- गुरदीप एवं अरविन्द सिंह तेजावत
शोध
सार
: लीलाधर मंडलोई
समकालीन
हिंदी
कविता
के
प्रमुख
हस्ताक्षर
हैं।
उनकी
कविताएँ
वर्तमान
समय
के
यथार्थ
को
नग्न
रूप
में
प्रस्तुत
करती
हैं।
मंडलोई
जी
न
केवल
कवि
हैं
अपितु
गद्य
और
चित्रकला
में
भी
उन्होंने
अपनी
अमिट
छाप
छोड़ी
है।
इनकी
कविताएँ
हर
उस
वर्ग
का
प्रतिनिधित्व
करती
हैं
जिन्हें
समय
ने
नकार
दिया
है।
सतपुड़ा
के
जंगलों
और
कोयला
खदानों
में
पले-बढ़े
मंडलोई
ने
मजदूरों
की
दयनीय
दशा
को
जितना
करीब
से
देखा
है
उतना
कोई
दूसरा
कवि
नहीं
देख
पाया
है
जिसके
कारण
उनकी
कविताओं
में
बार-बार
शोषित
वर्ग
की
अनुगूंज
सुनाई
देती
है।
उन्होंने
न
सिर्फ
उस
वर्ग
की
समस्याओं
को
हमारे
समक्ष
प्रस्तुत
किया
है
अपितु
संपूर्ण
पूंजीवादी
व्यवस्था
को
समाज
के
समक्ष
नग्न
कर
दिया
है।
बीज
शब्द
: समकालीन
कविता,
आदिवासी,
दलित,
स्त्री,
विद्रोह,
पूंजीवाद,
यथार्थ,
शोषण।
मूल
आलेख
: समकालीन हिंदी कविता
का
क्षेत्र
विपुल
है।
समकालीन
हिंदी
कविता
एक
ऐसी
विशाल
धरा
है
जिसपर
विभिन्न
कवियों
ने
मनुष्यता
रूपी
पेड़
को
सींचा
है।
इसकी
जड़ें
60 के
दशक
तक
जोड़कर
देखी
जाती
हैं, वहीं कुछ कवि
इसका
आरंभ
सन्
92-93 से
मानते
हैं।
हिंदी
साहित्य
के
आधुनिक
काल
में
समकालीन
हिंदी
कविता
ही
वह
धारा
है
जो
सबसे
अधिक
समय
तक
बहती
रही
है
और
निरंतर
बह
रही
है।
एक
समय
पर
अकविता,
ठोस
कविता,
बीट
कविता
आदि
के
नामों
से
इसे
विभाजित
करने
का
प्रयास
किया
गया
लेकिन
मजबूत
पृष्ठभूमि
न
होने
के
कारण
वे
नाम
अधिक
दिनों
तक
नहीं
टिक
सके
और
अंतत:
साठोत्तरी
कविता
या
समकालीन
हिंदी
कविता
के
नाम
से
ही
इसे
जाना
गया।
समकालीन
हिंदी
कविता
विस्तृत
स्थली
लिए
हुए
आमजन
मानस
के
सामाजिक
और
राजनीतिक
यथार्थ
की
कविता
है।
इस
कविता
ने
हमें
उन
कवियों
से
परिचित
करवाया
जिनका
इतिहास
में
कोई
परिचय
ही
नहीं
था
या
जिन्हें
अभिव्यक्ति
के
लिए
योग्य
समझा
ही
नहीं
गया।
लीलाधर
मंडलोई
उन्हीं
कवियों
में
से
एक
हैं।
लीलाधर
मंडलोई
समकालीन
हिंदी
कविता
के
प्रमुख
कवियों
में
से
एक
हैं।
देश
की
स्वतंत्रता
के
पश्चात
जब
समाज
अभावों
से
जूझ
रहा
था
जिसका
सामना
लीलाधर
मंडलोई
के
परिवार
को
भी
करना
पड़ा।
इनका
प्रारंभिक
जीवन
अनेकों
अभावों
से
गुजरा।
उसी
संघर्ष
की
झलक
इनकी
कविताओं
में
भी
देखने
को
मिलती
है।
इनकी
कविताओं
में
ऐसा
जादू
है
जो
हमें
अपनी
गिरफ्त
में
ले
लेता
है
और
ऐसा
प्रतीत
होता
है
जैसे
समकालीन
हिंदी
कविता
में
कुछ
नई
इबारतें
जुड़
रही
हैं।
यह
आकस्मिक
नहीं
है
बल्कि
उसी
संघर्ष
का
परिणाम
है
जो
उन्होंने
अपने
जीवन
में
किया।
मंडलोई
जी
का
गाँव
कोयला
खदानों
बीच
था
जिसके
कारण
उनका
बचपन
खदानों
से
उठती
गंध
में
ही
बीता।
खदानों
की
त्रासदियाँ
इनकी
कविताओं
में
नग्न
यथार्थ
के
रूप
में
आई
हैं।
इनकी
‘स्त्री
का
कंकाल’
कविता
को
देखिए
-
खुदाई
में
न
माया
मिली
न
राम
मिला
स्त्री
का
कंकाल
राम
के
ज़माने
का
जिसका
कोई
ज़िक्र
नहीं
रपट
में1
उनकी
कविताएँ
हमारी
सामाजिक
एवं
राजनीतिक
व्यवस्था
पर
गहरा
आघात
करते
हुए
हमें
वर्तमान
यथार्थ
से
परिचित
करवाती
हैं। इसमें दोराय नहीं
है
कि
खदानों
में
काम
करने
वाले
मजदूरों
की
स्थिति
किसी
नर्क
से
कम
नहीं
है।
पूंजीवाद
का
भयभीत
कर
देने
वाला
रूप
वहां
पर
हमें
दिखलाई
पड़ता
है।
जहाँ
एक
तरफ
पूंजीवाद
ने
जाति
व्यवस्था
पर
चोट
की
है
वहीं
समाज
में
वर्गीय
खाई
को
गहरा
भी
किया
है।
हमारे
समाज
की
करुण
पुकार
और
धर्म,
जाति,
लिंग
पर
हो
रहे
भेदभाव
को
उन्होंने
चिन्हित
किया
है।
इनकी
कविता
में
जो
यथार्थ
है
वह
हमारे
देश
के
आधे
भू-भाग
का
यथार्थ
है
और
जिस
यथार्थ
को
कहने
में
खतरा
हो
उस
खतरे
को
मंडलोई
जी
अपने
ऊपर
उठाते
हुए
जरा
भी
भयभीत
नहीं
हैं।
यहाँ
पर
उनके
नागरिक
के
संवैधानिक
अधिकारों,
नैतिक
साहस
और
समाजिक
न्याय
के
प्रति
उनकी
प्रतिबद्धता
को
देखा
जा
सकता
है।
वे
लिखते
हैं
मैं
रंग,
लिंग,
धर्म
या
नस्ल
के
आधार
पर
बढ़
रही,
ज्यादती
के
खिलाफ
सड़क
पे
जा
सकता
हूँ....2
हमारे
समाज
में
व्याप्त
रंगभेद,
लिंगभेद
को
कवि
नकारता
है
और
इसके
बरक्स
वे
‘सड़क
पे
जा
सकता
हूँ’
जैसे
मजबूत
मुहावरे
का
प्रयोग
करते
हैं
जो
उनकी
सक्रिय
भागीदारी
को
दर्शाता
है।
यह
कार्य
एक
कवि
हृदय
ही
कर
सकता
है
जिसने
वैश्विक
मानवीय
संवदेना
को
अपने
में
समाहित
किया
हो।
मंडलोई
की
सवंदेना
किसी
विशिष्ट
या
संभ्रांत
वर्ग
तक
सीमित
नहीं
है,
बल्कि
वह
समाज
के
सबसे
निचले
पायदान
पर
खड़े
व्यक्ति
यानी
मजदूर,
किसान,
आदिवासी
की
संवेदना
से
जुड़ती
है।
उन्होंने
समाज
को
जागृत
करने
का
जिम्मा
अपने
सिर
लिया
है
और
समाज
को
जागृत
करने
के
लिए
उन्हें
जो
खतरा
उठाना
पड़
जाए,
उसके
लिए
वे
स्वयं
को
प्रस्तुत
करने
में
हिचकते
नहीं
हैं
बल्कि
निडर
होकर
आगे
बढ़ते
हैं।
उनका
मानना
है
कि
शायद
इनके
खतरे
उठाने
से
ही
समाज
के
कुंठित/जड़
हो
चुके
मस्तिष्क
पर
जमी
धूल
हट
जाए।
वे
लिखते
हैं
मुमकिन
है
टूट
पड़े
कानून
का
कहर
कम-से-कम
मैं
एक
ऐसा
समाचार
तो
बन
ही
सकता
हूँ
कि
बंद
पलकों
में
एक
सही
हरकत
दर्ज
हो
बंद
कपाटों
में
ऐसी
हलचल
कि
सोचना
शुरु
हो।3
मंडलोई
जी
खुद
को
उन
लोगों
में
शुमार
नहीं
करते
हैं
जो
लोग
विपरित
परिस्थितियों
या
फासीवाद
के
जमाने
में
भी
जानबूझ
कर
चुप
हैं।
बल्कि
उन्होंने
अपने
स्वर
को
बुलंद
करने
के
लिए
अपनी
कविताओं
को
आँचलिक
शब्दों
से
भी
समृद्ध
किया
है।
अगर
हम
इनके
रचनात्मक
विकास
पर
नजर
डालें
तो
हम
पाएंगे
कि
उनके
संवेदनावृत्त
में
नए-नए
शब्द
जुड़ते
चलते
हैं।
जानकीप्रसाद
शर्मा
लिखते
हैं
कि
“मंडलोई
के
कवि-स्वभाव
की
निर्मिति
में
स्थानिकता
का
गहरा
दख्ल
है।
इसे
महज
अपने
अंचल
से
भावनात्मक
लगाव
के
रूप
में
नहीं,
एक
वैचारिक
रुख
(आइडियोलॉजिकल
पोजीशन)
के
रूप
में
समझना
चाहिए।”4
कहीं
न
कहीं
जानकीप्रसाद
शर्मा
की
इस
बात
में
सहमत
हूँ
क्योंकि
मंडलोई
जी
से
हुई
एक
मुलाकात
में
उन्होंने
इस
बात
को
स्वीकारा
था
कि
उनके
शब्द
संसार
की
निर्मिति
उनकी
विचारधारा
से
होती
है।
नि:संदेह
कोई
किसी
भी
प्रगतिशील
कवि
की
कविताओं
में
यथार्थ,
पूंजीवाद,
शोषण
आदि
शब्द
स्वाभाविक
ही
आ
जाते
हैं
और
मंडलोई
जी
का
तो
बचपन
ही
उस
क्षेत्र
में
बीता
जहाँ
चारों
ओर
पूंजीपतियों
और
जमींदारों
का
शोषण
व्याप्त
था।
यही
कारण
है
कि
मंडलोई
जी
की
कविताओं
में
आदिवासी,
स्त्री,
दलित
सभी
की
अनुगूंज
बराबर
दिखलाई
पड़ती
है।
वे
लिखते
हैं
चूड़ियों
से
झरता
है
अनोखा
संगीत
और
खड़ी
हो
जाती
है
गगनचुंबी
इमारतें....
इन
श्रमशील
हाथों
में
जादू
है
कोई
सरकार
जब
इन
हाथों
में
थमा
देती
हथियार
उजड़
जाते
हैं
घर, स्कूल और,
इमारतें
ढहने
लगती
हैं
धूल
की
मानिंद
वह
सरकार, तब सरकार
नहीं,
बन
जाती
है
हत्यारी।5
नि:संदेह
मंडलोई
मजदूरों
की
शक्ति
से
परिचित
हैं।
इन
पक्तियों
के
माध्यम
से
कवि
ने
श्रम,
सृजन,
सत्ता
और
विनाश
के
बीच
के
गहरे
अंतर्विरोध
को
बेहद
सादगी
और
मारक
क्षमता
के
साथ
रेखांकित
किया
है।
एक
तरह
जहाँ
मजदूर
विश्व
निर्माता
होते
हैं
वहीं
जब
कोई
सरकार
उनको
सांप्रदायिकता
की
आग
में
झोंक
देती
है
तब
वही
हजारों
हाथ
क्षण
भर
में
ही
निर्माण
को
विनाश
में
परिवर्तित
कर
देते
हैं।
सांप्रदायिकता
हमारे
देश
की
बड़ी
समस्याओं
में
से
एक
है
जिसे
आधार
बना
कर
ही
हत्यारे
लोग
सत्ता
में
आते
हैं।
इससे
खतरनाक
स्वप्न
क्या
हो
सकता
है
कि
देश
के
कुख्यात
हत्यारे
हमारे
भविष्य
निर्माता
बनकर
सिंहासन
पर
बैठ
जाते
हैं।
सांप्रदायिकता
मनुष्य
को
अंधा
बना
देती
है।
सांप्रदायिकता
के
इसी
स्वरूप
को
मंडलोई
ने
अपनी
कविता
में
उकेरा
है,
उनकी
‘खतरनाक’
शीर्षक
कविता
देखिए
मैं
जिनके
साथ
पचास
सालों
से
हूँ
यह
क्या
हुआ
एकाएक
कि
उनका
प्यार
घृणा
में
बदल
गया
और
उनका
धर्म-युद्ध
में......
उनकी
आँखों
में
हिक़ारत
का
भाव
गहरा
हो
गया
उनकी
पूजा
में
फिर
से
मनुष्य
की
बलि
शामिल
हो
गई
कोई
नहीं
जान
पाएगा
कि
यह
होना
कितना
ख़तरनाक
हो
गया।6
उनका
‘जलावतन’
काव्य-संग्रह
तो
विस्थापन
और
निर्वासन
की
पीड़ा
पर
ही
केंद्रीत
है।
जब
मनुष्य
मनुष्य
के
दुख
को
बांटने
के
लिए
उपस्थित
नहीं
होता,
ऐसे
में
प्रकृति
मनुष्य
के
दुख
व
ऐकाकीपन
को
बांटती
है।
इस
संग्रह
की
कविताएं
जहाँ
अत्यंत
मार्मिक
जान
पड़ती
हैं,
वहीं
ये
कविताएं
मनुष्य
में
ऊर्जा
भरने
का
काम
भी
करती
हैं।
मनुष्य
के
लिए
उसका
घर
उसका
गाँव
ही
संपूर्ण
विश्व
होता
है,
वह
नहीं
जानता
कि
कौन-सी
सीमा
पर
किन
देशों
का
विवाद
है
या
कौन
की
स्ट्रेट
से
किन
देशों
के
जहाजों
की
अनुमति
नहीं।
एक
साधारण
मनुष्य
को
लिए
उसका
परिवार,
उसका
गाँव,
उसकी
मिट्टी
और
खुला
आसमान
किसी
विश्व
से
अधिक
होता
है।
इसीलिए
विस्थापन
को
मनुष्य
जीवन
के
बड़े
दुखों
में
आंका
गया
है।
जहाँ
निर्वासन
से
सपने
टूटते
हैं
वहीं
निर्वासन
से
नए
सपनों
का
निर्माण
मंडलोई
ने
अपनी
कविताओं
में
करवाया
है।
यह
कवितांश
देखिए
सपनों
से
बाहर
निकलकर
वे
देखते
हैं
उनके
उठे
हुए
हाथ
सपनों
में।7
सपनों
से
बाहर
निकलकर
सपने
देखना
फैंटेसी
का
ही
एक
रूप
है,
लेकिन
मंडलोई
द्वारा
निर्मित
इस
फैंटेसी
की
जड़ें
अस्तित्व
की
लड़ाई
से
जुड़ी
हैं।
जहाँ
ये
उठे
हुए
हाथ
मनुष्य
के
अमिट
प्रतिरोध
को
रेखांकित
करते
हैं।
जानकीप्रसाद
शर्मा
लिखते
हैं
कि
“दुनिया
के
विभिन्न
हिस्सों
में
जारी
विस्थापन
की
प्रक्रिया
चेतना
के
स्तर
पर
उनकी
बेदारी
का
सबूत
है।
पीड़ित
मानवता
के
दुखते-कसकते
अनुभवों
से
संवेदित
होकर
उन्होंने
इस
प्रक्रिया
को
अपना
रचना-अनुभव
बनाया
है।”8
मंडलोई
जी
का
जीवन
सतपुड़ा
के
जंगलों
में
ही
बीता
और
वहां
के
विस्थापित
खदान
मजदूरों
का
जीवन
उन्होंने
करीब
से
देखा
है।
जहाँ
उन्होंने
आम
लोगों
की
पीड़ा
को
अपना
स्वर
बनाया
वहीं
अपनी
कविता
को
लयात्मक
स्वर
भी
प्रदान
किया।
उनकी
कविताओं
को
हम
ऊर्दू
नज्म
की
तरह
भी
पढ़
सकते
हैं।
एक
तरफ
उनकी
कविताओं
में
आंचलिक
शब्दों
की
भरमार
है
वहीं
ऊर्दू
से
भी
उन्होंने
परहेज
नही
किया
है।
इसी
संदर्भ
में
भाषाई
सांप्रदायिका
की
तरफ
ध्यान
दिलाती
उनकी
‘नुक्ता’
शीर्षक
कविता
को
देखिए
मेरी
भाषा
में
नुक्ता
नहीं
लिखता
हूँ
जब
बार-बार
आते
हैं
नुक्ते
वाले
शब्द
मैं
नहीं
रहा
उनकी
सूची
में,
मैं
हिंदू
नहीं
हूँ।9
एक
कवि
एक
समय
में
एक
से
अधिक
जीवन
जीता
है।
एक
उसका
स्वयं
का
और
दूसरा
उस
पीड़ित
और
शोषित
मनुष्य
का
जो
अपनी
अभिव्यक्ति
करने
में
सक्षम
नहीं
है।
ओम
निश्चल
लिखते
हैं
कि
“मंडलोई
की
कविता
में
एक
साथ
अनेक
रंग
देखे
जा
सकते
हैं।
वे
किसानों
की
आत्महत्याओं
पर
गौर
फरमाते
हैं
तो
दूसरी
ओर
आस-पास
की
दुनिया
पर
गहरी
नज़र
डालते
हुए
कठिनाइयों
और
शिद्दत
के
साथ
जिये
जा
रहे
जीवन
के
एक-एक
क़तरे
को
वे
अपनी
कविता
के
प्रशस्त
अंतःकरण
में
भर
लेना
चाहते
हैं।”10
नि:संदेह
हर
शोषित
मनुष्य
की
पीड़ा
को
वे
स्वयं
की
पीड़ा
मानते
हुए
उसे
अपनी
कविता
के
माध्यम
से
प्रस्तुत
करते
हैं।
उनकी
‘बारह’
शीर्षक
कविता
को
देखिए
मैं
अकेला
हूँ
उदास
और
तन्हा
ये
सदा
किसकी
है
अपना
सा
यहाँ
कोई
तो
है.....11
मानव
मात्र
के
संकट
को
कवि
किस
रूप
में
देखता
है
यह
कविता
उसका
उदाहरण
है।
कवि
की
जीवन
व्यक्तिगत
न
होकर
सामाजिक
होता
है।
इसलिए
वह
समाज
में
रहकर
समाज
के
संकट
को
समझकर
अपनी
कविता
में
उसे
स्वर
प्रदान
करता
है।
मनुष्य
की
पीड़ा
को
कवि
अपनी
पीड़ा
समझते
हुए
दूसरों
से
अपनी
तुलना
करने
से
भी
नहीं
चूकता
है।
जंगलों
से
महानगर
तक
का
सफर
उनके
इसी
वैचारिक
विकास
का
प्रतीक
है।
प्रतीत
होता
है
कि
आम
मनुष्य
की
पीड़ा
मंडलोई
जी
से
जुड़ी
है,
इसी
मानवीय
पीड़ा
को
उनकी
कोरोना
काल
की
कविताओं
में
देखा
जा
सकता
है।
उनकी
‘छप्पन’
शीर्षक
कविता
को
इस
संदर्भ
में
देखा
जा
सकता
है
एक
मुट्ठी
राख
वतन
की
लिये
चलते
हैं
हम
रास्ता
है,
और
पांव
और
हम,
और
मंज़िल
दूर
है,
दूर
सही.....12
कोरोना
महामारी
ने
गावों
को
तो
प्रभावित
किया
ही
लेकिन
महानगरों
की
जो
हालत
हुई
वह
किसी
से
छुपी
नहीं
है।
हजारों-हजारों
मजदूरों
का
विस्थापन
और
विस्थापन
के
दौरान
हो
रही
मौतें
देखकर
सभी
का
हृदय
सिहर
गया।
जिन
मजदूरों
को
रोटी
कमाने
से
फुर्सत
नहीं
थी
उसी
अकाल
में
उन्होंने
अपने
पैरों
से
पृथ्वी
को
नाप
दिया।
इस
त्रासदी
में
ही
हम
सत्ता
का
वह
भयानक
रूप
भी
देख
पाए
जब
आम
लोग
सड़कों
पर
मर
रहे
थे
और
नेता
लोग
शीशमहलों
में
बैठ
आदेश
दे
रहे
थे।
इस
त्रासदी
ने
मंडलोई
को
बहुत
गहरे
तक
प्रभावित
किया।
उन्होंने
दिल्ली
में
रहते
हुए
दिल्ली
और
पूरे
देश
का
हाल
देखा
जिसे
उन्होंने
अपनी
कविता
में
भी
स्थान
दिया।
उनकी
‘सत्तावन’
शीर्षक
कविता
देखिए
सड़क
पर
पैदा
हुआ
दूसरे
दिन
से
सफ़र
पर
निकल
पड़ा
उसी
दिन
दिल्ली
की
नींद
में
हादसा
हुआ
दिल्ली
सो
नहीं
पा
रही
! 13
मंडलोई
ने
अपनी
कविता
के
माध्यम
से
भारतीय
लोकतांत्रिक
व्यवस्था
का
पर्दाफाश
किया
है।
कोरोना
वह
समय
था
जब
हमें
यह
एहसास
हो
चुका
था
कि
विश्वगुरु
का
नारा
देने
वाले
हम
अब
तक
गांवगुरु
भी
नहीं
बन
सके
हैं।
सड़कों
अस्पतालों
में
पड़ी
लाशें
इस
बात
की
गवाही
दे
रही
थीं
कि
हमारी
सरकारें
आम
जनता
के
प्रति
कितनी
जिम्मेदार
है।
हजारों
लोग
भूख,
प्यास
और
बिमारी
से
मर
गए
लेकिन
उन्हें
न
समय
पर
खाना
मिला
न
ईलाज।
उसी
स्थिति
को
मंडलोई
ने
पहचाना
और
अपनी
यथार्थवादी
दृष्टि
से
उसे
अपनी
कविता
में
व्यक्त
किया।
उनकी
‘पैंसठ’
कविता
देख
सकते
हैं
रोशनियाँ
कब
की
बुझ
चुकीं
अस्पतालों
में
कुछ
चराग़
बचे
हैं,
कुछ
लोग
हैं
और
आख़िरी
सांसों
का,
हाहाकार
है
यहाँ.....14
यह
पंक्तियां
आधुनिक
स्वास्थ्य
व्यवस्था
की
लाचारी,
संवेदनहीनता
और
संकट
काल
(महामारी)
में
आम
आदमी
की
बेबसी
को
रेखांकित
करती
है।
यहाँ
अस्पताल
सिर्फ
एक
इमारत
नहीं
है
बल्कि
उस
समूची
व्यवस्था
का
प्रतीक
है
जिसे
अंधेरे
जीवन
में
रोशनी
लाने
का
दायित्व
सौंपा
गया
था
लेकिन
वह
खुद
अंधेरे
में
डूबी
हुई
है।
मंडलोई
की
कविताएं
समकालीन
यथार्थ
को
समाहित
करते
हुए
आगे
बढ़ती
हैं।
एक
तरफ
जहाँ
उनकी
कविताएँ
लयात्मकता
लिए
प्रस्तुत
होती
हैं
वहीं
एक
तरफ
कुछ
कविताओं
का
तेवर
गद्य
को
अपने
में
समाहित
किए
हुए
मिलता
है।
कविता
में
कथा-तत्व
का
समावेश
मंडलोई
की
कला
का
उदाहरण
मात्र
है।
उन्होंने
गाँव,
नगर,
महानगर
और
जंगलों
के
दुखों
को
समेटने
का
प्रयास
किया
है।
मनुष्य
के
साथ-सात
प्रकृति
के
हत्यारों
जैसे
पूंजीपति
और
जमींदारों
पर
भी
मंडलोई
की
दृष्टि
निरंतर
रही
है।
वे
लिखते
हैं
जिधर
भी
घूमता
है
वो
पेड़
सलामी
में
गिरने
लगते
हैं
धड़ाधड़
और
हिरन
के
मांस
की
गंध
उसकी
हवेली
को
लेती
है
घेर।15
लीलाधर
मंडलोई
सिर्फ
एक
तबके
के
कवि
न
होकर
पूरी
मनुष्यता
को
साथ
लेकर
चलते
हैं
जो
उनके
कविकर्म
को
सार्थक
बनाता
है।
उनकी
यह
कविता
पूंजीवाद,
सामंतवाद
और
सत्ता
के
क्रूर
चेहरे
को
बेनकाब
करती
है।
कवि
किसी
व्यक्ति
विशेष
पर
बात
न
करके
उस
सामंतवादी
व्यवस्था
पर
प्रहार
करता
है
जो
अपनी
सुख-सुविधाओं
और
अहंकार
की
पूर्ति
के
लिए
पर्यावरण,
प्रकृति
और
मासूम
जीवन
की
बलि
देने
में
जरा
ही
हिचक
महसूस
नहीं
करता
है।
कविता
में
‘वो’
शब्द
किसी
व्यक्ति
के
लिए
प्रयुक्त
न
होकर
उस
व्यवस्था
के
लिए
प्रयुक्त
हुआ
है
जिसके
स्वभाव
में
शोषण
निहित
है।
उसका
घूमना
कोई
सामान्य
घूमना
न
होकर
विनाश
का
प्रतीक
है।
उसी
विनाशकारी
शक्ति
के
प्रति
मंडलोई
ने
विद्रोह
का
रास्ता
चुना
है।
लीलाधर
मंडलोई
ने
अपना
अधिकतर
समय
आदिवासियों
के
बीच
व्यतीत
किया
है,
जिसके
कारण
जंगलों
की
जीवन
शैली,
वहाँ
के
संघर्ष
और
आदिवासियों
की
जिजीविषा
इनके
काव्य
में
स्वाभाविक
ही
आ
जाती
है।
‘फूल
नहीं
अकाल’
उनकी
इसी
संवेदनात्मक
अभिव्यक्ति
का
उदाहरण
है।
वे
लिखते
हैं
बाँस
पर
फूल
खिले
फूल
नहीं
अकाल।16
यह
दो
पंक्तियों
की
ही
कविता
है।
दिखने
में
ये
दो
पंक्तियां
बहुत
ही
सरल
और
संक्षिप्त
जान
पड़ती
हैं,
लेकिन
अपने
अर्थ
विस्तार
में
ये
बेहद
सूक्ष्म,
गहरी,
भयावह
और
सामाजिक-प्राकृतिक
विडम्बना
को
रेखांकित
करती
हैं।
पारिस्थितिकी
और
लोक
अनुभवों
में
यह
बात
गहरे
से
पैठी
हुई
है
कि
बाँस
का
फूलना
किसी
उत्सव
या
खुशी
का
संकेत
नहीं
है।
अपने
पूरे
जीवनकाल
में
बाँस
एक
बार
ही
फूल
देता
है।
यह
प्रक्रिया
देखने
में
सुखद
हो
सकती
है
लेकिन
फूल
देने
के
बाद
बाँस
के
जंगल
का
जंगल
सूखकर
नष्ट
हो
जाता
है।
बौरा
जाना
बाँस
के
विनाश
का
प्रतीक
होता
है।
वहीं
आदिवासी
लोकजीवन
में
बाँस
का
फूलना
भूखमरी
और
अकाल
का
सूचक
माना
जाता
है।
जिस
दौरान
बाँस
पर
फूल
और
बीज
का
आगमन
होता
है,
इन्हीं
फूलों
और
बीजों
के
कारण
आसपास
के
क्षेत्र
में
चूहों
की
आबादी
अप्रत्याशित
रूप
से
बढ़
जाती
है
और
ये
चूहे
आदिवासियों
के
पूरे
अनाज
भंडार
और
पारिस्थितिकी
तंत्र
को
बर्बाद
कर
देते
हैं।
जिसका
खामियाजा
पूरे
आदिवासी
समुदाय
को
भुगतना
पड़ता
है।
दूसरी
पंक्ति
में
फूल
शब्द
को
खुशहाली
का
पर्याय
न
मानकर
विनाश
का
पर्याय
माना
है।
इन
गहरी
संवेदनात्मक
पंक्तियों
की
निर्मित्ति
में
मंडलोई
की
आदिवासी
संवेदना
परिलक्षित
होती
है।
कवि
सत्ता
की
असंवेदनशीलता
का
विरोध
अपनी
मानवीय
संवेदनशीलता
से
करता
है।
मनुष्य,
जीवन
और
प्रकृति
ही
इनकी
संवेदना
के
केंद्र
में
है।
इनकी
यह
कविता
देखिए
तमाम
कोशिशों
के
बाद
धरती
नहीं
पचा
पा
रही,
नामुराद
प्लास्टिक
और
अब
परमाणु
कचरे
के
स्वागत
में
कितनी
व्यग्र
है
यह
सरकार...17
समाजिक,
राजनीतिक
और
विशेषकर
पर्यावरणीय
सरोकार
इनकी
कविताओं
में
बार-बार
आता
है।
यह
कोई
आकस्मिक
घटना
नहीं
अपितु
मनुष्य
के
संघर्षमय
जीवन
को
करीब
से
देखने
और
प्रकृति
की
गोद
में
जीवन
जीने
के
परिणामस्वरूप
है।
नि:संदेह
मानव
मानव
का
शत्रु
है।
विकास
की
अंधी
दौड़,
पर्यावरणीय
संकट
के
दौर
में
सत्ता
की
असंवेदनशीलता
पर
ये
तीखा
प्रहार
करते
हैं।
इस
कविता
में
मंडलोई
ने
सत्ता
के
उस
चेहरे
को
बेनकाब
किया
है
जिसमें
सत्ता
तात्कालिक
लाभ
और
कथित
विकास
के
लिए
भविष्य
की
पीढ़ी
को
दाँव
पर
लगा
देती
है।
यहाँ
कवि
मानव
की
असंवेदनशीलता
से
उपजी
उपभोक्तावादी
संस्कृति
पर
चोट
कर
रहे
हैं
जिसने
अपनी
सुख-सुविधाओं
के
लिए
ऐसे
तत्वों
का
निर्माण
कर
दिया
है
जो
समूची
मानवता
के
पारिस्थितिकी
तंत्र
को
निगल
रहा
है।
हाल
ही
में
लीलाधर
मंडलोई
का
नया
कविता-संग्रह
‘प्रेम
ध्रुपद’
प्रकाशित
हुआ
है
जिसमें
मंडलोई
जी
की
मानवीय
संवदनाओं
की
गूंज
को
देखा
जा
सकता
है।
उनकी
‘अमर्यादा’
कविता
देखिए
यूँ
मैं
साबुत
हूँ
लेकिन
दर्द
का
क्या
कहूँ,
अदृश्य
हिंसा
ने
तोड़
दिया
है
भीतर
तक
राम
तुम्हारे
नाम
पर
इतनी
अमर्यादा,
तुम्हारी
मूर्ति
वोट
में
बदल
गयी
तुम्हारा
राम
राज्य
अब
खुफिया
एजेंसियों
के
भरोसे।18
लीलाधर
मंडलोई
का
हालिया
प्रकाशित
कविता-संग्रह
व्यवस्था
की
विसंगतियों,
राजनीतिक
पाखंड,
सत्ता
की
संवेदनहीनता
और
समाज
में
मूक
रूप
से
व्याप्त
हिंसा
पर
तीखा
प्रहार
करता
है।
यह
पंक्तियाँ
उनकी
इसी
वैचारिक
चेतना
और
मानवीय
संवेदनात्मक
गहराई
को
रेखांकित
करती
हैं।
यहाँ
पर
‘अदृश्य
हिंसा’
सामान्य
शब्द
नहीं
बल्कि
यह
कवि
की
सृजनात्मकता
का
उदाहरण
है।
यह
हिंसा
वह
नहीं
है
जो
बंदूक,
लाठी,
डंडों
से
लड़ी
जाती
है
बल्कि
यह
मानसिक,
सामाजिक
और
व्यवस्थागत
हिंसा
है।
यह
सांप्रदायिकता,
नफरत
और
डर
की
वह
अदृश्य
हवा
है
जो
साधारण
मनुष्य
की
संवेदनाओं
को
भीतर
ही
भीतर
लहूलुहान
कर
देती
है।
यह
रक्तपात
दृश्य
हिंसा
से
भी
अधिक
खतरनाक
होता
है।
यहाँ
पर
कवि
का
दुख-दर्द
व्यक्तिगत
न
होकर
आंतिरक
हिंसा
से
घायल
समूचे
समाज
का
दस्तावेज
है।
‘प्रेम
ध्रुपद’
की
कविताएं
वर्तमान
समय
में
घट
रही
घटनाओं
का
जीवंत
दस्तावेज
है
कहा
जाए
तो
मानवीय
संवेदनाओं
और
विद्रोह
का
जीवंत
दस्तावेज
है।
इसी
संग्रह
की
एक
कविता
देखिए
अब
वे
मुझे
दस्तावेज
से
हटाने
में
जी
जान
से
सक्रिय
हैं
मालिकाना
हक़
की
गणित
में
मेरी
नागरिकता
अब
हाशिये
पर
है।19
कविता
प्रथमदृष्टया
पढ़ते
ही
हम
समझ
सकते
हैं
कि
उनकी
कविताएँ
वर्तमान
समय
में
हो
रही
घटनाओं
को
अभिव्यक्त
करती
हैं।
यह
कविता
भी
सत्ता
के
विरुद्ध
जाकर
आम
आदमी
के
विस्थापन
और
नागरिकता
के
संकट
को
बयां
करती
है।
नागरिकता
का
संकट
वर्तमान
समय
की
सबसे
गंभीर
समस्याओं
में
से
एक
है।
जहाँ
पर
सत्ता
जिसे
चाहे
अभारतीय
करार
दे
सकती
है।
अब
नागिरक
वह
है
जिसे
सत्ता
की
गोद
में
बैठी
ऐजेंसियां
कागज
का
टुकड़ा
देती
हैं।
यहाँ
पर
कवि
सिर्फ
जमीन
के
टुकड़े
के
छिने
जाने
का
दर्द
बयां
नहीं
कर
रहा
है
अपितु
इसके
माध्यम
से
कवि
उस
व्यवस्था
पर
चोट
कर
रहा
है
जो
शक्ति,
पैरवी
और
पूंजी
के
बल
पर
कमजोर
को
उसके
अधिकारों
से
वंचित
कर
देती
है। इनकी ‘कलंक’,
‘प्रेम
ध्रुपद’,
‘एक
दिन’,
‘दुख’,
‘याददिहानी’,
‘लापता’
आदि
कविताएँ
भी
समकालीन
समय
की
सामाजिक
एवं
राजनीतिक
विसंगतियों
को
हमारे
समक्ष
प्रस्तुत
करती
हैं।
निष्कर्ष :
निष्कर्षत:
यह
कहा
जा
सकता
है
कि
लीलाधर
मंडलोई
समकालीन
परंपरा
के
प्रतिनिधि
कवि
हैं।
उनकी
कविताओं
में
सामाजिक
एवं
राजनीतिक
विचारधाराओं
का
समन्वय
देखने
को
मिलता
है।
जहाँ
पर
अधिकतर
कवि
सिर्फ
सीमित
क्षेत्र
तक
सीमित
होते
हैं
वहीं
मंडलोई
जी
गाँव,
नगर,
महानगर
और
जंगलों
को
अपने
काव्य
का
आधार
बनाते
हैं।
ये
उन
कवियों
में
शुमार
हैं
जो
70 के
दशक
से
वर्तमान
समय
तक
अपनी
रचनाधर्मिता
के
प्रति
प्रतिबद्ध
हैं।
उनकी
संवेदना
हर
स्त्री,
पुरुष
और
कहा
जाए
तो
हर
उस
शोषित
मनुष्य
से
ऊर्जा
प्राप्त
करती
है
जिन्हें
साहित्य
में
दर्ज
नहीं
किया
गया।
लीलाधर
मंडलोई
निरंतर
रचनाशील
हैं
और
वर्तमान
समय
के
यथार्थ
को
अपनी
कविताओं
में
माध्यम
में
स्वर
दे
रहे
हैं।
इनकी
कविताएँ
वर्तमान
समय
में
घट
रही
सामाजिक
एवं
राजनीतिक
विसंगतियों
को
अपने
में
समेटे
हुए
हैं।
संदर्भ :
- सं. ओम निश्चल ; 75 कविताएँ (लीलाधर मंडलोई) ; नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली ; संस्करण 2023 ; पृ.सं. 57
- वहीं ; पृ.सं. 26
- वहीं ; पृ.सं. 26
- जानकीप्रसाद शर्मा ; मनुष्यता की इबारतें : लीलाधर मंडलोई की कविता ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली ; संस्करण 2021 ; पृ.सं. 13
- लीलाधर मंडलोई; जलावतन ; भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली ; संस्करण 2018 ; पृ.सं. 92
- वहीं ; पृ.सं. 80
- वहीं ; पृ.सं. 42
- जानकीप्रसाद शर्मा ; मनुष्यता की इबारतें : लीलाधर मंडलोई की कविता ; प्रकाशन संस्थान, नयी दिल्ली ; संस्करण 2021 ; पृ.सं. 52
- लीलाधर मंडलोई ; मनवा बेपरवाह ; साहित्य भंडार, इलाहाबाद ; संस्करण 2011 ; पृ.स. 37
- सं. ओम निश्चल ; 75 कविताएँ (लीलाधर मंडलोई) ; नयी किताब प्रकाशन, दिल्ली ; संस्करण 2023 ; पृ.सं. 11
- लीलाधर मंडलोई ; ईश्वर कहीं नहीं ; सूर्य प्रकाशन मन्दिर, बीकानेर ; संस्करण 2021 ; पृ.सं. 22
- वहीं ; पृ.सं. 66
- वहीं ; पृ.सं. 67
- वहीं ; पृ.सं. 75
- लीलाधर मंडलोई ; घर-घर घूमा ; संभावना प्रकाशन, हापुड़ ; संस्करण 1991 ; पृ.सं. 45
- लीलाधर मंडलोई ; एक बहुत कोमल तान ; अंतिका प्रकाशन, शालीमार गार्डन ; गाजियाबाद, उ.प्र. ; संस्करण 2010 ; पृ.स. 118
- वहीं ; पृ.सं. 98
- लीलाधर मंडलोई ; प्रेम ध्रुपद ; सेतु प्रकाशन ; नोएडा, उ.प्र. ; संस्करण 2026, पृ.सं. 100
- वहीं ; पृ.सं. 97
शोधार्थी, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, 123029 (हरियाणा)
gurdeepbhonsle@gmail.com
अरविन्द सिंह तेजावत
सहायक आचार्य, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़, 123029 (हरियाणा)
arvindtejawat@cuh.ac.in

एक टिप्पणी भेजें