन की कविता का जनतंत्र लचीला और व्यापक है। इसमें सभी समानधर्मी एवं जनपक्षधर विचारधाराओं के लिए स्पेस है। यह जनतंत्र आजाद भारत के संसदीय लोकतंत्र का विकल्प प्रस्तुत करता है। अमीर भारत के समानांतर यह दूसरा ग़रीब भारत है जहां गरीबी है, अकाल है, सूखा है, बाढ़ है, भूख और पीड़ा है, सामंतों का शोषण है, पुलिस का उत्पीड़न है, अपहरण, बलात्कार और हत्या है।7

भारतीय दलितों के संदर्भ मे चौथीराम यादव मानते है कि इनको गरीबी से पहले सामाजिक मुक्ति की जरूरत है। इसके पीछे की वजह बताते हैं-“गरीबी दलित समुदाय की उतनी मारक समस्या नहीं है जितनी घृणा की सीमा तक फैली अस्पृश्यता की सामाजिक समस्या। इसलिए आर्थिक मुक्ति से पहले सामाजिक मुक्ति, दलित आंदोलन की प्राथमिकता है। उनके अनुसार वर्ग-संघर्ष से पहले वर्ण-संघर्ष जरूरी है क्योंकि वर्ग भी अंतर्विरोधों से मुक्त नहीं है।8

नागार्जुन की यह रामराज्य कविता आज के दौर में बेहद ही प्रासंगिक हो गई है क्योंकि आज राम के नाम पर देश में रावण जैसा व्यवहार किया जा रहा है। लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार किया जा रहा है इसी सच्चाई की पोल खोलते हुए नागार्जुन ने 1949 में ही लिखा था जो आज भी प्रासंगिक है। नागार्जुन लिखते हैं-

लाज-शरम रह गई बाकी गांधी जी के चेलों में

फूल नहीं लाठियां बरसतीं रामराज की जेलों में

रामराज में अबकी रावण नंगा होकर नाचा है

सूरत-शक्ल वही है भैया बदला केवल ढांचा है9

 

चौथीराम यादव की दृष्टि में धूमिल की कविता

धूमिल को चौथीराम यादव आधुनिक शहरी यथार्थ का सबसे सशक्त औरसंसद बनाम सड़कके संघर्ष का कवि मानते हैं। धूमिल की कविता में लोकतंत्र की विडंबनाएँ, सत्ता का छल और भाषा की हिंसा उजागर होती है। आज़ादी के बाद की भारतीय राजनीति और संसद की विफलता को अपनी कवितापटकथा’, ‘मोचीरामआदि  में धूमिल ने प्रमुखता से उकेरा है। चौथीराम यादव भूमिका में धूमिल के बारे में लिखते हैं- “धूमिल संसद से सड़क तक, में असली अपराधी उस तीसरे आदमी का पीछा करते हैं जिसे बहुत पहले कबीर ने अपनी कविताओं में चिह्नित कर लिया था जो आदमी को आदमी से बांटने का षड्यंत्र करता है।10 उनकी कविता में आक्रोश है पर वह राजनीतिक चेतना से लैस आक्रोश है। धूमिल की भाषा खुरदरी, असुविधाजनक और प्रतिरोधी है जो सत्ता को चुनौती देती है। चौथीराम यादव के अनुसार, धूमिल की कविता संसद से सड़क तक फैले झूठ का पर्दाफाश करती है और पाठक को निष्क्रिय नहीं रहने देती। धूमिल की आलोचना करते हुए चौथीराम यादव उनके राजनीतिक तेवर को रेखांकित करते हैं।

आजादी और लोकतंत्र से धूमिल का मोहभंग हो चुका है। धूमिल समाज और देश में फैली अव्यवस्था एवं समस्या को देख और महसूस कर रहे हैं कैसे आजादी के दशकों बाद भी गरीब, गरीब ही बना हुआ है, वह रोटी के लिए तरस रहा है, उसे खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं नसीब हो रहा है लेकिन नेता-राजनेता अपना चुनावी भाषण बढ़िया से बढ़िया दे रहे हैं। देश और समाज में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं दिख रहा है। अपनी कविता में इस समस्या को रेखांकित करते हुए धूमिल लिखते हैं-

उस मुहावरे को समझ गया हूं

जो आजादी और गांधी के नाम पर चल रहा है

जिससे भूख मिट रही है

मौसम बदल रहा है।11  

जब भारत देश अंग्रेजों से आजाद हुआ तो जनता उम्मीद लगाए हुए बैठी थी कि आज़ाद हिंदुस्तान में उसका जीवन सुखमय होगा, आने वाले दिनों में सभी को भरपेट भोजन मिलेगा। एक सम्मानजनक जीवन मिलेगा मगर देश की आजादी के कई वर्षों के बाद भी यह सपना, सपना बनकर ही रह गया। यह जनतंत्र मदारी की भाषा बनकर रह गया जिसे राजनेताओं ने अपनी स्वार्थ पूर्ति हेतु जैसे चाहा वैसे नचाया और जनता को ठगने का काम किया। धूमिल को इस समस्या की पहचान है। वे लिखते हैं-

ऐसा जनतंत्र है जिसमें जिंदा रहने के लिए

घोड़े और घास को एक जैसी छूट है

कैसी विडंबना है/कैसा झूठ है

दरअसल अपने यहां जनतंत्र

एक ऐसा तमाशा है/जिसकी जान/मदारी की भाषा है।12

धूमिल की कविता उस दौर की उपज है जब लोकतंत्र खोखला हो रहा था, संसद जनता से दूर हो चुकी थी और भाषा सत्ता का हथियार बन चुकी थी। धूमिल का आक्रोश व्यक्तिगत नहीं, भावुक नहीं बल्कि वैचारिक है इसलिए धूमिल को राजनीतिक चेतना का कवि मानते हैं कि केवल क्रोध का। चौथीराम यादव लिखते हैंइस संसदीय लोकतंत्र में कहीं कोई सुरक्षित नहीं है। चारों ओर असुरक्षा का भय पसरा हुआ है-अकारण पुलिस-उत्पीड़न का भय, सांप्रदायिक दंगों का भय, आतंकवाद का भय, आकस्मिक अपहरण का भय, गरज कि देश की जनता भय और आतंक के माहौल में जी रही है। बलात्कार और हत्या की घटनाएं तो रोजमर्रा की खबर बन गई हैं, इसलिए अब चौंकाती नहीं। धूमिल ने पूंजीवादी संसदीय लोकतंत्र की पोल खोलते हुए अपनी लंबी कवितापटकथामें उसके सामाजिक-आर्थिक अंतर्विरोधों को उद्घाटित किया है जिसमें राजसत्ता और जनता के बीच की दूरी को भी रेखांकित किया है।13  

चौथीराम यादव की दृष्टि में रमाशंकर यादवविद्रोहीकी कविता

चौथीराम यादव के अनुसार विद्रोही केवल कवि नहीं बल्कि, वे चलता-फिरता प्रतिरोध हैं। विद्रोही की कविता में जाति-विरोध, वर्ग-संघर्ष, ऐतिहासिक अन्याय एवं क्रांतिकारी प्रेम आदि सब कुछ एक साथ मौजूद है। चौथीराम कबीर और विद्रोही को एक साथ रखते है और कहते हैं- “इसमें कोई दो राय नहीं कि कबीर और विद्रोही दोनों जितने बड़े जनपक्षधर कवि थे, उतने ही बड़े मनुष्य भी थे।14  विद्रोही की कविता में हाशिए का दर्द, ऐतिहासिक स्मृति और क्रांतिकारी चेतना एक साथ मिलती है। वे प्रेम को भी राजनीतिक कर्म के रूप में देखते हैं-जहाँ प्रेम अन्याय के विरुद्ध खड़ा होता है। विद्रोही की भाषा तो शुद्धतावादी है और ही सजावटी है बल्कि, वह संघर्षशील जीवन की भाषा है। चौथीराम यादव के अनुसार, विद्रोही की कविता सत्ता से संवाद नहीं, टकराव की कविता है जो व्यवस्था की जड़ों पर प्रहार करती है औरइतिहास के दबे हुए स्वरोंकी आवाज़ है। यादव विद्रोही को शास्त्रीयता के खिलाफ 'लोक की बगावत' के प्रतीक के रूप में देखते हैं।

विद्रोही की कविताएं केवल वर्तमान की नहीं बल्कि, हज़ारों वर्षों की सभ्यतागत हिंसा की समीक्षा करती हैं। विद्रोही की कविता जन-संस्कृति की वह धारा है जो किताबी पांडित्य के बजाय मौखिक परंपरा और संघर्ष से शक्ति पाती है। चौथीराम विद्रोही कोअसली लोकधर्मी कविमानते हैं, जिनकी कविताएं पोथियों से नहीं, बल्कि जेएनयू के ढाबों और सड़कों के संघर्ष से निकली हैं। इसलिए प्रणय कृष्ण ने भूमिका में लिखा है- “विद्रोही की कविता में उनके व्यक्तिगत दुख कहीं नहीं हैं, हर कहीं समूह के ही दुख, तकलीफ, आस्था और मुक्ति के नग्मे हैं। विद्रोही खुद को लोगों में घुलाकर ही कवि बने हैं। विद्रोही की कविता बोलचाल से निकली गंभीर अर्थों , मुक्ति के भव्य आशयों, महान सपनों वाली कविता है, उसे अनपढ़ भी समझ सकता है।15  

भारतीय समाज के संदर्भ में स्त्रियों के साथ अन्याय, अत्याचार और दमन का बहुत पुराना सिलसिला रहा है इसका गवाह अतीत के धर्म ग्रंथ से लेकर वर्तमान के पुलिस रिकॉर्ड हैं। इस पीड़ा और अन्याय को विद्रोही अपनी कविता में दर्ज करते हैं-

इतिहास में वह पहली औरत कौन थी

जिसे सबसे पहले जलाया गया मैं नहीं जानता

लेकिन जो भी रही होगी मेरी मां रही होगी

लेकिन मेरी चिंता यह है कि भविष्य में

वह आखिरी औरत कौन होगी

जिसे सबसे अंत में जलाया जाएगा

मैं नहीं जानता लेकिन जो भी होगी

मेरी बेटी होगी-मैं यह नहीं होने दूंगा।16

ब्राह्मणवादी और पितृसत्तात्मक व्यवस्था में पुरुषों ने अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए एवं अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए स्त्रियों को हमेशा के लिए गुलाम बनाए रखना चाहा तथा इसके लिए उन्होंने समय-समय पर साज़िश के तहत बेड़ियों और परंपराओं का निर्माण।

औरत की लाश के पीछे के असली कारणों की पहचान कर लेने के बाद जब विद्रोही उसे अपनी कविता में दर्ज करते हैं और उसके लिए ज़िम्मेदार लोगों का ख़ुलासा करते हैं तो आग भड़कने लगती है। पुरुषों को अपनी सत्ता और व्यवस्था के ध्वस्त होने का डर सताने लगता है। विद्रोही लिखते हैं-

यह लाश जली नहीं है, जलाई गई है

ये हड्डियां बिखरी नहीं हैं; बिखेरी गई हैं

ये आग लगी नहीं, लगाई गई है

ये लड़ाई छिड़ी नहीं है, छेड़ी गई है

लेकिन कविता भी लिखी नहीं है, लिखी गई है

और जब कविता लिखी जाती है तो आग भड़क जाती है।17  

चौथीराम यादव विद्रोही प्रेम को विशेष रूप से रेखांकित करते हैं। विद्रोही का प्रेम निजी नहीं, वह प्रेम संघर्षशील है। वह प्रेम अन्याय के खिलाफ खड़ा है। इस अर्थ में विद्रोही की कविता प्रेम और क्रांति का अद्भुत संयोग है। चौथिराम यादव लिखते हैंऐसा नहीं कि विद्रोही प्यार करना जानते ही नहीं थे। आखिर वह तीन-तीन बहनों के भाई थे, बहनों ने हल्दी, दूब और गले की हंसुली से चूम-चूमकर प्यार करना सिखाया था। हां, प्यार करने की प्रक्रिया, उसका आधार और आशय, उन लोगों से भिन्न अवश्य थे जो दिन-रात प्रेम में डूबे रहते हैं। प्यार और सौंदर्य विद्रोही को कर्म-क्षेत्र में प्रवृत्त होने की प्रेरणा देते हैं।18

विद्रोही ने प्रेम को ताकत और प्रेरणा के रूप मे महसूस किया है और उसे जिया भी है। इसीलिए तो वे आजीवन आन्दोलनरत और संघर्षरत रहे। विद्रोही प्रेम के बारे में लिखते हैं-

"जब मैं तुम्हें देखता हूं/मुझे लगता है

क्रांति होगी तुम्हारा सौंदर्य मुझे

विस्तर से समर की ओर ढकेलता है

और मेरे संघर्ष की भावना

सैकड़ों तो क्या सहस्त्रों/गुना बढ़ जाती है।19  

निष्कर्ष : चौथीराम यादव की आलोचनादृष्टि नागार्जुन, धूमिल और विद्रोही की कविता को केवल साहित्यिक कृति नहीं बल्कि, सामाजिक दस्तावेज और प्रतिरोध की सांस्कृतिक राजनीति के रूप में देखती है जो जनता की संघर्षशील चेतना की अभिव्यक्ति है। आलोचक रूप में चौथीराम इन तीनों कवियों कोलोकधर्मके एक ही धरातल पर देखते हैं और वह है- सत्ता और व्यवस्था के विरुद्ध लोक की पक्षधरता। इनकी आलोचना हिंदी साहित्य को अभिजन केंद्र से निकालकर जनता के संघर्षों से जोड़ती है जहाँ नागार्जुन काजनवाद, धूमिल कामोहभंगऔर विद्रोही कीऐतिहासिक चेतनावास्तव में भारतीय लोक-जीवन के संघर्ष के तीन अलग-अलग पड़ाव हैं। उनके लिए ये तीनों कवि हिंदी कविता की उसविद्रोही चेतनाके संवाहक हैं जो किताबी होकर सीधे जीवन के संघर्षों से जुड़ी है। इस संदर्भ में उनकी आलोचना नागार्जुन, धूमिल और विद्रोही को एक जनवादी काव्य-परंपरा में स्थापित करती है। इस दृष्टि से चौथीराम यादव की आलोचना हिंदी साहित्य में एक जनपक्षधर वैचारिक हस्तक्षेप है जो कविता को फिर से समाज के बीच खड़ा करती है।

 

संदर्भ :

  1. चौथीराम यादव, आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 10, भूमिका से
  2. संपादक- सूरज बहादुर थापा, जब-जब देखा लोहा देखा, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 2016, पृष्ठ 90
  3. संपादक- धर्मवीर यादव गगन और आशीष कुमार दीपांकर, बात कहूँ मैं खरी खरी, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, 2022, पृष्ठ 13
  4. चौथीराम यादव, आधुनिकता का लोक पक्ष और साहित्य, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 9, भूमिका से
  5. वही, पृष्ठ 9 भूमिका
  6. वही, पृष्ठ 76
  7. वही, पृष्ठ 86
  8. वही, पृष्ठ 89
  9. वही पृष्ठ 85 से उद्धृत
  10. वही, पृष्ठ 11 भूमिका
  11. धूमिल, संसद से सड़क तक, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृष्ठ 19
  12. वही, पृष्ठ 105-06
  13. वही पृष्ठ 12 भूमिका
  14. चौथीराम यादव, आधुनिकता का लोक पक्ष और साहित्य, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 173
  15. वही पृष्ठ 28 भूमिका
  16. नई खेती, रमाशंकर यादव विद्रोही नवारुण, गाजियाबाद, 2018, पृष्ठ 41
  17. वही, पृष्ठ 53
  18. चौथीराम यादव, आधुनिकता का लोक पक्ष और साहित्य, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर, नई दिल्ली, 2019, पृष्ठ 187
  19. नई खेती, रमाशंकर यादव विद्रोही नवारुण, गाजियाबाद, 2018, पृष्ठ 130

 

वेदप्रकाश भारती
शोधार्थी- हिन्दी विभाग, . ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
kumarrupak993@gmail.com, 9709771436

सुरेन्द्र प्रसाद सुमन
शोध निर्देशक, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, . ना. मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा
spsuman.chunauti@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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