शोध आलेख : नामवर सिंह की आलोचना : आधुनिक कविता का मूल्यांकन / योगेश शर्मा

नामवर सिंह की आलोचना : आधुनिक कविता का मूल्यांकन
- योगेश शर्मा


शोध सार : हिंदी कविता के सन्दर्भ में नामवर सिंह की आलोचना संवाद के रूप में विकसित हुई है। आरम्भ में रामचंद्र शुक्ल तथा उसके पश्चात रामविलास शर्मा, अज्ञेय, ओमप्रकाश ग्रेवाल तथा रामस्वरूप चतुर्वेदी सरीखे प्रज्ञावान पाठकों तथा हिंदी साहित्य के इतिहास एवं परम्पराओं के साथ निरन्तरता में संवाद करते हुए उन्होंने अपनी आलोचना पद्धति को आकार दिया। अपने आलोचकीय दायित्वों का सार्थक निर्वहन करते हुए उन्होंने आलोचना कर्म को एक स्वतंत्र रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में परिभाषित किया।

      नामवर सिंह की आलोचना का आधार उनका समृद्ध जीवन विवेक, इतिहास बोध, परम्परा बोध और काव्य-आस्वाद प्रक्रिया की सूक्ष्म समझ है। 'छायावाद' को पुनर्परिभाषित करने से लेकर 'कविता के नए प्रतिमान' और 'दूसरी परंपरा की खोज' तक, उन्होंने हिंदी आलोचना को नई दिशा दी। इस प्रक्रिया में उन्होंने छायावाद को छद्म रहस्यवाद से मुक्त किया तथा नई कविता को छद्म छायावादी पूर्वग्रहों से। उन्होंने कविता की शास्त्रीय और अभिजात्य परम्परा के समानांतर ऊर्जस्वी और सुदीर्घ लोकधर्मी परम्परा की खोज की।

      यद्यपि उनकी आलोचना युगांतकारी है तथापि उसकी कुछ सीमाएं भी हैं जो कालांतर में उद्घाटित हुई और वाद विवाद संवाद का आधार बनी। प्रस्तुत शोध पत्र का उद्देश्य हिंदी कविता के सन्दर्भ में नामवर सिंह के आलोचना कर्म को समग्रता में समझने का है। 

बीज शब्द : नामवर सिंह, आधुनिक कविता, संवाद, रचनात्मक, आलोचना, छायावाद, नई कविता, बिम्ब, सपाटबयानी।

मूल आलेख : नामवर सिंह की आलोचना को प्रज्ञाशील साहित्य की श्रेणी में रखा जाना चाहिए। इसकी सबसे मजबूत वजह है उनकी आलोचना पद्धति में एक शैली की तरह मौजूद उनका बहुआयामी संवाद। उनकी आलोचना प्रक्रिया में यह संवाद केवल रचना और पाठक के बीच का स्थूल व्याख्यात्मक संवाद नहीं है। इसके बरक्स वे अपने आलोचकीय कर्म में एहतियातन रूप से प्रायः सभी रचनाओं का पाठ इतिहास, परम्परा, वर्तमान और विभिन्न आलोचकीय दृष्टियों के मध्य परस्पर संवाद को विस्तार देते हुए करते हैं। वे रचना की व्याख्या के समानांतर इतिहास और परम्परा बोध को भी गढ़ते हैं। यह इतिहास बोध स्थूल मार्क्सवादी नजरिए की बजाय निहायत निजी अंतर्दृष्टि की सार्थक संगति में उद्भूत होता है। फलतः यह बोध उनके यहाँ एक रचनात्मक संवाद के रूप में परिष्कृत होता है।

      यह रचनात्मक आलोचना प्रक्रिया अनायास ही घटित नहीं होती अपितु इसमें एक पूर्ण रचनात्मक सजगता निहित रहती है। नामवर सिंह के एक आलेख से यह स्थिति स्पष्ट भी होती है जिसमें उन्होंने लिखा है किदरअसल यह एक रोमांटिक अवधारणा रही है कि लेखक में ही सृजनशीलता होती है और उसके अलावा जो लोग हैं, उसमें नहीं होती। उत्तर आधुनिकता ने यह कहा है कि पाठक भी सर्जक होता है। मैं अपने को पाठक मानता हूँ। आलोचना कर्म में लगे होने के कारण मुख्यतः मैं सृजनात्मक साहित्य का ही पाठक हूँ। लेकिन पाठक भी सर्जक होता है। कविता को पढ़ते समय, उसकी व्याख्या करते समय, वह उसी कविता को फिर रचता है। और हर पाठक उस कविता को अपने तरीके से रचता है।1 इस उद्धरण से यह स्पष्ट है कि नामवर सिंह अनुभूति की शुद्धता की अहमियत को पहचानते थे। यही कारण है कि उन्होंने आलोचना कर्म को रचनात्मक कर्म के रूप में स्वीकार किया किन्तु, यह उतना साधारण काम कदापि नहीं है। साहित्यिक आलोचना के अपने जोखिम भी हैं। यदि वह जीवन से पैदा नहीं होती और रचना के प्रति गहरी आत्मीयता या गहन संसक्ति नहीं रखती तो कालांतर में अमूमन वह एक बेकार चीज साबित होती है। मुक्तिबोध से शब्द उधार लेकर कहा जा सकता है उनकी आलोचना में ज्ञानात्मक संवेदना और संवेदनात्मक ज्ञान आपस में गुम्फित होकर प्रस्तुत होते हैं। इससे उनकी आलोचना विश्वसनीय बनती है। आशीष त्रिपाठी ने एक जगह लिखा हैएक विश्वसनीय आलोचक रचना, जीवन और शास्त्र में निरंतर संवाद करता रहता है। काव्य-परम्परा और भाषा परम्परा से कृति के विशिष्ट सम्बन्ध को समझने के लिए उसे इन दोनों के साथ भी संवादरत रहना होता है।2 ध्यातव्य है कि यह संवाद उनकी आलोचना में वह शक्ति पैदा करती है जो एक पाठक और रचना के मध्य एक सेतु का काम करती है। उनके आरंभिक आलोचना कर्म में ही यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आती है।

      छायावाद की व्याख्या करने के लिए उन्होंने एक जरूरी संवादी हस्तक्षेप का रास्ता चुना। उन्होंने छायावाद को आधुनिक कविता का प्रस्थान-बिंदु मानते हुए, उसे 'मिस्टीसिज्म' या 'पलायनवाद' की संकीर्ण व्याख्याओं से मुक्ति दिलाई। तदुपरांत उन्होंने छायावाद को भारतीय राष्ट्रीय जागरण और व्यापक स्वतन्त्रता संघर्ष की अभिव्यक्ति के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने स्थापित किया किछायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।3 जाहिर है कि छायावादी रचनाकार मध्यवर्गीय व्यक्ति था। उसके पुरानी रूढ़ियों से मुक्त होने का अर्थ सामाजिक स्वाधीनता था। नामवर सिंह ने इसे रेखांकित किया तथा छायावाद को एक ऐसे आधुनिक काव्य आन्दोलन के रूप में स्थापित किया जो कविता के पूरे चरित्र को बदल रहा था। उन्होंने छायावाद में महज साहित्यिक घटकों को नहीं देखा बल्कि नेपथ्य में छुपे उस समाज को भी देखा जिसमें वह कविता निर्मित हो रही थी। महादेवी वर्मा की कविताओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा किसामन्ती रूढ़ियों वाले समाज के सामने जब एक पुरुष की यह स्थिति है तो इस पुरुष प्रधान समाज में नारी के लिए आत्माभिव्यक्ति में कितनी कठिनाई हो सकती है, यह सहज अनुमेय है। फिर भी महादेवी वर्मा ने अपने गीतों में वैयक्तिक ढंग से अभिव्यंजना की और इसके लिए उन्होंने कितने प्रवाद झेले, इसे बतलाने की जरूरत नहीं है।4 यह नामवर सिंह की ज्ञानात्मक संवेदना का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहाँ उनका ज्ञान उनकी संवेदना का हिस्सा बनता है और उन्हें वह भी देखने और उद्घाटित करने में मदद करता है जो पीछे के आलोचकों से छूट रहा था। यहाँ उनकी व्याख्या महज भावनाओं का ही उत्पाद नहीं है अपितु बुद्धि और तर्क भी उसमें सम्यक भूमिका निभा रहे हैं। ध्यातव्य है किछायावादनिबन्ध का प्रकाशन 1955 में हुआ था तो इस लिहाज से यह दृष्टि एक 27-28 बरस के युवा अध्येता की दृष्टि है। इससे हमें नामवर सिंह की मेधा का सहज अनुमान हो जाता है।

      यदि कोई आलोचक रचना में मात्र अच्छा ही अच्छा देखे, प्रशंसा के पुल ही बांधे और मुग्धता का अवांछनीय प्रदर्शन करे तो समझ जाना चाहिए कि वह आलोचक नहीं कुछ और चीज है। एक आलोचक के लिए अनिवार्य है कि वह रचना के तमाम पक्षों को बारीकी से दखे। उसे अतीत के साथ-साथ, वर्तमान और भविष्य के संदर्भ में भी बांचे। यह तभी सम्भव है जब किसी आलोचक का जुड़ाव देशज तथा विदेशी, दोनों तरह की समृद्ध ज्ञान परम्पराओं के साथ-साथ अपने सजातीय लोक चित्त की स्मृति-परम्पराओं संस्कारों से होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो आलोचना की प्रज्ञा मूलक संवाद-धर्मिता को संदेह की दृष्टि से देखा जाएगा। नामवर सिंह इस सन्दर्भ में भी सचेत नजर आते हैं।

      अपने निबन्धछायावादका समापन करते हुए उन्होंने लिखा है किइस व्यक्तिवादी प्रवृत्ति ने ही उसका संपर्क व्यापक जन-जीवन से भली-भाँति जुड़ने दिया - उस जन-जीवन से जो युग-युग के साहित्य, कला और संस्कृति को अपने अक्षय स्रोत से उत्पन्न और विकसित करता रहा है और जिससे अलग होकर कोई साहित्य, कला अथवा संस्कृति जी नहीं सकती। छायावाद की सीमाएँ भावी काव्य के लिए उसी अक्षय स्रोत से संपर्क स्थापित करने का संदेश देती हैं। प्रगतिशील साहित्य उसी संदेश की पुकार है।5 जाहिर है कि उन्होंने छायावाद में निहित एकदेशीय स्वर तथा व्यक्तिवादी प्रवृत्ति की तरफ स्पष्ट संकेत किया तथा इस सीमा को प्रगतिशील साहित्य के उत्थान का आधार माना। प्रगतिशील साहित्य अपनी परम्परा के स्वाभाविक विकास में विकसित हुआ। इसको नामवर सिंह ने चिह्नित किया। यह इतिहास बोध उन्हें विशिष्ट बनाता है। उन्होंने छायावादी आन्दोलन तथा प्रगतिशील आन्दोलन को इतिहास रेखा पर दो भिन्न बिन्दुओं की भांति नहीं अपितु एक स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह देखा।

      समय के साथ यह सिद्ध हो गया है कि छायावाद की वे ही कविता जीवित रह पाई हैं, जिनका जुड़ाव व्यापक जन मानस से था। जिस प्रगतिशीलता के आधार की बात नामवर सिंह करते हैं उसके बीज छायावाद में निराला के यहाँ मौजूद थे। यही वजह है कि उन्होंने निराला के यथार्थ बोध की पहचान करते हुए उनको छायावाद के सर्वोत्कृष्ट कवि रूप में स्वीकार किया। नामवर सिंह का यह स्वीकार निर्वैयक्तिकता के उस सिद्धांत के बिलकुल खिलाफ है जिसमें कवि और रचना को दो भिन्न इकाइयां माना जाता है। उन्होंने निराला के बारे में लिखा किवे सामाजिक जीवन में सबसे अधिक जागरूक और सक्रिय रहे।6 जो आलोचक स्वयं समाज के प्रति प्रतिबद्ध ना हो, वह किसी कवि को इस आधार पर इतने विशाल काव्य आन्दोलन का सर्वोत्कृष्ट कवि नहीं कह सकता। नामवर सिंह की यह घोषणा अकेले निराला की ही सामाजिक सजगता का पर्याय नहीं है बल्कि आलोचक के रूप में नामवर सिंह के जीवन-विवेक की भी उतनी ही पर्याय है। यह जीवन विवेक ही उन्हें रामचंद्र शुक्ल की लोक मंगल की अवधारणा के बरक्स एकलोक-चिंताबेहतर दृष्टि के चयन की सुविधा देता है, जिसे वे दूसरी परम्परा को खोजते हुए प्राप्त करते हैं।

      यद्यपि नामवर सिंह की पुस्तकदूसरी परम्परा की खोज’ 1982 में प्रकाशित हुई तथापि वे इस परम्परा का उद्घाटन इससे पहले प्रकाशित पुस्तकों में कर चुके थे। मसलन कविता के नए प्रतिमान में वे नई कविता को छायावादी प्रतिमानों पर ना परखने की वकालत करते हैं। पुस्तक के आरम्भ में ही जगदीश गुप्त की नई कविता की परिभाषा का खंडन करते हुए उसमें निहित छायावाद युगीन संस्कारों को उद्घाटित करते हैं। इसके अलावा वे छायावाद युगीन रस सिद्धांत पर आधारित आलोचना की गहन पड़ताल करते हुए उसमें अंतर्भूत काल दोष की सम्यक पहचान करते हैं।रस के प्रतिमान की प्रसंगानुकूलतापर बात करते हुए वे कहते हैं किछायावाद के आत्मपरक रोमानी संस्कारों से ग्रस्त आलोचकों ने रस-सिद्धांत को एक आत्मपरक रोमांटिक सिद्धांत का रूप दे डाला है। यदि इस प्रकार की व्याख्या छायावाद युग में हुई होती तो इसे एक युग की आवश्यकता समझकर ऐतिहासिक अनिवार्यता के रूप में स्वीकार भी कर लिया जाता। किन्तु छायावाद युग की समाप्ति के बाद इस प्रकार की आत्मपरक व्याख्याएं केवल कालदोष ही कहलाएंगी।7 उद्धरण से स्पष्ट है कि नामवर सिंह रस सिद्धांत तथा छायावाद युगीन संस्कारों  के अंधे विरोधी नहीं हैं अपितु वे हिंदी कविता-आलोचना के संस्कारों में नियमित परिष्कार के दृढ़ हिमायती हैं। यह पहचान उनकी आलोचना दृष्टि को एक ऐसी मजबूती प्रदान करती है जिससे उनकी आलोचना, भविष्य के आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण पाठ साबित होती है। वे एक निहायत जड़ आलोचक होने की बजाय समयानुसार अपने औजारों को विकसित करना जानते थे। इसलिए उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के प्रतिमानों को महज ख़ारिज ही नहीं किया बल्कि नई कविता के पाठ के लिए नए प्रतिमान भी विकसित किए।

      नामवर सिंह प्रचलित प्रतिमानों में परिष्कार की मांग करते हुए, काव्य-भाषा, तनाव, अनुभूति तथा परिवेश जैसे नए प्रतिमानों को कवितागत आलोचना के केंद्र में लेकर आए।  हालांकि उनकी इस स्थापना में कभी-कभी भारी विरोधाभास भी नजर आता है। मसलन वे अज्ञेय, केदारनाथ सिंह और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविताओं में बिम्बधर्मिता पर बात करते हुए कई जगह कविता की रचना प्रक्रिया को निहायती मशीनी ढंग से देखने लगते हैं। मिसाल के तौर पर वे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक ही कविता से दो बिम्ब उद्धृत करते हुए कहते हैं किये दोनों बिम्ब अपने आप में पूर्ण हैं और किसी संदर्भ की अपेक्षा नहीं रखते। यह भी उल्लेखनीय है कि ये दोनों बिम्ब पुर्णतः स्वतंत्र हैं और यदि किसी ने इन्हें एक ही कविता के अंतर्गत देखा हो तो वह इनमें से प्रत्येक को स्वतंत्र कविता के रूप में ग्रहण करके आनंद ले सकता है। यदि ये बातें सच हैं तो स्वभावतः यह सवाल उठता है कि इन्हें एक ही कविता में स्थान देने की काव्यात्मक अनिवार्यता क्या है?8 और इस आलेख को सम्पन्न करते करते वे बिम्ब को काव्यभाषा का एक दोष सिद्ध करते हैं और उसे कविता में आई सपाटबयानी की वजह घोषित करते हैं। उनका कहना है किकविता में बिम्ब वास्तविकता के साक्षात्कार का ही सूचक नहीं होता, प्रायः वह वास्तविकता से बचने का एक ढंग भी रहा है। काव्य-भाषा के लिए भी प्रायः बिम्ब-योजना हानिकारक सिद्ध हुई है। बिबों के कारण कविता बोलचाल की भाषा से अक्सर दूर हटी है, बोलचाल की सहज लय खंडित हुई है, वाक्य-विन्यास की शक्ति को धक्का लगा है, भाषा के अंतर्गत क्रियाएँ उपेक्षित हुई हैं, विशेषणों का अनावश्यक भार बढ़ा है और काव्य-कथ्य की ताकत कम हुई है। इन कमजोरियों को दूर करने के लिए ही कविता में तथाकथित 'सपाटबयानी' अपनाई जा रही है, जिसमें फिलहाल काफी संभावनाएँ दिखाई पडती हैं।9 जाहिर है कि वे बिम्ब की बजाय सपाटबयानी में अधिक सम्भावनाएं देख रहे थे। उनका मानना था कि बिम्ब प्रायः वास्तविकता से बचने का एक ढंग भी रहा है। किन्तु विडंबना यह है कि उन्होंने नई कविता के केंद्र में स्थापित किया मुक्तिबोध को। मुक्तिबोध, यानी जटिल बिम्बों का कवि। और मुक्तिबोध की कविता में नाटकीयता की उन्होंने भूरी-भूरी प्रशंसा की। शायद यहाँ वे भूल रहे थे कि वास्तविकता का कोई एक आयाम नहीं होता। मसलन, गोदान का होरी भी दुखी है, और ब्रदर्स कारमाजोव का इवान भी। दोनों के दुःख अलग हैं, शाश्वत हैं। होरी के 90 फीसदी दुखों को पैसे से ख़त्म किया जा सकता है, किन्तु इवान के एक प्रतिशत दुःख को भी दुनिया की तमाम दौलत से खत्म नहीं किया जा सकता। दोनों इसी दुनिया में अस्तित्वमान हैं और दोनों दुखी भी हैं किन्तु दोनों के दुःख की वास्तविकता में गहरा अंतर है। खैर, मुक्तिबोध की कविताअँधेरे मेंकी नाटकीयता की प्रशंसा में वे लिखते हैं किउनकी अभिव्यक्ति की गरिमा का पता उस विराट बिम्ब लोक से चलता है जोअँधेरे में-जैसी महाकाव्यात्मक कविता अपनी समग्रता में प्रस्तुत करती है। इस सन्दर्भ के द्वारा ही कविता के अंतर्गत आए हुए छोटे छोटे सामान्य सपाट कथन भी अर्थ गौरव से पूर्ण लगते हैं।10 यह सर्व विदित है कि मुक्तिबोध की लम्बी कविता में आए बिम्ब एक अनिश्चित क्रम में आते हैं। भले ही फिर वे उस जटिल रचना प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ही क्यों ना हों। ध्यातव्य यह है कि ये वही नामवर सिंह हैं जिन्हें अँधेरे में कविता का विराट बिम्ब लोक तो दिखाई देता है किन्तु वे बेहद मशीनी ढंग से केदारनाथ सिंह की कविताओं में आए बिम्बों में एक निश्चित क्रम को खोजने लगते हैं और इसे कविता की कमजोरी स्थापित करते हैं। इतना ही नहीं केदारनाथ सिंह द्वारा बिम्ब निर्माण के लिए प्रयुक्त शब्दों के प्रयोग पर भी प्रश्न चिह्न लगाते हैं। याद रखने योग्य बात है कि मुक्तिबोध ने तोअँधेरे मेंकविता में डैश, खड़ी पाई जैसे शब्दों तक का प्रयोग किया है। स्पष्ट है कि बिम्ब सम्बन्धी मूल्यांकन में नामवर जी से कुछ जल्दबाजी अवश्य हुई है।

      इसके बावजूद नामवर सिंह के आधुनिक कविता सम्बन्धी मूल्यांकन को कम करके नहीं आँका जा सकता। उन्होंने मैथिलीशरण गुप्त के काव्य का पाठ राष्ट्रीय नवजागरण के व्यापक संदर्भों में किया, कविता और अकविता की बड़ी बहस में सार्थक हस्तक्षेप किया। मुक्तिबोध, नागार्जुन, शमशेर और त्रिलोचन जैसे बड़े कवियों की कविता में व्याप्तसार्वजनिक मूल्योंकी पड़ताल की तथा उन्हें उद्घाटित किया। इसके अलावा उन्होंने कविता की भाषा के सन्दर्भ कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए जैसे – “ कविता शब्दों की संख्या से धनी नहीं होती, इस्तेमाल में आने वाले शब्दों केसार्वजनिक मूल्यसे धनी होती है।11 इस तरह के गंभीर निष्कर्ष कविता को समझने की उनकी सुलझी हुई परिपक्व दृष्टि के परिचायक हैं, वह दृष्टि जो उन्होंने शास्त्र, लोक और जीवन विवेक के सम्यक सामंजस्य से अर्जित की है।

निष्कर्ष : निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है नामवर सिंह का आधुनिक कविता का मूल्यांकन उनकी निरंतर विकासशील दृष्टि का परिचायक है। यही कारण है कि उनकी आलोचना में रचनात्मकता का पुट है तो रचनात्मक लेखन जैसे गहरे अन्तर्विरोध भी। उनकी आलोचना प्रक्रिया में आद्योपांत उनकी शास्त्रीयता और लोकधर्मी प्रगतिशीलता के द्वंद्व से उपजा आत्म संघर्ष दृष्टिगोचर होता है। यह संघर्ष संवादी आलोचना शैली का महत्वपूर्ण पहलू है। नामवर सिंह की आधुनिक कविता सम्बन्धी आलोचना अगली पीढ़ी के लिए वादविवादसंवाद का आधार बनने की तमाम काबिलीयत रखती है।

संदर्भ :

  1. सिंह, नामवर. (सं. त्रिपाठी, आशीष.). आधुनिक विश्व साहित्य और सिद्धांत. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2023. पृ. 244.
  2. वही. पृ. 12
  3. सिंह, नामवर. छायावाद. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2011. पृ. 17
  4. वही. पृ. 21
  5. वही. पृ. 55
  6. वही. पृ. 155
  7. सिंह, नामवर. कविता के नए प्रतिमान. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2021. पृ. 53
  8. वही. पृ. 120
  9. वही. पृ. 131
  10.  वही. पृ. 230
  11.  सिंह, नामवर. (सं. त्रिपाठी, आशीष.). कविता की जमीन और जमीन की कविता. नई दिल्ली : राजकमल प्रकाशन, 2016. पृ. 207

 

योगेश शर्मा
शोधार्थी, हिंदी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, कुरुक्षेत्र
kaushikyogesh09@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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