शोध सार :
स्वातंत्र्योत्तर हिंदी
साहित्य में
‘किसान’ और
‘किसान कविता’
की अवधारणा बहुआयामी रूप
में विकसित हुई है।
प्रस्तुत शोध-सार
में किसान
जीवन की
संवेदनात्मक भिन्नताओं का विश्लेषण विशेषतः आदिवासी और दलित
किसान चेतना
के संदर्भ में किया
गया है।
अध्ययन का
उद्देश्य यह
स्पष्ट करना
है कि
किसान कोई
एकरूप सामाजिक इकाई नहीं,
बल्कि वर्ग,
जाति, भू-अधिकार, संसाधन और
सांस्कृतिक परिवेश के आधार
पर विभाजित समुदाय है।
इसी कारण
किसान कविता
में भी
अनुभव, संघर्ष, भाषा और
दृष्टि की
विविधता दिखाई
देती है।
आदिवासी किसान
कविता में
जल-जंगल-जमीन,
सामूहिकता, सहअस्तित्व और प्रकृति-केन्द्रित जीवन-दृष्टि प्रमुख रूप
से उपस्थित है। यहाँ
खेती केवल
उत्पादन नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और
अस्तित्व का
आधार है।
दूसरी ओर
दलित किसान
कविता में
खेत शोषण,
जातिगत अपमान
और आर्थिक पराधीनता के
प्रतीक के
रूप में
उभरता है।
दलित किसान
वर्ग भूमि-वंचना,
बेगारी, कर्ज
और सामाजिक बहिष्कार की
त्रासदी से
जूझता दिखाई
देता है।
इस शोधपत्र में यह
प्रतिपादित किया
गया है
कि हरित
क्रांति, पूंजीवादी कृषि व्यवस्था और कॉर्पोरेट हस्तक्षेप ने
छोटे एवं
सीमांत किसानों की स्थिति को अधिक
संकटपूर्ण बनाया
है। किसान
कविता इन
परिवर्तनों को
केवल यथार्थ रूप में
प्रस्तुत नहीं
करती, बल्कि
प्रतिरोध, अस्मिता और वैकल्पिक जीवन-दृष्टि का भी
निर्माण करती
है। निष्कर्षतः किसान कविता
भारतीय समाज
की अंतर्विरोधपूर्ण संरचना, किसान जीवन
की बहुविध संवेदनाओं तथा
बदलते कृषि-संकट
का महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज है।
बीज शब्द : किसान
कविता,
स्वातंत्र्योत्तर, कॉर्पोरेट, बाजारीकरण, दलित, आदिवासी,
कृषि,
सामूहिकता,
श्रम,
अलगावबोध ।
मूल
आलेख
: आज़ादी के बाद भारतीय किसान नीति का सफ़र भूमि सुधार से शुरू होकर हरित क्रांति,
बाजारीकरण और आज किसान अधिकारों की लड़ाई तक आ पहुँचा है। इस सफ़र में किसान राजनीति और नीति कुछ इस तरह रही कि कई बार किसान को लेकर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हुई। ‘किसान’ शब्द को एक एकरूप समूह मान लिया गया। किसान को एक इकाई मानकर बनाई गई नीतियों ने किसान समाज के भीतर मौजूद असमानताओं, विभिन्नताओं व विविधताओं को ढक दिया,
जिससे किसान शब्द को लेकर एक स्थायी भ्रम की स्थिति बनी रही। जबकि वास्तव में किसान वर्ग, जाति, क्षेत्र और संसाधनों के आधार पर बँटा हुआ
है ।
ऐसे में
सवाल उठता
है कि
किसान कौन
है? प्रेमचंद की दृष्टि में जमीन
पर मेहनत
करने वाला,
राहुल सांकृत्यायन की दृष्टि में उत्पादन का मूल
श्रमिक, त्रिलोचन की दृष्टि में ग्रामीण जीवन की
सांस्कृतिक आत्मा,
महाश्वेता देवी
की दृष्टि में भूमिहीन, खेत मजदूर,
जंगल पर
आश्रित है
या कोई
और? मूलतः
लेखकों की
दृष्टि में
किसान भूमि
का मालिक
नहीं,
बल्कि भूमि
से जीवन
बाँधने वाला
श्रमशील शोषित
मनुष्य है।
निष्कर्षतः कह
सकते हैं
कि किसान
के अंतर्गत हम केवल उसी को किसान नहीं कह सकते
हैं
जिनके पास उपजाऊ भूमि है, अपितु वे लोग भी किसान
के अंतर्गत आते हैं जिनके पास भूमि नहीं है,
लेकिन वह कृषि कार्य
से जुड़े
हैं। उदाहरण के तौर
पर स्वामीनाथन आयोग की
अनुसंशा पर
‘राष्ट्रीय किसान नीति-2007
में किसान को
एक छतरी
पद की
तरह व्याख्यायित किया गया
है, “किसान
शब्द के अंतर्गत वे सभी लोग आते हैं,
जो
फसल उगाने
तथा अन्य
प्राथमिक कृषि
उत्पाद पैदा
करने के
लिए आर्थिक अथवा जीवनयापन संबंधी गतिविधि में सक्रियता से संलग्न हैं और
इसमें सभी
कृषि प्रचालन जोतधारी कृषक,
कृषि श्रमिक, बटाईदार, काश्तकार,
मुर्गीपालक तथा
पशुपालक, मछुआरे, मधुमक्खीपालक, माली,
चरवाहे, गैर
सामूहिक पौध-रोपण
करने वाले
तथा पौध-रोपण
करने वाले
श्रमिक तथा
विभिन्न कृषि-संबंधित व्यवसायों जैसे
रेशमपालन, कृमिपालन और कृषि-वानिकी से जुड़े
व्यक्ति शामिल
होंगे। इस शब्द
के अंतर्गत जनजातीय परिवार / झूम खेती
से जुड़े
व्यक्ति और
गौण तथा
गैर-इमारती वन-उत्पाद के संग्रहण व उपयोग
तथा बिक्री में संलग्न व्यक्ति भी
शामिल होंगे”1
ऐसे में किसान
का क्षेत्र काफ़ी विस्तृत कहा जा
सकता है।
साथ ही,
किसान पर
लिखी कविताओं का भी
क्योंकि इस
तरह की
परिभाषा किसान
कविता के
क्षेत्र को
केवल खेत
तक सीमित
न रखकर
समाज,
बाज़ार और
राज्य तक
फैला देते
है। ‘किसान
कविता’ की
एक लम्बी
परंपरा हमारे
यहाँ उपलब्ध है, कहीं
वो सामंतवाद विरोधी चेतना
के रूप
में, कहीं
उपनिवेशवाद विरोधी चेतना के
रूप में,
कहीं वर्ग
संघर्ष की
चेतना के
रूप में,
कहीं आंदोलनों में तमाम
दमन और
शोषण के
खिलाफ़ अपनी
भूमिका सिद्ध
करती रही
है। साथ
ही, छोटे-छोटे
किसानी जीवन
के अनुभव
को भी
सामने लाती
है। आज
किसान से
संबंधित ढेरों
कविता हमारे
सामने मौजूद
है। आखिर
किन कविताओं को ‘किसान
कविता’ कहा
जाना चाहिए?
इस सम्बन्ध में प्रो.
रामाज्ञा शशिधर
ने अपनी
पुस्तक ‘किसान
आंदोलन की
साहित्यिक जमीन’
में कुछ
विचार को
सामने रखा
हैं कि
“ऐसी कविता
जिसमें किसान
के जीवन,
अनुभव, संघर्ष और स्वप्न की अभिव्यक्ति स्थूल या
प्रतीकात्मक चित्रशाला के रूप
में हुई
हो। किसान
कविता एक
व्यापक अवधारणा है जिसमें किसानों या
किसान कवियों के द्वारा रचे गए
जनगीत, लोकगीत और काव्य
के अतिरिक्त किसान जीवन
से सहानुभूति रखने वाले
कवियों की
कविता भी
शामिल हो
सकती है।
किसान कविता
पूर्ण स्वायत्त रचनात्मक इकाई
भी हो
सकती है
तथा किसी
अन्य विषय
वस्तु पर
रचित कविता
का एक
हिस्सा भी
हो सकती
है। अपने
स्वायत्त एवं
अधीनस्थ दोनों
रूपों में
किसान कविता
किसान चेतना
के अनुभव,
उमंग, शोषण
एवं स्वप्न के प्रतिरोध की अभिव्यक्ति है।”2 यानि
बीजों पर,
जलवायु संकट, सूखा/बाढ़
के संबंध
में, क़र्ज़
और आत्महत्या पर, बाज़ार की लूट
के संबंध
में, किसान
की अस्मिता और आत्मसम्मान के संबंध
में, साथ
ही साथ
पशुपालन, रेशमपालन, मत्स्यपालन, कृषक
मजदूर पर
आदि लिखी
कविता भी
‘किसान कविता’
है। ‘किसान
कविता’ किसानी अस्तित्व की
अतीत, वर्तमान व भविष्य की कलात्मक दर्पण है,
जिसमें समाज
नंगा खड़ा
है, यहां
रंगीन दृश्य
भी है,
बेरंग दृश्य
भी।
आज़ादी के पहले
और बाद
ढेरों किसान
कविताएँ लिखी
गई, इन
कविताओं में
विचार, संवेदना और भाषा
के स्तर
पर काफी
विविधता देखी
जा सकती
है। इन
विविधताओं के
मूल में
वे किसान
जीवन को
देखने की
दृष्टि है,
जो कवि
ने निजी
जीवनानुभवों से
कमाया होता
है। एक
आदिवासी लेखक
की किसान
जीवन को
देखने की
दृष्टि दलित
या मुख्यधारा के लेखक
से भिन्न
होती है,
इसी तरह
किसानी परिवेश से आने
वाले लेखक
और अन्य
के बीच
भी। कारण
दोनों के
बीच का
जीवनबोध भिन्न
परिवेश में
निर्मित होता
है। उदाहरण के तौर
पर ‘आदिवासी किसान’ और
‘दलित किसान’
के बीच
कुछ मूलभूत अन्तर को
समझे तो
एक की
जहाँ किसानी के प्रति
सकारात्मक दृष्टि/ जीवनोन्मुख है,
तो दूसरे
की नकारात्मक/ मृत्युन्मुखी। ऐसा
नहीं है
कि सकारात्मक का मतलब
संघर्ष नहीं
है, संघर्ष है पर
उसके पीछे
का कारण
भिन्न है।
एक का
जहाँ ज्यादा संघर्ष पुरातन व्यवस्था (जातिवाद, धार्मिकता, संसाधनों पर कब्जा)
से है,
वहीं दूसरे
का मुख्यतः नई व्यवस्था (पूंजीवादी तंत्र)
से है
। आदिवासी किसान का
किसानी के
साथ सामूहिकता, सहजीविता, सहअस्तित्व का संबंध
है। भूमि
केवल उत्पादन का साधन
नहीं,
बल्कि
इतिहास,
स्मृति,
कुल–गोत्र
और अस्तित्व है
। इनका
अपना एक
भौगोलिक (जंगल, पहाड़ और
नदी पर
निर्भर जीवन),
सामाजिक (सामूहिक भूमि-परंपरा/जीवन का
हिस्सा/व्यक्तिगत स्वामित्व कम)
और आर्थिक (प्रकृति आधारित-महुआ, साल
बीज,
लाख,
गोंद/बाँस,
लकड़ी, पत्तल-दोना
निर्माण/जड़ी-बूटियाँ और फल/शिकार
और मछली
पकड़ना/बाँस
व लकड़ी
शिल्प) ढांचा
है ।
यहां पूरा
जंगल ही
खेत का
पर्याय है,
फ़सल के
रूप में
पूरे जंगल
से प्राप्त फल/कंदमूल/सब्जी/लकड़ी
है, वहीं
दूसरी ओर
का किसानी अनुभव आदिवासी व संभ्रांत किसान
से अधिक
जटिल है।
यह किसान
वर्ग एक
साथ जाति
आधारित उत्पीड़न और
आर्थिक शोषण
दोनों को
झेलता है।
इनकी पहचान
मुख्यतः बटाईदार, खेत-मज़दूर या सीमांत किसान, बंधुआ
मज़दूर आदि
के रूप
में की
जा सकती
है। इनका
किसानी जीवन
प्रारंभिक काल
से ही
ज्यादा असुरक्षित रहा है
क्योंकि संसाधनों का संकेन्द्रण एक वर्ग
तक सीमित
था। जिससे
अन्य वर्ग
भूमि के
स्वामित्व से
वंचित रहा
है। भूमि
हमेशा से
आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा होने
के कारण
भूमिहीन/सीमांत कृषक, जो
की ज्यादातर दलित/पिछड़ी
समुदाय से
आते है,
इनका जीवन
दोयम दर्जे
का जीने
के लिए
विवश रहा
है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डेनियल थार्नर अपने लेख
'द इमरजेंस आफ कैपिटेलिस्ट एग्रीकल्चर'
में लिखते
है कि
“भारत के
हर क्षेत्र में पूंजीवादी कृषि की
अभूतपूर्व वृद्धि (बूम) नजर
आती है।
ट्यूबवैल,
बिजली के
पंप सेट, ट्रेक्टर,
रासायनिक खाद
की सभी
थैलियां,
कीटनाशक,
बड़ी-बड़ी औषधियां और
खरपतवार को
नष्ट करने
वाली विधियां आदि आधुनिक कृषि की
नई शैली
का प्रमाण प्रस्तुत करती
हैं। आधुनिक कृषि की
इस नई
शैली के
मातहत कुल
खेती की
जमीन का
बहुत बड़ा
हिस्सा है,
जो कृषि
के आधुनिक तरीकों का
खेती की
बड़ी जोतों
में इस्तेमाल कर रहा
है। यही
नहीं शहर
से भी
कई उद्यमी लोग जमीन
में बड़ी
पूंजी लगाने
को आतुर
दिखते हैं।”3 साथ
ही इसी
लेख में
चिंता व्यक्त करते है
कि “अखिल
भारतीय पैमाने पर पूंजीवादी कृषकों का
एक सशक्त
वर्ग बड़े
पैमाने पर
मजबूत हुआ
है लेकिन
अभी यह
कहना मुश्किल है कि
भारतीय कृषि
किस दिशा
में परिवर्तित होगी?
इतना कहना
उपयुक्त होगा
कि छोटे
किसानों का
भविष्य बिलकुल स्पष्ट नहीं
है.... ।”4 इसी
भविषयोन्मुखी चिंता
को हिन्दी जगत ने
करीब से
नोट किया।
आगे यह
बिल्कुल स्पष्ट ही हो
गया है
कि मध्यम
व छोटे
किसानों का
जीवन अभिशापित है। हम
देखते हैं
कि आज
विकास की
परिभाषा बदल
गई है।
प्रकृति (जल-जंगल-जमीन)
का दोहन
तेजी से
बढ़ता जा
रहा है,
वहीं बर्बरतापूर्ण
विकास की आलोचना करते हुए,
अनुज लुगुन
अपनी कविता
‘हमारी अर्थी
शाही हो
नहीं सकती’
में लिखते
हैं, “हमारे
सपनों में
रहा है
/ एक जोड़ी
बैल से
हल जोतते
हुए / खेतों
के सम्मान को बनाए
रखना..../ हमने चाहा
कि / फसलों
की नस्ल
बची रहे
/ खेतों के
आसमान के
साथ / हमने
चाहा कि
जंगल बचा
रहे / अपने
कुल-गोत्र
के साथ
/ पृथ्वी को
हम पृथ्वी की तरह
ही देखें
/ पेड़ की
जगह पेड़
ही देखें
/ नदी की
जगह नदी
/ समुद्र की
जगह समुद्र और / पहाड़
की जगह
पहाड़....” 5
आदिवासी कवियों की
जीवन-दृष्टि में विकास
का अर्थ
बड़े सपनों
की दौड़
नहीं,
बल्कि जमीन
से जुड़े
छोटे-छोटे
सपनों की
निरंतरता है।
विकास का
अर्थ जल-जंगल-जमीन
से विस्थापन या बड़ी
परियोजनाएँ नहीं, बल्कि सहज
जीवन में
है।
एक आदिवासी लेखक की
दृष्टि में ‘विकास खुशहाली का परिचायक नहीं है बल्कि खुशहाली ही विकास की चरम
अवस्था होती है।’ इसलिए
वो खेतों
के सम्मान को पूरे
परिवेश के
साथ बचाना
चाहता है।
लेकिन ‘चाह’
और ‘हकीकत’
के बीच
की खाई
आदिवासी किसानी जीवन की
संरचनात्मक उपेक्षा को भी
उजागर करती
है। वहीं
जसिंता केरकेट्टा
की कविता
‘परवाह’ आदिवासी जीवन-संवेदना, प्रकृति-बोध और
नैतिक चेतना
को सामने
लाती है,
जहां पेड़ों
के लिए
चिंता है।
जिंदा पेड़
जीवित स्मृति है। वह
लिखती हैं
- “माँ / एक
बोझा लकड़ी
के लिए
/ क्यों दिन
भर जंगल
छानती / पहाड़
लाँघती / देर
शाम घर
लौटती हो?
/ माँ कहती
है / जंगल
छानती / पहाड़
लाँघती / दिन
भर भटकती
हूँ / सिर्फ़ सूखी लकड़ियों के लिए
/ कहीं काट
न दूँ
कोई ज़िंदा
पेड़!”6
यहाँ
खेती
एक
सांस्कृतिक
उपक्रम
है,
जिसमें
गीतों
से
सपने
बोए
जाते
है
और
फसल
के
रूप
में
सुंदर
दुनिया
की
कल्पना
की
जाती
रही
है।
महादेव
टोप्पो अपनी
कविता ‘मांदर
का साथ’
में लिखते
है- “हम
गाते रहेंगे / मांदर की
थाप पर
/ धरती की
सांसों के
गीत / धरती
की हरियाली के गीत.../नदियों के कल-कल
लयबद्ध तालों
के साथ
/ पहाड़ की
ठंढी शांत
हवाओं के
साथ..../ जीवन
को संवारने के गीत
/ अपने गांव
से लेकर
देश,
दुनिया को
बेहतर बनाने
के गीत
मांदर के
साथ।"7
यहां
स्त्री-पुरुष
दोनों
खेती में
परस्पर सहभागी होते हैं,
लेकिन श्रम
की महत्ता के बावजूद ‘अपनी जमीन
तलाशती बैचेन
स्त्री’ है।
निर्मला पुतुल
अपनी कविता
‘पहाड़ी स्त्री’ में लिखती
हैं कि “चादर में
बच्चे को
पीठ पर
लटकाये / धान
रोपती पहाड़ी स्त्री / रोप
रही है
अपना पहाड़
सा दुख
/ सुख की
एक लहलहाती फसल के
लिए।"8 लेकिन
निराशा, दुःख
व विषाद
के इतर
निर्मला पुतुल
सहभागिता की
ताकत भी
जानती है,
जिस पर
आदिवासी किसान
जीवन टिका
है। आदिवासी कृषि परम्परा जैसे डोंगरा/डोहरी श्रम
परंपरा, सरहुल
और करमा
पर्व,
अपतानी कृषि
प्रणाली, मदइत
पांचा आदि
इसी सहभागिता को दर्शाती हैं। निर्मला पुतुल आओ,
मिलकर बचाएँ’
कविता में
लिखती हैं-
“जंगल की
ताजा हवा
/ नदियों की
निर्मलता / पहाड़ों का मौन
/ गीतों की
धुन/ मिट्टी का सोंधापन / फसलों की
लहलहाहट / ... और
इस अविश्वास -भरे दौर
में / थोड़ा-सा
विश्वास / थोड़ी-सी
उम्मीद / थोड़े-से
सपने / आओ
मिलकर बचाएं
/ कि इस
दौर में
भी बचाने
को बहुत
कुछ बचा
है /
अब भी
हमारे पास"9 आदिवासी किसान की
उम्मीद कविता
की जमीन
तैयार करती
है, पर
हकीकत है
कि आदिवासियों
को उनके खेतों और जंगलों से धीरे-धीरे बेदखल करके प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार करने का षड्यंत्र लंबे समय से चल रहा है। सीधे-सादे आदिवासी इन षड्यंत्र को नहीं पहचान पाते हैं। इसलिए महादेव
टोप्पो की कविता
‘जंगल का कवि’
इन षड्यंत्रों की पोल ही नहीं खोलती बल्कि षड्यंत्रकारियों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल भी फूँकती हैं। वह लिखते हैं
- “जंगल की हरियाली को
/ बचाना होगा
/ जंगल का कवि / ढोल पीटेगा
/ बांसुरी बजाएगा
/ कलम धनुष की डोरी पर चढ़ाकर”10 इस
तरह हम
देखते हैं
कि आदिवासी कवियों के
यहां किसानी जीवन के
ढेरों रूप
मौजूद हैं।
एक पंक्ति में परिभाषित करें तो
खेत यहां
स्मृति है,
खेती सांस्कृतिक क्रिया और
फसल भविष्य की ओर
संकेत करती
है।
वहीं ‘दलित किसान’
के लिए
खेती केवल कृषि-क्रिया नहीं, बल्कि
जातिगत अपमान
/ आर्थिक शोषण
का सतत
अनुभव रहा
है। व्यक्ति या वर्ग
के साथ
जाति जुड़ी
होने के
कारण श्रम
(किसानी) किसान
के लिए
कभी सम्मान नहीं बन
पाता। भूमि
का असमान
वितरण व
शोषक वर्ग
(पहले सामंत)
द्वारा अधिशेष मूल्य यानि
उचित श्रम-फल
की चोरी
से शोषणयुक्त और असमानता मूलक समाज
का निर्माण होते चला
गया, जिसका
खामियाजा सबसे
ज्यादा दलित
किसान वर्ग
को भुगतना पड़ा। इसलिए
दलित चेतना
की किसान
कविताओं में
खेत ज्यादातर संघर्ष स्थल
के रूप
में या
अपमान पुनरुत्पादन स्थल के
रूप में
आता है
। जिसे
प्रेमचंद के
घिसु और
माधव जैसे
पात्र नकारते हुए दिखते
है कि
जब श्रम
का मेहनताना भी जहालत
की जिंदगी है, तो
फिर इससे
अच्छा काम
ही क्यों
करें? उदाहरण के रूप
में ओमप्रकाश
वाल्मीकि की
सुप्रसिद्ध
कविता
‘ठाकुर का
कुआं’ की
गहनता को
समझे - “बैल
ठाकुर का
/ हल ठाकुर का
/ हल की मूठ पर हथेली अपनी
/ फ़सल ठाकुर की..../
फिर अपना क्या?
/ गाँव?
/ शहर?
/ देश?”11 हम
देखते हैं जो किसान हल की मूठ थामकर, अपने खून-पसीने से खेत को सींचकर फसल उगाता
है, वह भूखों मरता है। फसल का बड़ा हिस्सा जमींदार (आज
पूंजीपति) के
पास चला जाता है। जो कुछ बचता है,
वह कर्ज चुकता करने में चला जाता है। अगर किसान दलित है तो उसकी
स्थिति
और भी
बदतर
होती है। वह देखते हैं कि ‘हल की मूठ पर हथेली अपनी’ है यानि खेत में श्रम करने वाली,
खून-पसीना बहाने वाली
देह
उनकी
है, इसके अलावा कुछ भी उनका नहीं है। इस समाज में ऐसा प्रतीत होता है कि उनका जन्म दूसरों के लिए काम करने के लिए ही हुआ है।
कुछ इसी
मिज़ाज की
सूरज पाल
चौहान की
कविता ‘मेरा
गाँव’ है,
जिसमें कवि
लिखते है
कि “मेरा
गांव, कैसा
गांव / न
कहीं ठौर,
न कहीं
ठांव...उनके
आंगन गइया,
बछिया / मेरे
आंगन सूअर,
मुर्गियां / मेरा
सिर उनकी
लाठी / बेगारी करने को
गांव..../ उनका
खेत, उन्हीं का बैल
/ और उन्हीं का ट्यूबवैल / मेरे हिस्से मेहनत आई
/ उनके हिस्से है आराम....”12 आज़ादी
के चार
दशक बाद
भी इस
तरह का
अलगावबोध और
मोहभंग की
स्थिति दलित/सीमांत किसान की
दूसरी छवि
सामने लाती
है। इस
तरह के
सवाल अतीत
और वर्तमान दोनों पर
भी प्रश्नचिह्न है? अतीत
इसलिए कि
पहले ज्यादातर आबादी गाँव
में निवास
करती थी।
गाँव सामंती व्यवस्था का
गढ़ था।
इनका अपना
आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक
ढांचा था।
जो कि
जमींदार द्वारा संचालित व प्रचालित था। जहां
न्याय सामंतों के अधीन
था ।
हम जानते
है कि
इस व्यवस्था में दलित/पिछड़ा
वर्ग के
किसानों का
भरपूर शोषण
हुआ। खैर
वर्तमान (आज़ादी
के बाद)
में जो
उन्नति और
विकास की
संभावनाएँ भी
मिली, उसको
सामंती प्रवृत्ति और पूंजीवादी ताकतों ने
ग्रास लिया।
पूंजीवादी कृषि
प्रणाली का
जादू कुछ
ऐसा चला
की एक
तबका लुप्त
होते चला
गया या
यूं कहें
कि किसान
से मजदूर
बनते चला
गया। आयरिश
लेखक जॉन
हॅालोवे अपनी
पुस्तक चीख़
(अनु. लालबहादुर वर्मा) में
कहते हैं
कि “पूंजीवाद में उत्पादन केवल वस्तु
का उत्पादन नहीं होता,
वह एक
ऐसी वस्तु
का उत्पादन होता है
जो उत्पादक के लिए
पराई हो
जाती है,
अपने उत्पादन से परायापन मजदूर के
श्रम को
भी वस्तु
बना देता
है.... परायाकृत श्रम मनुष्य को उसकी
मानव प्रकृति से ही
पराया कर
देता है,
जो मनुष्य और उसके
काम के
बीच घटता
है, वही
मानव- मानव
के बीच
संबंधों में
भी होता
है, एक
आदमी दूसरे
के लिए
अजनबी हो
जाता है,
मनुष्य की
सारभूत प्रकृति ही खो
जाती है”13 उपरोक्त कविताओं के अंदर
जो अलगावबोध दिखता है,
उसके पीछे
का कारण
यही परायाकृत श्रम है,
जो अतीत
और वर्तमान दोनों जगह
अपने अलग-अलग
रूपों में
विद्यमान है।
आज धीरे-धीरे
छोटे/मध्यम
जोत की
खेती पर
कॉर्पोरेट का
कब्ज़ा बढ़ता
जा रहा
है। कवि
महेंद्र सिंह
बेनीवाल अपनी
कविता ‘किसान’में
लिखते हैं कि “खेत
में सांड़
के पैर
रखते ही
/ फसलें ऐसे
सहम जाती
हैं / सहमी
हुई हो
जैसे कोई
लड़की / जो जबरन
उठाकर लाई
गई हो
खेत में
/ किसान करने
लगता है
चीत्कार / एक
पिता की
तरह / उसके
ही सम्मुख जैसे / किया
जा रहा
हो उसकी
बेटी पर
अत्याचार” 14 यहां
व्यथा ऐसी
की वर्तमान अपनी आदिम
घाव के
साथ उपस्थित है, जहां
फसल (बेटी)
की आज
सांडरूपी कॉर्पोरेट इज्जत उतार
रहा है,
वहीं पहले
सामंत लोग
किया करते
थे जो
(पारिभाषिक) किसान
ही थे। प्रेमचंद के
पात्र को
ही देखें
एक तरफ
रायसाहब, पंडित
दातादीन, दूसरी
तरफ होरी,
धनिया, जोखू
है। दोनों
किसान है,
पर दोनों
की स्थितियों में जमीन-आसमान
का अंतर
है। रज़त
रानी मीनू
की कविता
‘किसान’ इसके
पीछे के
कारणों की
पड़ताल करती
है। वह
लिखती है
कि “मेरे
आंखों के
कैमरे में
/ घूमती है
कई तस्वीरें / प्रेमचन्द के
जोखू,
होरी,
धनिया किसान
की / दूसरी
तस्वीर घूमती
है / किसान
राय साहब, ठाकुर साहब
/ और पंडित
जी की
/ एक श्रमिक किसानों की
/ दूसरी जमींदार किसानों की
/ एक अन्नदाता है / दूसरी
कर्जदाता है
/ एक धरती
फाड़ उगाता
है / अन्न
जमीन से
अपने खून
पसीने से
मगर / डूबा
रहता है
वह कर्ज
में..../ यह
भाईचारा कैसा?
/ जाति की
दीवार / पहाड़
सी क्यों
है? / होरी
क्यों नहीं
/ जी पाता
स्वाभिमान से, अभिमान से?....”15 यहाँ रायसाहब जैसे लोग
वक्त-दर-वक्त
खुद को
अलग-अलग
साँचे में
ढाल लेते
है, आज
बहरूपिया पूंजीपति बनकर बैठे
है। विडंबना है कि
सब किसान
है। आगे
रजत रानी
मीनू सवाल
करती है
कि “किसान
के बच्चे
दलित रसोइया का / बना
खाना खाने
से मना
कर देते
हैं / आखिर
क्या शिक्षा दे रहे
हैं / किसान
अपने बच्चों को? / मजदूर
दलित किसान
परेशान हैं
/ सवर्ण दबंगई से / गांव
से पलायन
जारी है
/ रोटी की
तलाश में
/ तो कभी
जमींदार के
जुल्म जबरदस्ती से / घर, जमीन छोड़ना दुखद और
पीड़ादायक है
/ परन्तु / मजबूर
था जोखू
भी / आज
का किसान
भी मजबूर
है / मजदूर
भी है
....”16 पूंजीवादी व्यवस्था की लूट
ने सारे
आदिम प्रभुत्व जैसे जाति,
धर्म, नस्ल,
लैंगिक भेदभाव आदि को
विभिन्न रूपों
में जिंदा
रखा है,
ताकि उनकी
सत्ता बनी
रहे। यह
कविता इसी
दोहरी मानसिकता को उजागर
करती है।
जहां किसानों के बीच
वर्ग के
साथ जातिभेद भी है,
बेहतर जीवन
की तलाश
में पलायन
है पर
अंततः जीवन
नारकीय है।
इसी तरह
बढ़ते धर्मान्धनुकरण (शोषण कर्मफल है) की
उपस्थिति में
विहाग वैभव
अपनी कविता
‘ईश्वर को
किसान होना
चाहिए’ में ईश्वर की
सत्ता को
प्रश्नांकित करते
हुए ईश्वर
को किसान
होने की
सिफ़ारिश करते
हुए लिखते
है - “ईश्वर
सेनानायक की
तरह आया
/ न्यायाधीश की
तरह आया
/ राजा की
तरह आया....
/और भी
कई-कई
तरह से
आया ईश्वर
/ पर जब
इस समय
की फसल
में किसान
होने की
चुनौतियाँ / मामा घास
और करेम
की तरह
ऐसे फैल
गई है
कि / उनकी
जिजीविषा को
जकड़ रही
है चहुँ
ओर / और
उनका जीवित
रह जाना
एक बहादुर सफलता की
तरह है
/ तो ऐसे
में ईश्वर
को किसान
होकर आना
चाहिए (मुझे
लगता है
ईश्वर किसान
होने से
डरता है)”17 इस
व्यवस्था में
जहां किसान
के लिए
जीवित रहना
ही उपलब्धि है क्योंकि किसान चारों
ओर से
घिरा हुआ
है (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक), ऐसे में
कवि ईश्वर
को किसान
के रूप
में अवतार
लेने के
अपील करता
है, क्योंकि किसान होने
का दुख-दर्द, श्रम और
संघर्ष
सिर्फ किसान
ही समझ
सकता है,
ठीक इसी
प्रकार किसानों में दलित
होने को
भी। दलित
चेतना की
किसान कविताओं जिसे ‘दलित
किसान कविता’
कहना चाहिए,
इनमें किसान
की सच्चाइयां (ओझल/छिपी)
हैं, जिसमें रोमानी दृष्टि से इतर
किसान की
वास्तविक छवि
यहाँ कविताओं में उभरती
है, यहाँ
दलित किसानों के अनुभव, जातिगत उत्पीड़न और सामाजिक बहिष्कार केंद्र में होती
है।
निष्कर्ष :
स्वातंत्र्योत्तर भारत
में किसान
कविताओं की
एक लम्बी
श्रृंखला है,
जिसमें किसान
के भिन्न-भिन्न
अनुभव, संघर्ष और स्वप्न हैं
और
इसके बिल्कुल विपरीत नग्न
यथार्थ भी
है। जिसमें छटपटाता किसान
है। किसानी को आज
उत्पादन-उपभोग-वितरण
के चक्रीय प्रणाली के
रूप में
समझा जा
सकता है,
जिसमें कमजोर
वर्ग के
किसान के
लिए कोई
जगह नहीं
है। मुख्यतः इसमें आदिवासी और दलित
किसान वर्ग
आते है।
दोनों के
किसानी अनुभवों में समानता होते हुए
भी पर्याप्त असमानता है।
इसलिए किसान
कविताओं में
भी संवेदनात्मक भिन्नता देखने
को मिलती
है। जैसा
कि उपरोक्त कविताओं से
स्पष्ट करने
का प्रयास किया गया
है। आदिवासी किसान के
लिए जहाँ
किसानी, जीवन
के साथ
नाभिनालबद्ध है,
वहीं दलित
किसानों के
लिए किसानी, शोषण/अपमान
का सतत्
अनुभव है।
हम देखते
हैं कि
कालांतर में
ज्यादातर किसानों का
सामाजिक-आर्थिक रूपांतरण उसे
स्वायत्त कृषक
से आश्रित मज़दूर की
स्थिति की
ओर ले
गया या उनके समक्ष आत्महत्या का
दूसरा विकल्प ही बचा।
जिसपे विस्तार से बात
करने की
जरूरत है।
संदर्भ :
5. सं. मृत्युंजय कोईरी, (2020), किसानी कविताएँ, ग्रेटर नोएडा, दिशा इंटरनेशनल पब्लिशिंग हाउस, पहला संस्करण, पृ. 168
10. रमणिका गुप्ता (2023), आदिवासी स्वर और नई शताब्दी, नई दिल्ली, वाणी प्रकाशन, दूसरा संस्करण, पृ. 48
12. राम चंद्र एवं प्रवीन कुमार (सं.),(2014), दलित चेतना की कविताएं, नई दिल्ली, स्वराज प्रकाशन, पहला संस्करण, पेज न.131
17. वही पृ. 246

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