शोध आलेख : शैलेश मटियानी की कहानियों में अभिव्यक्त सामाजिक विसंगतियाँ / नन्दू सोनी एवं अमित कुमार

शैलेश मटियानी की कहानियों में अभिव्यक्त सामाजिक विसंगतियाँ
- नन्दू सोनी एवं अमित कुमार


शोध सार : आम जनमानस से जुड़े कथाकार शैलेश मटियानी नई कहानी आन्दोलन के दौर के प्रतिष्ठित रचनाकार हैं। ये हिंदी के उन विरले कथाकारों में से एक हैं जिन्होंने प्रेमचंद की कथा परम्परा को सार्थक ढंग से आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। समाज के गरीब, बेसहारा, अपाहिज, कोढ़ी, भिखारी, जेबकतरे और अपराध की दुनिया में धकेले गये वंचित वर्ग के लोगों के जीवन को आधार बनाकर इन्होंने कारुणिक कहानियाँ लिखी हैं। इनकी कहानियों में आये पात्र अपने जीवन में अनेक सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, मानसिक, राजनीतिक प्रशासनिक परिस्थितियों से संघर्ष करते हुए भी अपनी जिजीविषा बनाये रखते हैं और समाज में फैली अनेक विसंगतियों की ओर सबका ध्यान आकृष्ट करते हैं। इनकी कहानियों में समाज में कराहती मानवता और मनुष्य की संवेदनाओं को झकझोरने वाले अनेक दृश्य विद्यमान है। शोषित दलित समाज के लोगों की व्यथा इनकी कहानियों में यथार्थ रूप में दिखाई देती है। समाज में फैली विसंगताओं और विडम्बनाओं को गहरे से उजागर करती शैलेश मटियानी की कहानियाँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

बीज शब्द : समाज, मनुष्य, बेसहारा, भ्रष्टाचार, अंधविश्वास, जिजीविषा आदि।

मूल आलेख : लेखक शैलेश मटियानी का साहित्य के क्षेत्र में एक कथाकार और गद्यकार के रूप में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। इनकी कहानियों में मानव जीवन के विभिन्न पहलुवों और परिस्थितियों को उनके वास्तविक रूप में दर्शाया गया है। इनकी कहानियों में समाज में फैले भ्रष्टाचार, शोषण और अंधविश्वास के विविध रूप देखने को मिलते हैं। सामाजिक, राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं में फैली अनेक ऐसी विसंगतियों को शैलेश मटियानी ने अपनी रचनाओं में उजागर किया है, जो हमारे समाज को गहरे से प्रभावित करती हैं। मटियानी एक यथार्थवादी रचनाकार हैं। इनका साहित्य स्वानुभूति पर आधारित है। इनकी रचनाओं में चित्रित पात्र अभावग्रस्त जीवन जीते हैं और आर्थिक विषमताओं से जुझते हुए अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संघर्षरत रहते हैं। इनकी कहानियाँ ऐसी है, जिसे पढ़कर हम हाशिये व उपेक्षित जीवन जीने वाले लोगों से रूबरू होते हैं। इस सन्दर्भ में आलोचक हृदयेश की टिप्पणी बहुत सार्थक मालूम होती है- “यों उनके कथा संसार में...तुच्छ पेशों को चिपटाए गरीब एवं लाचार पात्र हैं, किन्तु वे मानवीय गुणों के मामले में गरीब और तुच्छ नहीं है।”1 एक अच्छी सामाजिक प्रतिष्ठा हर मनुष्य की चाह होती है जिसे पूरा करने के लिए वह हरसंभव कोशिश करता है, किन्तु बढ़ती बेरोजगारी के कारण अपने सपने को पूरा कर पाने में खुद को असमर्थ पाकर वह विभिन्न कुसंगतियों का शिकार हो जाता है। इनकी ‘महाभोज’ कहानी में बेरोजगार ‘चैतीराम’ शराब पीता है, उसकी पत्नी शिवरती घर संभालती है। वह अपने ससुर के मरने पर अपनी पचास तोले की करधनी बेचकर उसके अन्तिम संस्कार के सभी कार्य करती है। वह समाज में अपनी व अपने पति की प्रतिष्ठा बनाये रखना चाहती है। वह कहती है- “मोती के बाबू, अपने पेट का रोना तो जिंदगी भर का लगा हैगा, मगर बाप तो रोज नाही मरेगा ना, जिस औरत के जीते-जी उसके मरद की नाक जाती रहे, उसका तो बावड़ी में डूब मरना भला।”2 किंतु  जब शिवरती अपने परिवार की जिम्मेदारियों और उनके भविष्य के बारे में विचार करती है तो ससुर की मृत्यु पर किये गये महाभोज की पत्तलों को देखकर सोचती है- “इत्ता आटा-साग और तेल-मसाला तो कुनबे को तीन-चार महिने तक खींच ले जाता।”3 आर्थिक कठिनाई और उसके संघर्ष को व्यक्त करती यह कहानी समाज में प्रतिष्ठा को बचाए रखने के लिए दिखावे के जीवन को दर्शाती है।

मटियानी की कहानियों की एक धारा राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ी हुई है, जिसके माध्यम से ये समाज में फैले भ्रष्टाचार, राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं का यथार्थ चित्रण करते हैं। ‘अहिंसा’ कहानी का पात्र जगेसर गाँव से शहर अपनी पत्नी बिंदा का इलाज करवाने आता है। सही इलाज करवाने हेतु वह सरकारी अस्पताल, प्राइवेट नर्सिंग होम के चक्कर लगाता है। इस संबंध में अस्पताल के वार्ड के झाडूवाले व चपरासी का ये कहना- “भझ्या, या तो पैसे देख ले आदमी या मरीज की जान। अब हाल तो जो है, सो है। गवरमिण्ट क्या नहीं जानती, जिसके कि हजार आँख-कान, जो हम-तुम जानेंगे? मगर हकीकत है यही कि यहाँ तो इलाज करवाए वो, जिसकी पोलिटिकल पहुँच हो या और कोई नजदीकी जान-पहचान या पहले डॉक्टरों के घर पर दक्षिणा दे आए मरीज को दिखाकर, तब अस्पताल में भर्ती कराए.. जिस इत्मीनान और एहतियात से ये अपनी कोठी पर देख लेंगे मरीज को, अस्पताल में तो हर्गिज न देखेंगे।”4 डॉक्टरी पेशे से जुड़े लोगों के स्वार्थी तथा चापलूसी भरे रवैये को प्रस्तुत करता है। वहीं अध्यापक के कथन- “जब मेडिकल कॉलेजों की भर्ती में लाख-पचास की घूस चलती है और मेडिकल-परीक्षाओं का एक-एक पर्चा तीस-चालीस हजार में बिकता है, तब यहाँ गरीब मरीजों का इलाज जी लगाकर कौन उल्लू का पट्ठा डॉक्टर करेगा? ये अस्पताल तो इन डॉक्टरों के लिए अपने-अपने ग्राहक खोजने के सेंटर हो गये हैं।...सरकार तो इनसे खुद कहती है कि हमारी दुकान भी चलती रहे, अपनी भी चलाते रहो। साले सौ में अस्सी डॉक्टर या घूसखोरों, हराम की कमाई वालों के घरों से आ रहे है और या नेताओं-मिनिस्टरों के- इनको गरीबों का दर्द व्यापेगा ?”5 इस तरह यह कहानी देश के सरकारी अस्पतालों की विसंगतियों, विकृतियों और भ्रष्ट तंत्र को उजागर करती है। जहाँ ये कहानी सरकारी अस्पताल की सुविधाओं में दलालों के भ्रष्टाचार को दर्शाती है, वहीं वह चिकित्सकों की अमानवीय संवेदनाओं का खुलासा भी करती है। वहीं ‘जुलूस’ कहानी पुलिस तंत्र की भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था, सरकारी तंत्र और मीडिया की निरंकुशता को बेबाकी से उजागर करती है। साथ ही, पुलिस के धनवान लोगों और आम नागरिकों के साथ व्यवहार में भेदभाव को भी दर्शाती है। यह कहानी बुधराम के घर दीवाली की रात पुलिस की रेड से शुरू होती है, जब वह अपने घर दोस्तों के साथ जुआ खेल रहा होता है। वह अपनी मां को बताता है कि- “दीवाली के चाय-पानी के नाम पर ‘दक्षिणा’ तो जरूर दे आए हैं, मगर ठिकाना नहीं बताया है कि खास किसके यहाँ खेल होगा। इतनी होशियारी रखना जरूरी भी था, क्योंकि खाकी वरदीवालों का कौन ठिकाना कि हिस्सा पा कर भी जाने किस बहाने आ धमकें।”6  पुलिस फिर भी उनके घर रेड डालती है और उनसे मारपीट करती है। अगले दिन मीडिया से ख़बर आती है ‘शहर के जाने-माने रईस जर्नलगंज थाने की हिरासत में’। ये ख़बर उस समय सुर्खियों में होती है और बुधराम जैसे लोगों के पकड़े जाने की ख़बर एक स्थानीय अख़बार के अलावा किसी अन्य में नही होती। बुधराम की माँ दरशो जब अपने बेटे को छुड़वाने जाती है, तो उसे वहाँ से गालियां देकर भगा दिया जाता है। वहां एकत्र लोग तरह-तरह की बातें करते हैं- “जब अख़बार तक में ख़बर छपी है, तो लोग लाए जरूर गए होंगे, लेकिन बड़े लोगों का मामला रफा-दफा होते वक्त ही कितना लगता है।....जहाँ बोरों में भरे बँटे हैं, वहाँ उंगलियों की गिनती में की रकम को कौन पूछेगा आज ?”7  पुलिस सभी धनवान लोगों को छोड़ देती है और बाकी पकड़े गए लोगों के आधे सिर व मूंछ मुंडवाकर उनका जुलूस निकालती है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 180 देशों व्याप्त भ्रष्टाचार पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार- “भारत की रैंकिंग में गिरावट आई है। वह 2024 की लिस्ट में 3 पायदान गिरकर 96 वें (38 स्कोर) नंबर पर आ गया है। 2023 में भारत 93वें (39 स्कोर) नंबर पर था।”8

शैलेश मटियानी ने अपने जीवन में घोर गरीबी व भुखमरी देखी थी, अतः इन्होंने अपनी कहानियों में अपने भोगे हुए अनुभव को जीवंत कर दिया। इनके कथन, संजीव कुमार के लेख में कुछ इस तरह प्राप्त होते हैं- “बंबई के फुटपाथों का मैं आजीवन ऋणी रहूँगा कि उनमें फिर-फिरकर मैंने बिखरे चने और रोटियों के बासी टुकड़े पाए हैं, जिनने मेरे भूखे पेट को राहत दी। इन्हीं फुटपाथों पर सोने के अपराध में ‘चैपन’ के अंतर्गत पुलिस चौकियों पर पहुँचा तो वहाँ मुझे हिंदुस्तान के उन बेटों का साहचर्य मिला, जो पूँजीपति और सरकारी मकड़जाल में फँसे हुए गुनहगार बनने को मजबूर होते हैं और जिनके चेहरे पर गुंडागर्दी की मुहर होती है, मगर हदय में प्यार की कोमलतम-कविता के पवित्र-छंद रहते हैं।”9 भुखमरी व लावारिस जिंदगी पर शैलेश मटियानी ने अनेक कहानियों की रचना की  है। ‘चील’ कहानी भयंकर गरीबी, भुखमरी व बेबसी को दर्शाती और समाज की वास्तविकता से परिचित कराती एक भावपूर्ण कहानी है। कहानी में रामखिलावन नामक बालक अपने पिता की मृत्यु और माँ के बीमार होने पर भूख से व्याकुल हो दो चम्मचें चुराता पकड़ा जाता है। उस घर की मालकिन शुक्लाइन आकर रामखिलावन की माँ को बहुत भला-बुरा कहती है। रामखिलावन की माँ रामखिलावन पर गुस्सा करती है तो रामखिलावन का यह कहना “तो हम का करी! भूक्खे मर जाई?”10 उसकी स्थिति और लाचारी दोनों को व्यक्त करता है। रामखिलावन अपनी भूख के चलते एक आश्रम की ओर जाता है, जिसके विषय में उसने सुना होता है कि बाबा लड़कों को आश्रम में बुलाकर उन्हें मिठाई देते हैं, लेकिन उसकी दरिद्र स्थिति देखकर उसे वहाँ से भगा दिया जाता है। वह काम के बदले खाना लेना चाहता है, मगर उसे कोई काम नहीं देता। अंत में वह एक लाश को ले जाते देखकर सोचता है- “हे भगवान! कोई बड़ा मुर्दा आया हो।”11 जहाँ उसकी दयनीय परिस्थिति को दर्शाता है, वहीं हमें सोचने को मजबूर भी करता है। वर्तमान संदर्भ में भी इनकी कहानियों में चित्रित समस्याएं प्रासंगिक है। ‘कंसर्न वर्ल्डवाइड’ और ‘वेल्टहंगरहिल्फ’ की ओर से संयुक्त रूप से प्रकाशित 19 वीं ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट जो दुनिया भर में भुखमरी पर नज़र रखती है, के अनुसार- ‘भारत 2024 वैश्विक भूख सूचकांक में 127 में से 105 वें स्थान पर है, जिसमें ‘गंभीर’ भूख की समस्याएं शामिल हैं। रिपोर्ट में भारत का स्कोर 27.3 है।’12

मटियानी की रचनाओं के संदर्भ में मनोहर श्याम जोशी ने कहा है- “'हिंदी में भोगे हुए यथार्थ की दुहाई अक्सर दी जाती है, लेकिन हिंदी साहित्य में शैलेश मटियानी जैसे लेखक विरले से हैं, जिन्होंने अपने समाज के यथार्थ को गहनता से जाना और जिया हो और जिनका अनुभव क्षेत्र विस्तृत रहा हो। शैलेश ने अपनी रचनाओं में गाँवों और शहरों के पिछड़े और गरीब लोगों के जीवन की सशक्त झांकियाँ प्रस्तुत की हैं।”13 कहानी ‘मिट्टी’ को पढ़ते समय हमारे सामने अनेक ऐसे दृश्य जीवंत हो उठते है, जब हम अपने आस-पास के परिवेश में शारीरिक रूप से विकलांग, कोढ़ी और अंधे भिखारियों को अपने बाल-बच्चों सहित भीख मांगते देखते हैं। इस कहानी का मुख्य पात्र लालमन है, जो हाथ-पैरों से अपाहिज है। उसे दस्त लगे होते हैं। गनेशी नाम की एक परित्यक्त औरत उसके साथ सिर्फ़ इसलिए होती है कि वह लालमन के माध्यम से भीख मांगकर अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण करती रहे। वह मुफ़्त इलाज करने वाले डॉक्टर से लालमन का इलाज़ करवाना चाहती है। जब लालमन उसे अच्छे डॉक्टर को दिखाने के लिए कहता है, तो गनेशी के कथन- “ए लालमन, इंसान को लंगोट के भीतर ही रहना चाहिए। जैसी हालत में तुम हो जानवर के अस्पताल का डॉक्टर भी न देखेगा।”14 समाज में लाचार लोगों के प्रति संकुचित दृष्टिबोध को उजागर करती है, वहीं लालमन का कहना- “हम अपंग-अपाहिजों की जिन्दगी तो ढोर-जानवरों की तरह ही कटती है, मेरी भी कट गई।”15 उसकी लाचारी को दर्शाती है। इस कहानी में मटियानी ने लालमन व गनेशी के द्वारा भिखारी जीवन जीने वाले लोगों के दारुण दुःखों को बड़ी जीवंतता और सहजता से उकेरा है। आलोचक गोपाल राय का कथन इस संदर्भ में उल्लेखनीय है- “वीभत्स यथार्थ के बीच मानवीय संवेदनाओं की झलक पैदा कर देना मटियानी की विशेषता है।”16 अनाथ जीवन पर आधारित इनकी ‘बिद्दू अंकल’ कहानी समाज में पिछड़े लोगों के शोषण को व्यक्त करती है जिसमें बिद्दू उर्फ विद्यासागर नामक युवक, काम की तलाश में दिल्ली आ ता है। पँड़ाइन दीदी नाम की रिश्तेदार उसे अच्छी नौकरी दिलाने का वादा कर अपने साथ ले जाती है। वह पहले तो उसे ममेरा भाई बोलती है, फिर उसे अपने घर का सर्वेन्ट बना देती है। पँड़ाइन दीदी के पाँड़े साहब से ये कथन- “इस बिद्दुआ की नौकरी अभी कहीं किसी दफ्तर में न लगा देना। एक बार सरकारी नौकरी पाने के बाद, फिर घर का काम कौन करता है? लड़का है बड़ा मेहनती, भला और ईमानदार..।”17 यह कहानी नौकरों के प्रति मालिकों के बर्बर व्यवहार व समाज के लोगों की स्वार्थपरकता को दर्शाती है।

‘प्यास’ कहानी एक जेबकतरे के लावारिस जीवन को मार्मिक रूप से व्यक्त करती है। यह कहानी अनाथ शंकरिया की है, जिसे जन्म देते ही उसकी माँ उसे फुटपाथ पर छोड़ जाती है और उसे अनाथाश्रम वाले लोग ले जाते हैं। वहाँ से उसे पांडुरंग नाम का एक युवक 50 रुपये में खरीद लाता है और उसे पेशेवर भिखारी कृष्णाबाई को यह कहते हुए सौंप देता है- “बाई, नकद पचास की रकम और भानजे का रिश्ता लगाकर के इस छोकरे को खरीदा है। सूरत का गौरा और खूबसूरत है। भीख मांगते समय होशियारी से काम लेगी, तो चांदी पिटवा देगा छोकरा।... तो बाई, जब तक छोकरे से बिजनिस करोगी एक रुपया रोज लूँगा और अगर तुम्हारी किसी लापरवाही या बीमारी से यह मर गया तो तुम्हें पूरे पचास की रकम एकमुश्त मुझे देनी होगी।”18 कृष्णाबाई की मृत्यु होने पर पाँच बरस के शंकरिया से पांडुरंग भीख मंगवाता है, मना करने पर उसे पीटता है। शंकरिया अपनी लावारिस जिंदगी और भूख के कारण दारू व बीड़ी की सप्लाई करता है और जेबकतरा भी बन जाता है। एक दिन एक फ़ारसी औरत की चेन काटते समय वह पकड़ा जाता है तो पहले भीड़ और फिर पुलिस उसे बहुत मारती है, परन्तु शंकरिया की मजबूरी समझने वाला वहाँ कोई नहीं होता। इस कहानी के संदर्भ में प्रकाश मनु के कथन- “‘प्यास’ सच ही हिंदी की उन बड़ी यथार्थवादी कहानियों में है जिसकी टक्कर की कोई दूसरी कहानी खोजना मुश्किल है।”19

हमारे समाज में निम्न वर्गीय ही नहीं, अपितु उच्च वर्गीय लोग भी विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान, रीति-रिवाज व अंधविश्वास को मानते है। शैलेश मटियानी की कहानियों में इन सबकी छवि उभरकर आती है। पहाड़ी परिवेश पर आधारित कहानी ‘सुहागिनी’जहाँ धार्मिक अंध-विश्वास को चित्रित करती है, वहीं पहाड़ी स्त्रियों की पीड़ा भी व्यक्त करती है। इसमें पद्मावती नामक युवती पारिवारिक व सामाजिक दबाव में आकर एक तांबे के लौटे से विवाह करती है और आजीवन उसे अपना पति माने रहकर एक अंधविश्वास को दर्शाती है। वह समाज के इस तथ्य को भली-भांति जानती है -“ब्राह्मण कन्या तो पैसों वालों की भी बहुत परेशानियों के बाद ही ब्याही जाती है, वह तो एक दरिद्र परिवार की कन्या थी और कुरूपा। गोरे कपाल में तो काजल का टीका भी बहुत फबता है, लेकिन काले कपाल की रेखाएँ तो चंदन के तिलक से भी उजली नहीं हो पाती है। सोने-चांदी के आसन पर तो शालिग्राम भी पूजा जाता है, मगर दान दहेज से रीती उस सूखे काठ जैसी काया को कौन देगा अपने घर में बहू का आसन?”20 पद्मा के भाई का ये मानना कि- ‘इस अभागिन के कारण मुझे भी नरक भोगना पड़ेगा। जिस ब्राह्मण के घर में अंत तक कुंवारी बैठी बहन राख के अंदर के कोयले की तरह अपने दुखों से सुलगती रहे, उसका तारण तो चौसठ तीरथों की परिक्रमा से भी नहीं हो सकता।’21 एक अंधविश्वास को बढ़ावा देता है। समाज में परिवार का विशेष महत्त्व है, किंतु वर्तमान में समाज में पारिवारिक विघटन की स्थिति बहुतायत में देखने को मिलती है। माता-पिता अपनी संतानों को बहुत प्यार से पालते हैं, वहीं उन्हें उनकी वृद्धावस्था में अकेला छोड़ जाते है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण मटियानी की “ब्राह्मण” कहानी है, जिसमें राधे पुरोहित का भरा-पूरा परिवार होता है और अंत में एक पुत्री के अलावा बाकी सभी सदस्य उसे छोड़ कर चले जाते हैं। वृद्ध पुरोहित का कहना “दूसरों के लिए पुराणों के वाचन, दूसरों के स्थापित किए देवताओं के स्तवन से सैकड़ों लोगों के मरणोत्तर संस्कार मैंने निबटा दिए, मगर मेरे मरणोत्तर संस्कार कौन निबटाएगा, बेटी ?”22 अपने आप में एक विचार छोड़ जाता है। ‘काला कौवा’ कहानी माता-पिता विहीन बच्चों की परिवार में स्थिति व उनके जीवन की समस्याओं को चित्रित करती है। इस कहानी में कुंती और गोपियां नामक भाई-बहिन अपने माता-पिता के देहान्त के बाद अपने काकी-काका के यहां रहते हैं। वहां उनसे काम करवाया जाता है, पर उनकी देखभाल नहीं की जाती। जब कुंती शादी के लायक होती है तो काकी के कथन समाज की दकियानूसी सोच को व्यक्त करते हैं- “एक तांबे की कलशी जैसी कुन्तू हमारे घर में भी पड़ी हुई है। पहाड़ में ब्याहोगे, तो चार भांडे गांठ के ही लगाने पड़ेंगे। देसियो को दे दोगे, तो वे आप खर्च लगाकर डोली उठा ले जायेंगे। सात-आठ सौ की चोखी रकम ऊपर से मिलेगी सो अलग। घर से ऋण की पोटली खिसकेगी, लछमी मैया आयेगी। सात सौ में तो तीन असीस भैंसे आएगी। शहर में दूध लगा दोगे हलवाइयों के यहां तो घर गृहस्थी को कुछ नून, तेल, गुड़ का आसरा हो जाएगा।”23 ऐसे ही ‘नीत्शी’ कहानी स्त्री शोषण और वेश्यावृत्ति में जबरदस्ती धकेली जाने वाली लड़कियों की कहानी है, जिन्हें दाई प्रशिक्षण कार्य के बहाने वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है।

इस प्रकार शैलेश मटियानी की अनेक ऐसी कहानियाँ हैं, जो समाज की वास्तविक विसंगतियों को हमारे सामने प्रस्तुत करती हैं। इनकी कहानियों में प्रेम का उदात्त रूप है तो कहीं सामाजिक ऊहापोह। कहीं धनिक वर्ग की विलासिता और शासन के कर्मचारियों के अमानवीय व्यवहार का चित्रण है, तो कहीं फुटपाथों, रेलवे स्टेशनों पर कराहती मानवता का यथार्थ बोध। प्रकाश मनु का कथन- “मटियानी की तकरीबन सभी रचनाएँ उनकी भीतरी और बाहरी तमाम लड़ाइयों की गवाह हैं। पर वे सिर्फ मटियानी की ही लड़ाइयों की गवाह नहीं हैं। वे हमारे देश की विराट जनता की विराट लड़ाइयों की भी गवाह हैं। यह मटियानी का महाप्राणत्व ही था कि वे अपनी हर लड़ाई को अपने पूरे समाज के विकट सुख-दुःख और लड़ाइयों का आईना बना देते थे। इसलिए भारतीय समाज के पिछले पचास वर्षों के संघर्ष और उतार-चढ़ावों को समझना हो, तो मटियानी की कहानियों से बेहतर समाजशास्त्रीय साक्ष्य मिलना मुश्किल है।”24

निष्कर्ष : निष्कर्षत: शैलेश मटियानी का कथा साहित्य जीवन के विभिन्न परिदृश्यों को दर्शाता है। इनके कथा साहित्य में यथार्थ रूप में मानवीय संवेदना के विविध रूपों का चित्रण किया गया है। साथ ही, समाज में विभिन्न स्तरों पर लोगों के मध्य होने वाले भेदभाव और विसंगतियों का भी सटीक चित्रण मटियानी की अनेक कहानियों में अभिव्यक्त किया गया है। 

संदर्भ :

  1. https://sablog.in/shailesh-matiani-a-great-storyteller-descended-from-sediment/12056; परिगमन तिथि: 29.04.2025.
  2. शैलेश मटियानी; मैमूद; ज्ञान गंगा, 205-सी चावडी बाजार, दिल्ली; संस्करण: 2012; पृ.-182.
  3. वही; पृ.-184.
  4. शैलेश मटियानी; दस प्रतिनिधि कहानियाँ; किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली; संस्करण: 2017; पृ.- 97.
  5. वही; पृ.-107-108.
  6. वही; पृ.-113.
  7. वही; पृ.-118-121.
  8. https://www.bhaskar.com/national/news/corruption-increased-in-india-ranked-96th-in-transparency-report-2024    134458259.html#:~:text=Singapore%20%7C%20Transpare; परिगमन तिथि: 30.11.2025.
  9. शैलेश मटियानी; उद्धृत; डॉ. संजीव कुमार; लेख; (सं.) डॉ. सतीश पांडेय; समीचीन; बी-23, हिमालय सोसायटी, असल्फा, घाटकोपर (.), मुंबई- 400084; अंक- अप्रैल-जून, 2021; पृ.- 83.
  10. शैलेश मटियानी; शैलेश मटियानी की लोकप्रिय कहानियां; प्रभात पेपर बैक्स 4/19 आसफ अली रोड नई दिल्ली; संस्करण: 2022; पृ.-135.
  11. वही; पृ.-137.
  12.  https://navbharattimes.indiatimes.com/india/global-hunger-index-2024-india-ranked-105th-out-of-127-countries/articleshow/114151897.cms; परिगमन तिथि: 30.11. 2025.
  13. मनोहर श्याम जोशी; उद्धृत; डॉ.दीपिका विजयवर्गीय; लेख; (सं.) डॉ. सतीश पांडेय; समीचीन; बी-23, हिमालय सोसायटी, असल्फा, घाटकोपर (.), मुंबई; अंक- अप्रैल-जून, 2021; पृ.-143.
  14. शैलेश मटियानी; दस प्रतिनिधि कहानियाँ; किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली; संस्करण: 2017; पृ.- 46
  15. वही; पृ.- 52.
  16. गोपाल राय; उद्धृत; अमरदीप सिंह; लेख; (सं.) डॉ. सतीश पांडेय; समीचीन; बी-23, हिमालय सोसायटी, असल्फा, घाटकोपर (.), मुंबई; अंक- अप्रैल-जून, 2021; पृ.- 91. 
  17. शैलेश मटियानी; दस प्रतिनिधि कहानियाँ; किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली; संस्करण: 2017; पृ.- 76.
  18. शैलेश मटियानी; शैलेश मटियानी की लोकप्रिय कहानियां; प्रभात पेपर बैक्स 4/19 आसफ अली रोड नई दिल्ली; संस्करण: 2022; पृ.- 153.
  19. प्रकाश मनु; उद्धृत; अमरदीप सिंह; लेख; (सं.) डॉ. सतीश पांडेय; समीचीन; बी-23, हिमालय सोसायटी, असल्फा, घाटकोपर (.), मुंबई; अंक- अप्रैल-जून, 2021; पृ.- 95.
  20. शैलेश मटियानी; मैमूद; ज्ञान गंगा, 205-सी चावड़ी बाजार, दिल्ली; संस्करण: 2012; पृ.- 93.
  21. वही; पृ.- 94.
  22. शैलेश मटियानी; दस प्रतिनिधि कहानियाँ; किताबघर प्रकाशन, 4855- 56/24 अंसारी रोड, दरियागंज,नई दिल्ली; संस्करण: 2017; पृ.- 85.
  23. शैलेश मटियानी; सुहागिनी तथा अन्य कहानियां‌‌; अनुभूति प्रकाशन ,५३करनपुर, इलाहाबाद; संस्करण: 1989; पृ.- 34.
  24. प्रकाश मनु; कथापुरुष शैलेश मटियानी अंतरंग स्मृतियाँ और मुलाकातें; ग्रंथ सदन, शाहदरा, दिल्ली; संस्करण: 2004; पृ.- 30 .

 

नन्दू सोनी
पीएच.डी. शोधार्थी, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़
nandusoni58884@gmail.com
 
अमित कुमार
सह-आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़
amitmanoj2018@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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