- आलोक कुमार गुप्ता
शोध
सार
: भोजपुरी
लोक
साहित्य
एवं सांस्कृतिक चेतना
के
व्यापक
फलक
पर
‘पूर्वी के पुरोधा’ कवि महेन्द्र मिसिर का
व्यक्तित्व
इतिहास,
संगीत
और
क्रांति
के
अनूठे संगम द्वारा
निर्मित
हुआ
है
।
भोजपुरिया
अंचल
की
माटी
के
लाङ
– प्यार से यह
साधक
एक
कवि के रूप
में
भोजपुरिया
अंचल
की
मिट्टी
की
अस्मिता और ब्रिटिश शासन के
विरुद्ध
विद्रोह
करने
वाला
एक
सांस्कृतिक
योध्दा
के
रूप
में
मिसिर
जी
जाने
जाते
हैं
।
महेन्द्र
मिसिर
का
जीवन
नाटकीय,
किवंदतियों
एवं
अफवाहों
से
भरा
हुआ
मिथकीय
एवं
बहुआयामी
रहा
है
जिसने
आधुनिक
भोजपुरी
एवं
हिन्दी
उपन्यासकारों
को
गहन
शोध
एवं
विश्लेषण हेतु बहुत गहरे
तक
अभिप्रेरित
किया
।
इन
उपन्यासिक
कृतियों
में
महेन्द्र मिसिर का
कालखण्ड,
एक
पूरे
भोजपुरी
भाषा
के
अस्मिता एवं पुरबी
कला
शैली
के
जन्म
का
युग
है
।
किसी भी
उपन्यासकार
हेतु
उपन्यास
सर्जना
में
यर्थाथ वर्णन के
साथ
कल्पना
की
भावप्रवणता
का
मणिकांचन
संयोग
रहता
है
।
कल्पना
के
माध्यम
से
ही
लेखक
कथानक
की
भाव
भूमि
पर
अपना
कदम
आगे
करता
है
।
महेन्द्र
मिसिर
जैसे
नायक
का
जीवनी
परक
उपन्यास
लिखने
में
कतिपय
लेखकों
को प्रचुर अंतर्विरोध
का
सामना
करना
पडा
है, जिनमें मिसिर
जी
का
बहुआयामी
फलक
प्रमुख
है
।
महेन्द्र
मिसिर को हम
कई
रूपों
में
देखते
है
यथा
– संपन्न जमीदार परिवार
के
ब्राहमण
पुत्र,
तवायफों के कोठे
पर
संगीत
में
की
साधना
करने
वाले
गवैया
के
रूप
में,
अपने
हारमोनियम
पर
'पुरबी’ की
कोमल
धुने
छेड़ने
वाले,
ब्रिटिश
अर्थव्यवस्था
को
नष्ट
करने
के
लिए
जाली
नोट
छापने
का
प्रकरण,
ढेलाबाई के प्रेम-प्रसंग
के
रुप
में
।
यह
विभिन्न
अंतर्विरोध
उपन्यासकारों
हेतु
कलाकार,
क्रांतिकारी
एवं
प्रेम-प्रसंग,
जमीदारी
आदि
प्रमुख
बिन्दुओं के रूप
में
कथानक
हेतु
एक
उर्वर
भूमि
प्रदान
करता
है
|
बीज
शब्द
: पूर्वी पुरोधा,
गवैया
कवि,लोककलाकार,पूर्वी
शैली,पुरबी
सम्राट,
ऐतिहासिक
पात्र,किवदंतियां,जाली
नोट,तवायफ,
क्रांतिकारी,गीतकार
|
मूल
आलेख
: हंस
पत्रिका
में
अपने
चर्चित
लेख
‘महेन्द्र
मिसिर
- यथार्थ
और
पुरबी
बयार’
में
रामजी
सिंह
यादव
लिखते
हैं
कि-'ऐसा
ही
एक
नाम
महेन्द्र मिसिर का भी
है,
जो
अंगुरी
में
डसले
विया
नगिनिया...
जैसे
अनेक
मधुर
भोजपुरी
गीतो
के
रचयिता
के
रूप
में
लोकमानस
में
स्थापित
हुए,
मिसिर
जी
बनारस,
गाजीपुर,
छपरा.
आरा
सहित
पूरे
देश
में
पुरबी गीत की
विधा
को मान्यता दिलाने
के
साथ-साथ
कोठे
की
गली,
सीढि,
महफिल
की
संस्कृति
और
नकली
गिन्नी
/ नोट
ढालने/छापने,
जेल
जाने
के
नायक
के
रूप
में
प्रख्यात/कुख्यात है ।"
1 महेन्द्र
मिसिर
भोजपुरी
लोकमानस
के
ऐसे
प्रभावशाली
व्यक्तित्व
थे
जिनकी
कला
और
विवादास्पद
जीवन
उनके
अभिन्न
अंग
के
रूप
में
स्थापित
हुआ
|
महेन्द्र मिसिर के जीवन
पर
केन्द्रित
विभिन्न कालखण्डों
में
उपन्यास
लिखे
गए
।
जहाँ
लेखकों
ने
अपनी-अपनी
दृष्टि से उनको
परखा
है
।
पाण्डेय
कपिल
के
फुलसुंघी
उपन्यास
में मिसिर जी
को
एक
प्रेमी
और
संगीत
साधक,
पुरबी
का
विरह,
ढेलाबाई का प्रेमी
के
रुप
में
वर्णित
किया
है
।
‘पूर्वी
के
धाह
(डॉ.
जौहर
शाफियाबादी)’
कृति
उनके
अदम्य
साहस
एव
मनोबल
से
युक्त
राष्ट्रीय
पक्ष
को
उकेरा
है
।
जगन्नाथ
मिश्र
ने
अपनी
कृति
‘पुरबी
पुरोधा
: महेन्द्र मिसिर’ में
17 अध्यायों
में
विभक्त
लेखों
के
द्वारा
मिसिर
जी
का
गीतों का विश्लेषण
प्रस्तुत
किया
है।
‘रामनाथ
पाण्डेय ने
महेन्द्र
मिसिर’
कृति
में
उनके
आंचलिक
एवं
कांतिकारी
स्वरूप
को
ऐतिहासिक
धरातल
पर
स्थापित
किया
है
।
अनामिका
जी
ने
अपने
कृति
‘दस
द्वारे
का
पिन्जरा’ में स्त्री
जीवन
के
पक्ष को उजागर
करते
हुए
मिसिर
जी
का वर्णन किया
है
। तीर्थराज शर्मा
ने
अपनी
कृति’
गीत
जो
गा
न
सका’
में
महेन्द्र मिसिर को नारी-जागृति आंदोलन एवं
नारी
शोषण
के
विरुद्ध
आवाज
उठाने
के
रूप
में
चित्रित
किया
है
।
पुरबी
बयार
कृति
में
संजीव
ने
मिसिर
जी
लोकगीती
एवं उसके प्रवासों
के
संबंधित
प्रमुख
घटनाओं को कथानक
में
चित्रित
किया
है
।
भोजपुरी साहित्य
और
अस्मिता,
संगीत
और
इतिहास
का
जीवत
साहित्यिक
रचना
‘फुलसुंघी’ महेन्द्र मिसिर के
बहुआयामी
जीवन
पर
आधारित
है
।
जिसका
हाल
के
दिनों
में
गौतम चौबे द्वारा इस
रचना
का
अंग्रेजी
अनुवाद
से
इसे
वैश्विक पहचान प्राप्त हुई
है
।
16 भागो
में
विभक्त 85 पृष्ठों में
लिखित
इस
कृति
में
मिसिर
जी
के
जीवन
के
अनछुए
पहलुओं,
किवदंतियों,
अफवाहों को बुनकर
कथावस्तु
तैयार
की
गई
है
।
लेखक
स्वयं
सफाई
देते
है
कि
- "एह
में संदेह ना
कि
ढेला,
महेन्द्र
मिसिर,
हलिवंत
सहाय
आ
रिवेल
साहब
साचों के हो
चुकल
बाडे
।
बाकिर
एह
चरित्रन
के
कवनों
प्रामाणिक
ब्यौरा
नइखे रहल ।
आ
एह
लोगन
के
किस्सा
किवदतियन
से
भरल
बा
।
अइसन
कुछ
किवदंतियन
से
सह
पाके,
एह
उपन्यास
के
कमावस्तु,
कल्पना
से
खङा
कइल
बा ।"2 लेखक इतिहास
और
कल्पना
को
एक
साथ
साधकर
उस
कृति
की
रचना
सार्थक
बनाते
है
।
महेन्द्र
मिसिर
के
संबंध
में
पाण्डेय
कपिल
उपन्यास
में
उनका
जिक्र
एक
साधारण
इंसान
की
तरह
करते
है
जो ढेलाबाई के
तरफ
आकर्षित
है
।
उपन्यासकार
महेन्द्र
मिसिर
को
कुछ
तरह
वर्णित
करता
है
- "ओही
खसावन
के
दल
का
साथे एगो नौजवान बइठल
रहें
- संगीत
के
जानकार
बिरहिनी
आ पूर्वी के
प्रेमी
।
ढेलाबाई
के
नाम
के
जोर
ओकरा
के
काहीं-
मिश्रवलियाँ
गांव
से
छपरा
तक
खीच
ले आइल रहे
।‘’3 उपन्यास के
इन
दोनों
पात्रों
के
बीच
प्रेम
वासना
से
परे
संगीत
और
साधना
का
संबंध
चित्रित
है।
इस
संबंध
में
भगवती
प्रसाद
द्विवेदी लिखते है
कि
- "नारी
मन
की
व्यथा
की
मर्मातक अभिव्यक्ति फुलसुंघी में हुई
है,
मगर
महेन्द्र मिसिर का
व्यक्तित्व
इसमें
काफी
हद
तक
दबा
दबा
सा
दिखता
है
।
यह
प्रणय
-कथा
महेन्द्र
मिसिर
के
बजाय
ढेलाबाई
पर
ही
मुख्य
रूप
से
केन्द्रित
है।‘’
4 अर्थात
इस
औपन्यासिक
कृति
का
कथानक
नायिका
प्रधान
अर्थात
ढेलाबाई
पर
प्रमुख
रूप
रूप
से
केन्द्रित हो गया है ।
जाली नोट
के
प्रसंग
को
लेखक
ने
इस
कृति
में
मिसिर
जी
के
स्वलाभ
के
निमित्त
वर्णित
किया
है,जिसमे
मिसिर
जी
का
स्वतंत्रता
आंदोंलन
में
कही
भी
योगदान
का
जिक्र
नही
है
।
वे
केवल
तवायफो
के
कोठे
पर
गीत
गायन
व
ढेलाबाई
के
प्रेमी
के
रूप
में
चित्रित
है
।
उपन्यास
के
अंत
में
रामनाथ
पाण्डेय
जी
ने
मिसिर
जी
के
संबंध
में
यह
तक
कह
दिया
है
कि-
‘’बाकिर
महेन्दर
मिसिर
? ऊ
त अपना जिनगी से
हमेशा
भागते
रहले।
कतही
छाती
तान
के
खड़ा
ना
हो
सकले
।
हमेशा
पलायन,
पलायन,
आ एही पलायन
में
छपरा
से
भागलन,
जाने
केने
-केने
दू
भटकलन,
नोट
छपलन,
आ
फेरों जेल गइलन,
उनका
खातिर
जेल
से
अधिका
सुरक्षित
जगह
दोसर
होइए
का
सकत
रहे
।‘’5 अर्थात लेखक
ने
नायक
महेन्द्र
मिसिर
के
व्यक्तित्व
को
इस
कृति
में
उतना
महत्व
नही
प्रदान
किया
है
जितना
अन्य
पात्रों
कों
।
भोजपुरी
आलोचक
डा.
विवेकी
राय इस कृति
में
घटनाओं
के
आधार
पर
कहते
है
कि
- "सब
मिलाकर
उपन्यास
में
रोमेटिसिज्म का रोमांच
पुरे
उभार
पर
होता
है
।"
6 फिर भी
महेन्द्र मिसिर के
जीवन
– वृत्त
पर आधारित
प्रथम
कृति
होने
के
कारण
यह
कृति
मील
का
पत्थर
की
तरह
है
।
जगन्नाथ
मिश्र द्वारा लिखित
‘पुरबी
पुरोधा
महेन्दर
मिसिर
उपन्यास’
महेन्द्र
मिसिर
के
सांगीतिक
सफर
को
बहुत
गहराई
से
उकेरा
है
।
17 भागों
में
विभक्त
इस
उपन्यास
में
महेन्द्र
मिसिर
को
केवल
एक
गायक
नहीं,
बल्कि
अपनी
मिट्टी
और
भाषा
के
प्रति
अगाध
लगाव रखने वाले
एक
स्वाभिमानी
कलाकार
के
रूप
में
चित्रित
किया
गया
है
।
मिसिरजी
के
जीवन-वृत्त
के
संबंध में जानने
को
इच्छुक
लेखक
ने
अपनी
जिज्ञासा
के
'आपन बात’ में
कुछ
इस
तरह
अभिव्यक्त
किया
है-
"आखिर
इ
पुरबी
का
ह
? महेन्दर मिसिर के
हवन
? गीत
सुनला
के
बाद
हमारा
मन
में
हलचल
होखे
लागल
।
हम
गायक लोगन से
पुछिली
।
सुननिहारों
लोगिन
से
।
बाकिर
उनका
बारे
में
सही-सही
जानकारी
केहू
न
दिहलस
।
उनकर
अतो पता न
बता
सकलस
न
केहूँ।
गीत
हमरो
निमन
लागल
।
हम
उनका
बारे
में
जाने
खातिर
लग
गइनी
।‘’
7 मिसिर जी
के
जीवन-वृत्त
एवं
उनके
व्यक्तित्व
को
उनके
भोजपुरी
गीतों
के
माध्यम
से
विविध
पक्षों पर प्रकाश
डाला
है
जिनमें
जाली
नोट
प्रकरण,
क्रांतिकारी
स्वरूप
और
लोकसंस्कृति
के
विविध
पक्षों का समुचित
वर्णन
किया
है
।
तीसरे उपन्यास
के
‘पूर्वी
के
धाह
(डा.
जौहर
शफियाबादी)’
एक
ऐतिहासिक
उपन्यास
के
रूप
में
है,जिसका
प्रकाशन
2010 में
हुआ
।
लेखक
ने
पूरे
उपन्यास
में
कथानक
से
जोड़कर
महेन्द्र
मिसिर
के
पुरबी गीतों की छटा बिखेरते हुए
इन्हें
स्वाधीनता
सेनानी
के
रूप
में
स्थापित
करने
की
संपूर्ण
वकालत
करते
हैं
।
लेखक
के
शब्दों
मे
"अदम्य
मनोबल,
अप्रतिहत
शौर्य,
भारतीय
स्वतंत्रता संग्राम के
खातिर
प्रखर
चेतना,
अनुराग
या
गहन
निष्ठा,
त्याग,
बलिदान,
आऊर
स्वाभिमान
के
साकार
प्रतीक
रही
ठेठ
भोजपुरिया महेन्द्र मिसिर
जी
।
आपन
अटूट
मनोवल
आ
संगीत
साधना
का
बलवृता पर अति
मनौवैज्ञानिक
ऊर्जा
का
साथ
मंदिर
का
दीवार
से
कोठा
के
कोमल
कटार
तक
के
कलयुग
के
कृष्ण
बन
के
सुराज
के
सपना
देखत
लाघत
रहलन
आ
अपना
बैदाग
निरइठ
निकल
गइलन
।"
8 मिसिर
जी
के
व्यक्तित्व
की
सार्थकता
को
लेखक
ने
प्रारंभ
में
ही
पाठको
के
सम्मुख
प्रस्तुत
कर
दिया
।
‘स्वामी अभयानंद,
ख्वाजा
जाने
अली,
हलिवत
सहाय,
ढेलाबाई’
आदि
गौण
पात्रों
के
माध्यम
से
कथानक
को
विस्तार
दिया
गया
है
।
तत्कालीन
स्वतंत्रता
संग्राम
और
संन्यासी
आंदोलन
की
भूमिका
में
लिखित
यह
कृति
मिसिर
जी
के
राष्ट्रीय
पक्ष
को प्रमुखता
से
उभारती
है
।
मिसिर
जी
की
राष्ट्रीय
आन्दोलन
में
संपूर्ण
संक्रियता
का
दर्शाया
जाना,
जबकि
वे
अप्रत्यक्ष
रूप
से
इस
गतिविधि
में
सम्मिलित थे, समाचीन
प्रतीत
नहीं
होता
है
।
डा.
सुरेश
कुमार
मिश्र लिखते है- "जो
भी
हो इस उपन्यास
में
महेन्द्र
मिश्र
के
स्वतंत्रता
सेनानी
वाली
पक्ष
इतना
मजबूत
हो
गया
है,
उन्हें
और
राष्ट्रीयता
के
आंदोलन
में
इतना
सक्रिय
दिलाया
गया
है
जो वे थे नही।"9 इस संबंध
में
डा.
भगवती
प्रसाद
द्विवेदी
जी
लिखते
है
कि-
एकतरफ
जहाँ
उन्होने
पूरे
उपन्यास
में
कथानक
से
जोड़कर
महेन्द्र
मिसिर के
गीतों
की
छटा
बिखेरी
है,
वहीं
दूसरी
और
उन्हें
स्वाधीनता
सेनानी
के
रूप
में
स्थापित
करने
की
पुरजोर
वकालत
की
है
।
लेखन
ने
शोधवृत्ति
अपनाकर
बिहार
के
स्वाधीनता
आंदोलन
का
पूरा
परिदृश्य
चित्रित
कर
कथ्य
और
तथ्य
को
तर्कसंगत
और
प्रामाणिक
बनाया
है
।‘’10 27 अध्यायो में
विभक्त
यह
औपन्यासिक
कृति
मिसिर
को
एक
सक्रिय
रूप
से
राष्ट्रीय
स्वतंत्रता
आंदोलन
में
भागीदारी
को
दर्शाती
है
।
रामनाथ पाण्डेय
द्वारा
लिखित
उपन्याय
‘महेन्दर
मिसिर’
इतिहास
के
उपेक्षित
एवं
गुमनाम पात्र महेन्द्र मिसिर के
बहुआयामी
फलक
को
दर्शाता
है
।
यहाँ
लेखक
ने
मिसिर
जी
को,
कवि,
गायक,
पहलवान,
स्वतंत्रता
सेनानी,
साहसी
आदि
बहुत
कुछ
दिखाया
है
।
यहाँ
लेखक
महेन्द्र मिसिर के
सांगीतिक
पक्ष को विस्तार
देते
हुए
उन्हें
लोक-नायक
के
रूप
में
मजबूती
से
स्थापित
किया
है।
मिसिर
जी
के
जीवन-वृत्त
की
प्रमुख घटनाओं का
उल्लेख
लेखक
ने कुछ इस
प्रकार
किया
है-"लडकाई
मे
घर
से
भागल,
स्व
भिखारी
ठाकुर
का
उनके
घर
आइल-गइल,
वंबई
से
कलकता
तक
के
घुमक्कड़ी
जिनगी,
आजादी के दिवानन
से
संपर्क,
नोट
छपत
रहे.
तब
साधुमन
के
आ
आ
के
गड्डी के गड्डी
भजल
नोट
ले
जाये
वाली बात आ
संगीत
की
दुनिया
में
सदा
विचरत
रहे
वाली
बात
के
जानकारी
हमें
मिलल
।"11 लेखक के
गहन
शोध एवं सर्वेक्षण
के
आधार
पर
इस
उपन्यास
की
कथावस्तु
तैयार
करने
में
महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई ।
लेखक
ने
इस
कृति
में
मिसिर
जी
के
दोहरे
चरित
का
उल्लेख
किया
है
- प्रथम गीत
- गवनई
करने
तथा
दूसरा जाली नोट
छापने
का
प्रकरण
।
लेखक ने गीत-
गवनई
को
मिसिर
जी
के
व्यक्तित्व
का
प्रमुख
अंग
माना
है, जो उन्हें कलकत्ता
से
बनारस
तक
प्रसिद्धि
का
प्रमुख
कारण
रही
।
दूसरे
प्रसंग
में
लेखक
ने
बङी कुशलता से मिसिर
जी
का
नोट
कांड
की
ऐतिहासिक
घटना
को
उभारा
है
।
इस
उपन्यास
में
यह
दर्शाया
गया
है
कि
मिसिर
जी
न
केवल
अपने
गीत-गवनई
से
केवल
लोगों
में
राष्ट्रभक्ति का संचार
किया अपितु जाली
नोट
के
माध्यम
से
ब्रिटिश
अर्थव्यवस्था
को
तहस-नहस
करने
का
देशभक्ति
और
साहस
दिखाया
।
समकालीन
हिन्दी
साहित्य
की
सशक्त
हस्ताक्षर
और
सुप्रसिद्ध
कवयित्री
अनामिका
जी
द्वारा
रचित
‘दस
द्वारे
का
पीजरा’
(2008) उपन्यास
पं.
रमाबाई
और
ढेलाबाई की जिन्दगी
के
तारों
से
बुनी
गई
स्त्री
- मुक्ति
संघर्ष
की
अनकही दास्तान है | इस
कृति
में
ढेलाबाई के समानांतर
महेन्द्र
मिसिर
की
कथावस्तु
की
उकेरा
गया
है
।
लेखिका
अपने
प्रेरणा
स्रोत लोहासिह बाबा
के
द्वारा
महेन्द्र
मिसिर
और
ढेलाबाई
के
अंतःसंबंधों की जानकारी
कहानी
के
रूप
में
प्राप्त
हुई
।
महेन्द्र
मिसिर
: आम-
महुआ
संवाद,
परेवा
कुवरः
मेरो
जिया
जाने,
महेन्दर
मिसिर:
घर-घरोआ,
ढेलाबाई,
महेन्दर मिसिर, ढेला-
मिसिर
खाखोन
संवाद
1937 आदि उपशीर्षकों के माध्यम
से
ढेलाबाई
और
महेन्द्र मिसिर के
बहुआयामी
फलक
को
लेखनीबद्ध
किया
।
अनामिका
जी
ने
मिसिर
जी
के
कवि-गायक
एवं स्वतंत्रता सेनानी के
व्यक्तित्व
में
संतुलन
स्थापित
करने
का
प्रयत्न किया है ।
इस
उपन्यास
में
स्वामी
अभयानंद
के
इच्छानुसार
मिश्रवालिया
को
गुप्त
बेस
कैम्प
बनाया
गया
था
तथा
तीन
साल
तक
मिसिर
जी
ने
शस्त्र संचालन की
शिक्षा
लिया
था
।
सन्यासी विद्रोहियों
ने
जाली
नोट
छपने
की
मशीन
मिसिर
जी
के
घर
लगवाई
थी।
लेखिका
कह
स्पष्ट
करती
है-
" महेन्दर
मिसिर
ने
बथान
के
गुप्त
कमरे
में
रूपये
छापने
की
मशीन
लगाई
और
खूब
रुपये
छापकर
क्रांतिकारियों
के
देने
लगे
।
वे
यह
मशीन
सिर्फ
अमावस्या
की
रात
को
ही
चलाते
थे।"12 लेखिका द्वारा
यह
कथन
कतिपय अस्पष्टता की पुष्टि
कर
रहा
है
।
मूलतः स्त्री विमर्श
पर
केन्द्रित
यह
ऐतिहासिक
उपन्यास
महेन्द्र
मिसिर
और
ढेलाबाई
की
मनोदशाओं का चित्रण आत्मकथात्मक शैली
में
किया
है
।
सन
2013 में
रचित
‘गीत
जो
गा
न
सका’,
तीर्थराज
शर्मा
द्वारा
लिखित
उपन्यास
है:
जिसमें
महेन्द्र मिसिर की
बहुमुखी
प्रतिभा
एवं
व्यक्तित्व
प्रगट
होता
है।
कवि,
कीर्तनकार
गायक
व
हारमोनियम,
तबला
सहित
विभिन्न
वाद्ययंत्रों के कुशल वादक
के
रूप
में
चित्रित
है
।
प्रस्तुत
उपन्यास
महेन्द्र
मिसिर के
जीवन
– वृत्त
अनछुए,
अनकहे
पहलुओं
को आत्मकथात्मक शैली
में
चित्रित
करता
है
।
मिसिर
जी
के
जीवन
को
विडम्बनाओ
की
चित्रित
करते
हुए
एक
अत्यंत
महत्वपूर्ण
और
भावनात्मक
रूप
धारण
कर
लेता
है
।
शीर्षक
से
यह
स्वयं
सांकेतिक
अर्थ
है
कि,
मिसिर
जी
जीवन
के
कुछ
पहलू
उनके भीतर ऐसा विद्यमान है
जिसे
वे
प्रकट
नहीं
कर
सके
।
लेखक ने
इस
कृति
में
महेन्द्र मिसिर के
जीवन-वृत्त
को
दार्शनिक एवं मनोवैज्ञानिक
धरातल
पर
स्थापित
करते
हुए मिसिर के
नारी-जागरण
के
पक्ष
को
स्थापित
किया
है
।
लेखक
उपन्यास
के
प्रारंभ
में
दो
शब्द
में
लिखते
है-"
इनका
नाम
आते
ही
वेश्याओं
से
इनके
संपर्क
के
किस्से भी लोगों के जुबान
पर
आ
जाते
है।
इन्होने तत्कालीन समय
में
कोठे
की
नर्तकियों
को
गीत-संगीत
की
शिक्षा
देकर
वैश्यावृति
से
अलग
रहकर
गीत-संगीत
के
माध्यम
से
जीविकोपार्जन
की
राह
दिखाई,
ऐसा
बहुतेरे
विद्वान एवं उन
पर
शोध
करने
वाले
छात्र भी मानते
है।"13
ऐसा
लेखक
का
अभिमत
इस
उपन्यास
में
प्रकट
हुआ
है
|
प्रस्तुत कृति
में
लेखक
महेन्द्र
मिसिर
को
केवल गवैया कवि और
क्रांतिकारी
रुप
में
चित्रित
करते
हुए
उन्हें
एक
अत्यंत
संवेदनशील
एवं
भावुक
मनुष्य
के
रुप
में
चित्रित
किया
है
।
उनके
जीवन
के
विभिन्न
पङावों
को उपन्यासकार ने
इस
कृति
का
कथावस्तु
बताया
है
।
लेखक
के शब्दों में-
‘’लोककवि
व
नाटककार
भिखारी
ठाकुर
के
समकक्ष
एवं
सहयोगी
रहे
पर
मिश्र
के
जीवन
पर
आधारित
यह
उपन्यास
गीत
जो
गा
न
सका
उनके
इसी मिथकीय चरित्र
एवं
व्यक्तित्व
तथा
कृति
के
सम्यक
मूल्याकन का एक
प्रयास
मात्र है ।‘’
14 ढेलाबाई
और
महेन्द्र
मिसिर
के
प्रेम
पर
आधारित
कथानक
का
धरातल
लेखक
ने
तैयार
किया
है।
डा.
सुरेश
कुमार
मिश्र लिखते हैं
कि
"उनका
जीवन
किसी
महान
संगीत-साधक
है
न
कि
किसी
स्त्री
लम्पट
व्यक्ति
का
।
"15 अर्थात
मिसिर
जी
इस
कृति
में
नारी-जागृति.
आंदोलन
एवं
नारी-शोषण के विरुद्ध
आवाज
उठाते
है
।
संपूर्ण
उपन्यास
महेन्द्र
मिसिर के इर्द
-गिर्द
कथावस्तु
का
वातावरण
में
सृजित
है
।
समकालीन
हिन्दी
साहित्य
के
ख्यातिलब्ध
कथाकार
संजीव,
अपने
गहन
शोधपरक
उपन्यासों के लिए
प्रसिद्ध
लेखक
ने
महेन्द
मिसिर
के
जीवन-वृत्त
को
‘पुरबी
बयार’
कृति
में
उकेरा
है
।
उपन्यास
के
प्रारंभ
में
लेखक
का
निवेदन
कुछ
इस
प्रकार
है-"पुरबी बयार में
यशाशक्य
महेन्द्र मिश्र से जुड़े
उनके
जीवन-प्रसंगों
को समेटा गया
है
।
सत्य
के
गिर्द
लताओं की तरह
लिपटी
अनेक
कथाओं-
उपकथाओं में कथा
अक्सर
उलझती रही।"16 लेखक
महेन्द्र मिसिर लोकगायकी
अक्स
के
साथ-साथ
उनके
क्रांतिकारी
रूप
को
मजबूती
से
उकेरा
है
। इस कृति
में
मिसिर
जी
के
कलकत्ता
से
बनारस
तक
लोकगीती
से
प्रसिद्ध
एवं
जाली
नोट
के
प्रकरण
को
उठाया
है
।
यहाँ
जाली
नोट
हापने
का
मुख्य
उद्देश्य
मंदिर
निर्माण
की
वर्णित
किया
गया
है
।
इसका
स्वतंत्रता
सेनानियो
से
कोई
संबंध
चित्रित
नही
हुआ है ।
निष्कर्ष
: निष्कर्षतः हम कह
सकते
है
कि
इन
उपन्यासिक कृति में
महेन्द्र
मिसिर
एक
‘ऐतिहासिक
पात्र
और
सांस्कृतिक
नायक’
के
रूप
में
चित्रित
है
।
वे
पुरबी सम्राट, अपूर्व
रामायण
(भक्त
कवि)
के
रचयिता,
व
जाली-नोट
छापने
वाले
क्रांतिकारी,
सामाजिक
सीमाओं को तोड़ने
वाले
प्रेमी,
तवायफो
से
संपर्क
का
वर्णन
इन
कृतियों
में
बखूबी
मिलता
है
।
जाली
नोट एवं ढेलाबाई
का
प्रसंग
इन
औपन्यासिक
कृतियों
में
बहुधा भिन्न-भिन्न
कल्पनाओं
के
मिश्रण
से
कथानक
का
धरातल
तैयार
किया
है
।
महेन्द्र
मिसिर
का
नोट
कांड
ब्रिटिश
हुकुमत
के
खिलाफ
एक
गवैया
कवि
का
एक
अर्थव्यवस्था
को
नष्ट
करने
का
आर्थिक
विद्रोह
है
।
सारांशतः
हम
यह
कह
सकते
है
विभिन्न
कालखण्डों में लिखे
गए
जीवन-वृत्त
में
महेन्द्र
मिसिर
के
विविध
पक्षों
का
लेखकों
ने
मूल्यांकन
किया
है,
जिसमें
वे
स्वतंत्रता,
कलात्मक
और
मानवीय
संवेदना से संपृक्त
एक
लोककवि
के
रूप
में
प्रतिष्ठित
होते
हैं।
संदर्भ
:
2. कपिल पाण्डेय (2001): फुलसुंघी भोजपुरी संस्थान, तीसरा संस्करण पटना, फुलसुंघी के बारे में से उद्धृत ।
6. विवेकी राय. (नवंबर 2002): भोजपुरी साहित्य प्रगति की पहचान, भोजपुरी साहित्य संस्थान, प्रथम संस्करण, पटना, पृष्ठ संख्या - 140
10. भगवती प्रसाद द्विवेदी,(2017): भोजपुरी साहित्य के निर्माता महेन्द्र मिसिर, साहित्य अकादमी ,प्रथम संस्करण, नई दिल्ली पृष्ठ संख्या – 51
11. रामनाथ पाण्डेय,(1994): महेन्दर मिसिर,प्रकाशक सर्व भाषा ट्रस्ट,नई दिल्ली, संशोधित एवं परिवर्षित 2021, पृ०स०-12
13. तीर्थराज शर्मा,(2019): गीत जो गा न सका, मेखला प्रकाशन, प्रथम संस्करण, नई दिल्ली, दू शब्द से उद्धृत
15. सुरेश कुमार मिश्र, (2025) महेन्द्र मिश्र : संदर्भ और संवेदना, सारव प्रकाशन, प्रभम संस्करण , पृ० स०-113 ।

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