डायरी : अगस्त 2025
- सत्यनारायण व्यास
काल (जयपुर, 2 अगस्त 2025)
काल एक डरावना शब्द। डरो या मत डरो, वह सिर पर मौजूद है। देह के अंदर भी हमारी प्रत्येक जीव-कोशिका में बैठा आयु को चूहे की तरह कुतरता हुआ काल। झुर्रियाँ उसका परिचय पत्र है। बालों के कृष्णपक्ष को शुक्लपक्ष में बदलने वाला काल। और किसी के सिर को पूनम का चाँद बना डालने वाला काल। दृष्टि, श्रवणशक्ति, पाचन शक्ति, स्मृत्ति और चाल-ढाल को क्षीण से क्षीणतर बनाता काल। हमें संसार में लाने और पुनः विदा करने वाला काल। हमारे भीतर काल और हमारे बाहर काल। काल की गोद में संसार और संसार की गोद में हम। काल के बारे में सोचते हुए, काल की बाट जोहते हुए कि एक दिन वह आकर रहेगा। वह हमारे अंदर से ही निकलेगा और हमें ले जाएगा।
नज़र धुंधली, चाल धीमी, साँस फूलती, भोग-प्यास बढ़ती, नाक-मुंह- आँख व गले में रिसते विजातीय द्रव और खांसी - ये काल के प्रशिक्षित सिपाही हैं। हमला करते हैं और वो भी भी चुपचाप। पता नहीं चलता। आप को धराशायी होना पड़ेगा। इन सबके बावजूद, दार्शनिकों और वैज्ञानिकों ने प्रश्न उठाया कि काल है भी या नहीं? यदि है तो काल्पनिक है या वास्तविक? उपनिषद् के ऋषि ने भी टांग अड़ाई - संसार का मूल है अन्न। अन्न का मूल है काल और काल का मूल है सूर्य। क्योंकि काल की सत्ता और गिनती सूर्य से है। ठीक? बात यहीं खत्म नहीं होती। महाप्रलय में जब सूर्य के साथ सृष्टि विलीन हो जाएगी तब काल का क्या होगा? ऋषि के दिमाग ने फिर एक तुर्रा फेंका कि इस काल के दो रूप हैं- प्राक् आदित्याद और आदित्याद्। मतलब सूर्य की उत्पत्ति से पहले का काल और सूर्य के बाद का काल। यह मानवीय मेधा का कमाल है। इन्सानी दिमाग भी लाजवाब है। काल मूर्त भी है और अमूर्त भी। भ्रूण-विकास, जन्म, शिशुना, यौवन, वार्धक्य और मृत्यु। ये हुए मूर्तरूप। अंकुर, पौधा, वृक्ष, कलियों से फूल और फल के बाद सूखकर ठूंठ हो जाना - ये काल के प्रत्यक्ष प्रमाण। अब तो मानोगे ?
बात यह है कि परमसत्ता का दृश्य-रूप उसकी एक किरण मात्र है। दृश्य से अदृश्य बड़ा और असीम है। व्यक्त, उस अव्यक्त की एक छोटी-सी झलक है। उस पराशक्ति का सेनापति है काल। काल और दिक (Time & Space) जुड़वा भाई हैं - सृष्टि मां के। महान् वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टाइन ने पूरी जिन्दगी काल और दिक को समझने में लगा दी। वह पश्चिम का महर्षि था। उसने मात्र पाँच अक्षरों में जीवनभर की शोध और मानव-मस्तिष्क की पराकाष्ठा के रूप में यह छोटा-सा सूत्र रखा - E= mc² जिस पर विज्ञान की दुनिया और सैंकड़ों विज्ञान-ग्रन्थ टिके हुए हैं। एक पॉइंट ऐसा है जिस पर आकर विज्ञान और अध्यात्म गले मिलते हैं। आइंस्टाइन' और आर्यभट्ट एक हुए। उपर्युक्त सूत्र का तात्पर्य सर्वविदित है कि ऊर्जा, पदार्थ में और पदार्थ ऊर्जा में रुपान्तरित हो जाते हैं। रूपान्तरण की इस अन्तः प्रक्रिया में भी काल विद्यमान है।
मेरा अंत:करण कहता है कि सृष्टि के प्रलय में लुप्त हो जाने के बाद भी काल और दिक का विनाश नहीं होता। दिक् का मतलब खालीपन, आकाश और काल भले ही 'प्राक् आदित्याद्' क्यों न हो, रहेगा और रहना अक्षत है। अतः काल और दिक् अविनाशी तत्व हैं।
इनके अविनाशित्व का समर्थन ऋग्वेद के दसवें मंडल का उन्तीसवाँ सूक्त भी करता है और उसका नाम है "नासदीय सूक्त"। यह भारत वर्ष का प्राचीनतम दार्शनिक सूक्त है, जिसमें ऋषि ने ईश्वर का लिहाज़ न करते हुए साफ वाणी में यों कह दिया - "जब न सद् था न असत्। सृष्टि, ग्रह, नक्षत्र, भू, सूर्य, जल यहाँ तक कि संपूर्ण ब्रह्माण्ड भी नहीं था। किसी भी वस्तु की सत्ता नहीं थी। एक गहन अंधकार था। कौन जानता है, कौन है जो कह सकता है कि सृष्टि कहाँ से और कैसे उत्पन्न हुई? हो न हो, कोई तो उस स्वाधीन अव्यक्त व्योम का अध्यक्ष था, जो शायद वही जानता होगा और संभव है कि वह भी न जानता हो।"
राम (चितौड़गढ़, 14 अगस्त 2025)
भारतीय संस्कृति के हृदय का नाम है- राम। हमारी संस्कृति और सभ्यता का पर्यायवाची शब्द है राम। अयोध्या से रामेश्वरमू तक जनता के दिल की धड़कन है राम। उठो तो राम, बैठो तो राम। जगो तो राम, सोए तो राम। सांसों में राम, आहों में राम, कराहों में राम। खुशी और आनन्द में राम, विपत्तियों के विलाप में राम। यहाँ तक कि रोम-रोम में राम। सृष्टि के कण-कण में राम। द्यु: लोक से परब्रह्म कौशल्या की कोख से धरती पर उतर कर आए- धर्म की जय के लिए और अधर्म के नाश के लिए। राम, धर्म के देहधारी रूप हैं। 'रामधरम से बोल दो' यह सत्यवचन है। शवयात्रा तक में 'राम नाम सत्य है'। मंगल भवन अमंगल हारी और दशरथ - अजिर बिहारी भी वे ही हैं। वाल्मीकि और तुलसी उनके यशोगान के चारण हैं। तुलसी ने तो मामूली-सी दिखते वाली एक ऐसी ग़ज़ब की लाइन लिख दी कि वह 'रामचरित मानस' का एक नाभिकीय केन्द्र (न्यूक्लियर सेंटर) हो गई। लाइन ये है-
"तुलसी रघुनाथ नाम
आपुनो-सो घर है।"
राम का नाम इतना सुख, सुकून और आरामदायक है- जैसे "अपना ही घर" हो। रामनाम भक्तों का 'कंफर्ट जोन' है। निश्चिन्त होकर अपने घर में सोये रहो। दुनिया में अपने घर से बढ़कर प्यारी और सुहावनी जगह आज तक नहीं बनी है। जो अरबपत्ति-खरबपति होकर भी रामनाम से दूर हैं उनके महल, अट्टालिकाएँ और 'एंटालिया' (अंबानी का बहुमंजिला भवन) लक्ष्मी या कुबेर के घर होंगे, वे कभी भी 'आपुनो-सो घर' नहीं हो सकते। राम के घर नहीं। राम, धर्म के प्रतीक हैं। सत्य के प्रतीक है। कर्म के प्रतीक हैं। मोक्ष के प्रतीक हैं। राम का मतलब नैतिक जीवन की पराकाष्ठा। राम का मतलब ज्ञान और भक्ति में तदाकार होना। राम का मतलब राज्याभिषेक से वनवास के बीच निर्द्वंद्व सदा मुस्कुराता चेहरा। अयोध्या का राजसिंहासन और चित्रकूट की चट्टान में कोई अंतर नहीं। राम का अर्थ है जीवन में त्याग, तपस्या, तितिक्षत, आसुरी भावों पर विजय, कर्तव्य, प्रण पालन और विमाता के प्रति, माँ-समान श्रद्धा।
वे जानते थे कि सोने का हिरण नहीं होता। पर अर्धांगिनी का मन और मान रखना भी पति का भावनात्मक कर्तव्य है। और फिर आगे मानुष-लीला भी तो करनी थी, जो स्वर्णमृग की माया से शुरू हुई। वेदान्त के महान ग्रन्थ 'ब्रह्म सूत्र' में यह वाक्य है - 'लोकवत् तु लीला कैवल्यम्" अर्थात मृत्युलोक में आकर सामान्य जन की भाँति उन्हें लीला भी तो करनी है!
धर्म-भक्ति से भारतीय-हृदय के वज्र-जुड़ाव से अनभिज्ञ, केवल भौतिकता के अजीर्ण से अघाए कुछ बुद्धिजीवी राम के जन्म-काल, स्थितिकाल और उनके अवतारी आस्तित्व पर ही सवाल खड़े करते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भारतीय चित्र में जमी हुई राम की, कृष्ण की, शिव की जो अमिट, सजीव और जाग्रत छवि है, उसे दुनिया की, विज्ञान और इतिहास-बोध की कोई ताकत नहीं उखाड़ सकती। सारे ज्ञान-विज्ञान, भौतिकशास्त्री अपना सिर पीटते रहें, अपने बाल नोंचते रहें, अपनी छाती कूटते रहें, परन्तु विराट् भारत का लोक मानस, राम में जीता है, राम में रमता है और राम का नाम लेकर मर जाता है, पर राम को नहीं भूलता। यहाँ कल्पना, यथार्थ, इतिहास, मानवशास्त्र अपनी पूरी ताकत लगाकर दम तोड़ देते हैं।
भारत को सोने की चिड़ियाँ बताता हमारी संस्कृति का ग़लत और घटिया परिचय है। भारत त्याग, तपस्या, वैराग्य और कष्ट-सहिष्णुता का गौरव-शिखर है। यहाँ ऐश्वर्य, ठाठ-बाट और राजासंहासनों का कोई मूल्य नहीं, कोई अहमियत नहीं। राम ने जीवन में क्या सुख देखा? सुख और दुःख उनके चरणों की धूल थे। धर्म, कर्तव्य और संघर्ष उनके भाल का तिलक थे राम, ईश्वरत्व छोड़कर मनुष्यरूप में आए। यहाँ लीला की और ऊँचे आदर्श छोड़कर चले गए। क्या हमारा यह कर्तव्य नहीं बनता कि हम अपने मानवीय दुर्गुणों-लोभ, लालच, सुखेच्छा-वासनाओं का परित्याग कर "राम के ईश्वरत्व" की ओर बढ़ें? वर्ना हम अपने आपको और हमारे राम भी हमें कैसे क्षमा कर पाएंगे? राम, पूजा के बजाय आचरण अनुकरण के योग्य हैं। हनुमान सही कहते हैं-
"राम काज कीजै बिना मोहि कहाँ विसराम।"
कृष्ण (चितौड़गढ़, 16 अगस्त 2025)
बाँसुरी, मोरपंख और गीता। अब किसी चौथी चीज़ की ज़रूरत कहाँ है? बाँसुरी में जगत् मंडल का सारा नाद-सौन्दर्य और संगीत समाया हुआ है। मोर पंख में समस्त इन्द्रधनुषी कला-संसार और जीवन के सारे रंग समाहित हैं। अब रही गीता। गीता में संपूर्ण भूमंडल के तमाम धर्मों का सारतत्व स्वयं श्री कृष्ण के मुखारविन्द से निःसृत लोक और परलोक का तत्वज्ञान प्रकाशित है। कृष्ण की अनंत विभूतियों का निष्कर्ष इन तीन विभूतियों में व्याप्त है।
ऐसा लीलाधारी भारत में ही जन्म ले सकता था, जो बचपन का माखनचोर है, यौवन में गोपियां का वस्त्र-चोर है और भक्तजनों का चितचोर है। जिसका जन्म कारावास में, जिसकी माँएं दो हैं। पिता दो हैं, राजधानियाँ दो हैं (मथुरा- द्वारिका), और रानियाँ सोलाहजार उन पर आठ पट-रानियाँ और इन सब की शिरोमणी एक प्रेमिका, जिसका नाम है राधा। वाह भाई क्या कहने। उसकी लीला का, उसकी माया का पार नहीं। जो गोपियों के वस्त्र चुराता है, वही द्रौपदी का चीर बढ़ाता भी है। मथुरा जाकर बृजवासियों को विरह में तड़पाने वाला, कालिय नाग पर नृत्य करने के साथ, कंस के भेजे बकासुर, शकटासुर, अघासुर और व्योमासुर का संहार करने के साथ इन्द्र को चुनौती देकर गोवर्धन गिरिराज की छाया तले उन्हें बचा भी सकता है। कृष्ण की लीला अद्भुत और मानव-बुद्धि से परे है।
कृष्ण शब्द का मूल अर्थ है- खींचने वाला। चुम्बक की तरह जो भक्तों के चित्त को खींच लेता है। इस शब्द की धातु है- कृष् = कर्षणे। इसी से बना है आकर्षण, इसी से कृषि, कृषक। किसान बैलों से हल खींचता है, कृष्ण अपनी लीला से भक्तजनों को। बाँसुरी से ब्रजवासियों को खींच लेता है। वे भाग्यशाली हैं जो खिंच जाते हैं।
ऐतिहासिक छिनबीन से यह पता लगता है कि ढाई हजार साल पहले के रचे गए एक प्राचीन उपनिषद्-छान्दोग्य में श्री कृष्ण नामक एक छात्र हुआ जो घोर आंगिरस ऋषि का शिष्य था। जिसे यज्ञ-विधि के साथ ज्ञान की शिक्षा-दीक्षा दी गई। सांदीपनि के मालवा स्थित आश्रम में सुदामा के साथ सहपाठी होना भागवत में मिलता है।
यह संसार भी कंस की जेल से कम नहीं लगता। हम कृष्ण की भाँति जन्म नहीं ले सकते, पर कृष्ण के भक्त तो हो ही सकते हैं। 'यदा यदा हि धर्मस्य' की ग्लानि तो बहुत बढ़ चुकी है, परन्तु वह नटनागर एन टाइम पर आता है। तब, जब द्रौपदी की खींची जा रही साड़ी की एक परत बची हो। यह उसकी आदत है। शिशुपाल की 99 गलतियाँ हँसकर सुनीं और सौवीं में सुदर्शन चक्र से उसका सिर काटा। कृष्ण आता है, पर आने से पहले सताता बहुत है। विरह की मारी घायल गोपियाँ तो कृष्ण को रात दिन कोसती ही रहती है।
ख़ुद तो आए नहीं। बेचारे गरीब और भोले उद्धव को ब्रज में भेजा कि गोपियों को समझाकर आना। वहाँ उद्धव को गोपियों ने लानत-मलामत की और सिसकियाँ भरते हुए रो पड़ीं। रीतिकाल के कवि ने उनकी विरह-दुर्दशा का चित्र खींचा है-
"कछु कही बैनन सों
कछु कही नैनन सों
रही सहीं सोई
कह दीनि हिचकीन सों ।।"
कृष्ण गज़ब के बहुरुपिया है। इतने रंग रूप, इतनी लीला, इतनी भूमिकाएँ करते हैं कि दिलोदिमाग घूमने लगता है। कुछ झलक देखिए - यशोदा के कृष्ण, गोपियों के कृष्ण, माखनचोर कृष्ण, ब्रज के रक्षक कृष्ण, कंस वधकर्ता कृष्ण, महाभारत के कृष्ण, अर्जुन के सारथी कृष्ण, निर्धन सुदामा के धूल भरे पाँवों को आँसुओं से धोने काले कृष्ण और सारी की लीलाएं करने के बाद प्रभास क्षेत्र में पेड़ के नीचे एक बहेलिए के तीर से देह - त्याग कर धराधाम से विदा होने वाले कृष्ण। इसलिए वे सोलह कलाओं के अवतारी पुरुष हैं।
भक्ति के सिवा कृष्ण को किसी और उपाय से नहीं पाया जा सकता। मुगल काल में अद्वैत वेदान्त दर्शन के एक घनघोर और प्रकांड पंडित हुए थे - मधुसूदन सरस्वती। उन्होंने निष्फल, निर्गुण, निराकार ब्रह्म की स्थापना के अनेक कठिन और जटिल ग्रन्थ लिखे, जिनमें "अद्वैत सिद्धि" नामक ग्रन्थ विख्यात है। इतने ज्ञान के समुद्र होने के बावजूद वे निराश और उदास बने रहे। देर से अक्ल आई और कृष्ण की सगुण भक्ति में ऐसे डूबे कि उससे बाहर निकलना छोड़ दिया। अर्थ सहित उनका रचा एक श्लोक है प्रमाण के लिए-
वंशी विभूषित करात् नवनीरदाभात
पीतांबरा वरुणबिंब फलाधरोष्ठाद।
पूर्णन्दु सुन्दर मुखादरविन्दनेत्राद्
कृष्णात् परम् किमपि तत्वमहं न जाने।
भावार्थ है कि जो नए जल से भरे नीले मेघ के समान, जिनके हाथों में बाँसुरी सुशोभित है, पीला अंगवस्त्र धारे, जिनके अधर बिंबाफल से लाल रंग के हैं, कमल पंखुरी जैसी आँखों वाला जिनका पूनम के चाँद जैसा उज्ज्वल सुन्दर मुख है - ऐसे रूपराशि श्रीकृष्ण के अलावा मैं किसी 'और तत्त्व' को नहीं जानता।
कृष्ण के ध्यान का मतलब है, पराशक्ति के साथ महारास में लीन होना। श्रीमद्भागवत में उन्हें चार महावाक्यों से संस्तुत किया गया है-
1. कृष्णम् वन्दे जगद्गुरुम् ।
2. कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।
3. श्री कृष्णः शरणम् मम ।
4. वासुदेवः सर्वम् ॥
भक्ति भी ऐसी हो जैसे घोंसले में बैठे अपनी माँ का इन्तजार करते पँखरहित चोंच खोले चूजे, या माँ के स्तन्य की लालसा में बिलखता भूखा नवजात शिशु - माँ आए तो प्राण बचे। ऐसी उत्कट भावाकुल भक्ति कृष्ण को प्रिंय है। किसी पुराण में भगवान के मुख से कहलाया भी गया है-
नाहं वसामि बैकुंठे
योगिनी हृदयेन च।
मद्भक्ताः यत्र गायन्ति
तत्र तिष्ठामि नारद॥
हमारी भोग-लालसा चर्मरोग की उस खुजली के समान है कि खुजाते खुजाते ख़ून आ जाता है, पर न मिटती है और न हमें शान्ति मिलती हैं। एकमात्र अचूक उपाय है- वैद्यों के राजाधिराज श्रीकृष् को पुकारना। उनके आते-आते सिर्फ पुकारने से ही भोगरूपी खुजली शांत हो जाएगी। कृष्ण की काली कामली में विश्व के सभी रंग विलीन हो जाते हैं। कृष्ण यानी काला, श्याम, नीला, सांवला, सांवरा- सभी रंगों को लील जाने वाला। बगल में खड़ी गोरी राधिका तक उनके रंग में रंग जाती है और कवि कह उठता है-
आधा मन राधा बना,
आधा मन घनश्याम ৷৷
कृष्ण के अनेक रूपों में से सबसे प्यारा उनका रूप है - बालकृष्ण का। जिस पर सूरदास मोहित हैं, कवियों की पूरी जमात मोहित हैं और सारी दुनिया मोहित है। धूलभरे, घुटनों चलते, मिट्टी खाते, मां की डांट खाते, घुंघराले बालों वाले, माखन चुराते, मुंह पर दही लिपटाए बालक कान्हे पर कौन मुग्ध नहीं होता।
इससे भी सुन्दर रूप, कृष्ण के नवजात शिशुलीला का है कि "हरे-से वट-पत्र पर, लेटे हुए कर-कमल से अपने पद-कमल को मुख-कमल में लेकर (पाँव का अंगूठा चूसते) ऐसे बाल-मुकुन्द का हम हृदय से स्मरण करते हैं।" बहुत सुन्दर मनोहर श्लोक है-
करारविन्देन पदारविन्दम्
मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम
वटस्य पत्रस्य पुटे शयानम
बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि ॥
ऐसे नंद के घर आनन्द-नृत्य करने वाले श्री कृष्ण कन्हैयालाल की जय हो! जय हो!! ~ कृष्णजन्माष्टमी पर
लोक (18अगस्त 2025)
आँखों के सामने और दसों दिशाओं में जो कुछ प्रत्यक्ष दिखाई देता है, वह लोक है। हमारी पृथ्वी और इसके ऊपर नीचे चारों ओर जहाँ तक हम देख सकें - वह भूलोक है। इसका दूसरा नाम है - मर्त्य लोक । क्योंकि यहाँ वे ही लोग और प्राणि रहते हैं, जो मरेंगे। निश्चित। इस लोक की सीमा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं वरन संपूर्ण प्राणिजगत, समुद्र, वायुमंडल और विराट प्रकृति इहलोक में शामिल है। भूलोक के मरणशील प्राणी- मनुष्य की बुद्धि भूलोक को पार कर आगे पहुँची और उसने चौदह लोकों की कल्पना कर डाली। कल्पना इसलिए कि भूलोक छोड़कर न तो कोई अन्य लोकों में गया है और गया भी हो तो वह लौटकर बताने नहीं आया। इस कल्पना का वैज्ञानिक सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है। अस्तु।
इंसान के आला दिमाग की उड़ान देखिए एक-दो नहीं पूरे चौदह लोकों की कल्पना कर डाली। धरती से ऊपर, धरती समेत सात लोक ये हैं一 भूलौक, भुवलौक, स्वलौक, महलौक, जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक (या बृहत लोक)। अब धरती से नीचे सात लोक और माने गए हैं- अतल, वितल, सतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल। बोलो, क्या बचा? लोग सिर्फ तीन-चार लोक ही जानते हैं- स्वर्गलोक - नरकलोक (दोनों का एक नाम यम-लोक) देवलोक और पाताल लोक। ये सारे नाम पुराणों में दोहरा-दोहरा कर लिखे गए हैं। कुछ तो चौंकाने के लिए और कुछ डराने के लिए।
यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि 'लोक' नामक संज्ञा के दो रूप हैं - एक व्यापक विराट् लोक जिसमें पृथ्वी के तमाम देश, प्रजा, मनुष्य जातियाँ, प्राणिजगत् समस्त प्रकृति और पारिस्थितिकीय तंत्र। दूसरा सीमित होते हुए भी बहुत बड़ा दायरा दुनिया में रहने वाले समस्त मानव-समुदायों और उनका सामान्य दैनिक जीवन है। हमारी चर्चा इसी मनुष्य-लोकपर्यन्त सीमित है। हमारा यह लोक प्रत्यक्ष है, जाग्रत है, और संस्कृति, सभ्यता, सभी ज्ञान-विज्ञान, कला और साहित्य का जन्मदाता है। लोकसत्ता विश्व की सर्वोच्च सत्ता है और हम सब इस लोक-यात्रा के मरणधर्मा पथिक हैं। लोक से ऊपर कोई नहीं - न तो वेद, न शास्त्र, न कोई अवतार या महापुरुष। क्योंकि ये सब लोक की सन्तान हैं। लोक इनकी संतान नहीं है। किरणे सूर्य की मानी जाएंगी, सूर्य किरणों का नहीं माना जाएगा।
संसार की महान से महान उपलब्धियाँ, आविष्कार, विभूतियाँ और महापुरुष, धर्म, वेद, शास्त्र, संगीत सब लोक से उत्पन्न हैं। अतः लोक से वे बड़े नहीं हो सकते। और यदि कोई महान् पुरुष अपनी योग्यता के मद में ऐसा उपदेश, ऐसे निर्देश देता है, जो लोक-जीवन को चुनौती देते हों तो लोक उन्हें खारिज़ कर देता है, उनकी अवज्ञा करता है और पालन नहीं करता। जैसे दयानंद सरस्वती ने कहा "मूर्तिपूजा मत करो। वह सब पत्थर है। एक सर्वव्यापी परमेश्वर को मानो।" पर लोक ने इसे माना क्या? उनके जीवनकाल में और उसके बाद मंदिर और मूर्तियाँ बेतहाशा बढ़ते जा रहे हैं। ये है लोक की शक्ति जो अपने स्वभाव के विरुद्ध कुछ भी स्वीकार नहीं करती। इसलिए संस्कृत में एक सूक्ति बनी-
"यद्यपि सिद्धम् लोकविरुद्धम्
नाचरणीयं नाचरणीयम् ॥"
राजा, नेता, विद्वान्, वैज्ञानिक, कलाकार और महापुरुषों को लोक-शक्ति से संभलकर और बचकर चलना चाहिए। हम यहाँ यह नहीं कहते कि लोकमान्यता और लोकविश्वास हमेशा सत्य और सही हैं। यहाँ, बात लोकसत्ता के स्वभाव की है। बुद्ध जैसे महातत्वज्ञानी ने ढाई हजार साल पहले कहा कि "यज्ञ बन्द करो। इससे किसी का दुःख दूर नहीं होता।" यही चार्वाक ने भी कहा, पर क्या लोक ने इसे कभी माना? आज तक जगह जगह यज्ञ हो रहे हैं। ख़ूब।यहाँ भारत का एक महाप्रतिभाशाली आचार्य हुआ है- दो हजार साल पहले। उसका नाम है - विष्णुगुप्त चाणक्य।उसे लोक (यानी प्रजा) की ताक़त का अन्दाज़ा था। अतः नन्दवंश को उखाड़ने के बाद अपने शिष्य चन्द्रगुप्त को ख़ूब सावधान करते हुए कहा कि शासन हमेशा लोकचित्त को ध्यान में रखकर चलाना, वर्ना प्रजा तुम्हें उखाड़ फेंकेंगी। अपने ग्रन्थ कौटिलीय अर्थशास्त्र में यह बात लिखकर उसे समझाई-
सर्वज्ञता लोकज्ञता इति ।
सर्वज्ञोSपि अलोकज्ञ:
मूर्खतुल्य:।
हे वत्स, सब विषयों के ज्ञान का मतलब है लोकचित्त का ज्ञाता होना। जो खुद को सर्वज्ञ मानता है और लोक-मानस से अनभिज्ञ है, उससे बढ़कर मूर्ख इस दुनिया में नहीं है। वैसे तो यह विषय बहुत विस्तृत है, परन्तु यहाँ हम सिर्फ साहित्य की बात करें तो इस सन्दर्भ में इसके दो रूप हैं- लोकसाहित्य और शिष्ट-साहित्य। पीढ़ियों से चले आ रहे लोकगीत, भजन, लोक वार्ता, लोकगाथा, जो जन कंठ में हैं, वे मूल हैं। पढ़े लिखे विद्वानों, साहित्यकारों कवियों का रचा साहित्य शिष्ट-साहित्य में आता है। यह विभाजन भी कोई ठीक नहीं। क्योंकि शिष्ट भी लोक का ही अंग है। साहित्य के इतिहासकार बार-बार लोक-संग्रह, लोक-मंगल, लोक-रुचि की बात करते हैं। इसलिए लोक-साहित्य शिष्ट-साहित्य से बड़ा और महत्व का है। कवियों, विद्वानों और साहित्यकारों को, लोक से बढ़कर खुद को ऊँचा ज्ञानी समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। पुराने कवियों में गोरखनाथ, कबीर दादू, रैदास और मीरां लोक कवि माने जाएंगे। जबकि कालिदास, भवभूति और तुलसीदास शास्त्रीय-शिष्ट कवि माने जाते हैं। बड़ा और महान् कवि वो है, जिसकी लोक और शास्त्र दोनों पर पकड़ हो। और ऐसे कवि केवल तुलसीदास है।
संस्कृत के सभी क्लासिकल साहित्य-शास्त्री इस लोकसत्ता से सावधान थे। उन्होंने स्पष्ट घोषणा की कि -
"लोके वेदे च इति ॥"
अर्थात जो ज्ञान लोक में है, लोक का है- वही वेदों में भी है। वेदों और शास्त्रों का ज्ञान आकाश से नहीं टपका। वेद ईश्वर की रचना नहीं है, बल्कि सिन्धु-सरस्वती के किनारे रहने वाले साधारण ऋषि-मुनियों ने ही वेदों की रचना की जो मूलतः मनुष्य ही थे। अन्त में हम लोक की बात करें, उसे सत्य, जीवित और हमारा आधार मानें। परलोक, स्वर्ग और देवलोक की बातें सपना और कल्पना है। एक शायर ने यह कटुसत्य कह डाला है-
"सामने है जो कुछ भी
लोग उसे बुरा कहते हैं।
जिसे कभी देखा ही नहीं
उसको खुदा कहते हैं।।"
सहज-साधना (चितौड़गढ़, 21 अगस्त 2025)
जीवन में नाटक और आडंबर के साथ धर्म और पूजा, भक्ति के दुश्मन है। सच्चा भक्त वह है, जो समुद्र में ओलों की तरह गिरकर विलीन हो जाय, तदाकार हो जाए। अपने को अलग न मानकर भगवान में मिला ले। खुद को और भगवान को अलग माने, तो यह खंडित भक्ति है। पूज्य, पूजक और पूजा तीनों एक हो जाए - यह सबसे ऊँची-भक्ति है।
उस प्रभु के सौन्दर्य को आँखें बन्दकर ध्यान में देखना कितना मुश्किल काम है। क्यों ऐसी मशक्कत करें? अरे, उसके सौदर्य को देखना ही है तो क्यों न खुली आँखों से देखें। उसका अपार लालित्य चारों ओर चप्पे-चप्पे में झिलमिला रहा है। हँसता-खिलखिलाता बच्चा, भोजन बनाती और घर को सजाती गृहिणी, खेत में काम करते किसान और उसकी पत्नी, उगता सूर्य, बहती हवा, झूमती अमराई, कलरव करते पक्षी और बहती नदियाँ। कहाँ कमी है - खुली आँखों देखने योग्य सौंदर्य की। जबर्दस्ती तनकर, नाक-आँख बन्द कर प्रणायाम और ध्यान में उस अलख निरंजन को लखने की कोशिश भक्ति के साथ अखाड़े में कुश्ती लड़ने जैसा भारी श्रम है। ये तो पहाड़ पर उल्टे पाँवों चढ़ने जैसा लगता है।
हम जीवन की उस अवस्था में जाए बिना किसी मेहनत के, उस परमसत्ता के साथ दूध में चीनी की तरह घुल जाएँ तो कैसा रहे? जीवन की यह साधना सबसे सरल और सहज होगी कि हमारे भीतर न राग रहे न विराग, न भोग और न त्याग, न इच्छा हो न अनिच्छा। एकदम शांत निर्मल जल से भरे उस तालाब की तरह, जिसमें संसार की हवाएँ लहरें न उठा सकें। सच तो यह है कि शास्त्रों में बार-बार यह हल्ला मचाया गया है कि जन्म-मृत्यु तो बन्धन है, इससे मोक्ष पाना जरूरी है। इस सच के ऊपर एक परम सत्य यह है कि बन्धन और मोक्ष कहीं हैं ही नहीं। हमने कल्पना से उन्हें मान रखा है। बन्धन और मोक्ष तो खरगोश के सींग और वन्ध्या के पुत्र जैसे शब्द मात्र है।
हमने अज्ञान के अंधेरे में रस्सी को साँप मान लिया है और डरे हुए हैं। सहज साधना की मस्ती इसमें है कि न तो कुछ त्यागना है और न कुछ ग्रहण करना है। जैसे हो, वैसे ही रहो। नीति पर चलो, ईमान से रहो। किसी का भला भले ही मत करो, पर बुरा कभी न करो। जहाँ, जिस हाल में हो - गरीबी हो, अमीरी हो, सुख-संपदा हो, या अभाव हों- हर हाल में स्वस्थ और मस्त रहो। स्वस्थ वह है जो कि 'स्व' में स्थित है, अपने में मस्त है।
क्या प्रवृत्ति और क्या निवृत्ति? ये शास्त्रों की भूल भुलइया हैं। इनमें उलझना पंडितों-दार्शनिकों को सौंप दो। अपने तो सहज जीवन की सादगी वाली पगडंडी ही ठीक है। पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक, धर्म और कर्म बड़ी अक्ल वालों के चोंचले हैं। वे मुट्ठी भर महाज्ञानी लोग हैं- हम करोड़ों साधारण निरीह और निसर्ग की गोद में पले मामूली इन्सान। मामूली होना जीना और रहना अब दुनिया वालों को लिए बहुत कठिन हो गया है। घर में बरमूदा और बाहर सूट पहनेंगे और हम है कि जो घुटनों तक पांयचे वाली धोती है, वही घर, खेत और बाज़ार में जाने - घूमने को काफ़ी है। आडंबर और पाखंड अभिजात्य नागर-समाज को मुबारक हो। हम जैसे हैं, वैसे ही ठीक हैं, खुश हैं और परिपूर्ण है।
सहज जीवन की अगली सीढ़ी यह कि हम दुनिया के सारे कर्म करते हुए भी अकर्ता हैं। करने धरने वाला वही ऊपर वाला है। सबमें एक वही राम है। हम 'रामधरम' से जीते हैं। जगत की अशान्ति में शान्त रह पाना सहज की साधना है। वह हमारे भीतर है, हम भी उसके भीतर हैं। वह हमारा राम है, हमारा जीव है, हमारा 'भुँवरा' है। ये देह तो एक दिन जानी है। सगुण-निर्गुण हम नहीं जानते। न हमें आसक्ति और अनासक्ति का ज्ञान है। हम तो उसके हैं, हमारा परिवार, बाल बच्चे उसके हैं। जो काम करते हैं, उसका है। खेत न तो सरकार के और न हमारे। खेत का मालिक तो एक वही है, हम तो उसके सीरी है, सिझारी हैं। सहज साधना ऐसे, जैसे बिना प्रयास के साँस लेते रहना - अनजाने, अनायास और स्वभावगत। वह दिन कब आएगा, जब हम रोटी में, पानी में, जगने और सोने में, लोगों में और प्राणिमात्र में राम को देखेंगे।
सत्यनारायण व्यास
(राजस्थान के वरिष्ठ साहित्यकार एवं कवि)
नीलकंठ, छतरी वाली खान के पास, सेंथी (चित्तौड़गढ़) 312001, 9461392200
अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा


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