01.05.2026
पिछले हफ़्ते अनिमेष मुखर्जी की दो किताबें ‘इतिहास की थाली’ व ‘ठाकुरबाड़ी’ और सूर्यबाला का उपन्यास ‘कौन देस को वासी’ अमेज़न पर ऑर्डर किया था. शुरुआत ‘इतिहास की थाली’ से की. शुरू में लगा कि खानपान पर है किताब, कुछ रेसिपीज होंगी. लेकिन यहाँ मामला दूसरा निकला. अनिमेष ने भोजन के बहाने पूरी दुनिया और ख़ासकर भारत पर उपनिवेशी शासन का सारा कच्चा चिट्ठा खोल डाला है. किस्सागोई शैली में रोचक इतिहास. नायाब और अनुसुनी कहानियाँ. हम कहते और सुनते ही आए हैं- ‘अर्थ बिना सब व्यर्थ है’. अनिमेष ने इकॉनोमी के सूत्र इतिहास और खानपान में रला-मिला दिए हैं-
“केला दुनिया की सबसे बड़ी रिटेल चेन वालमार्ट में सबसे ज्यादा बिकने वाली चीज है.”
“आलू की फसल के कुछ गुण इसे बेहतर सर्वाइवर बनाते हैं- यह आगजनी में युद्ध में नष्ट नहीं होता. टिड्डी इसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते...इसे खोदकर चोरी कर ले जाना आसान नहीं. यह जल्दी खराब नहीं होता.”
1991
में भारत में आए उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के प्रभाव को वे एक पंक्ति में रेखांकित करते हैं-
“जेब छोटी, कमर मोटी और सोच सीमित.”
और देते हैं इतिहास के गहरे सबक-
भारत में
1943-44 के अकाल के दौरान “कुल मिलाकर बंगाल में तीस लाख मौतें हुईं... बंगाल की इन मौतों से बड़ा एक ही आँकड़ा है, हिटलर के होलोकास्ट में मारे गए यहूदियों का. फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि यहूदियों ने दुनिया को भूलने नहीं दिया कि क्या हुआ था और हम भारतीय भूल गए कि क्या हुआ था. ऐसा कतई नहीं है कि ये मौतें प्राकृतिक आपदा का नतीजा थीं, इनके पीछे ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की नीतियाँ जिम्मेदार थीं.”
किताब में है पुलाव और बिरयानी के द्वंद्व का रोचक इतिहास और सफ़रनामा. साथ ही सालन, दम आलू, दाल बुखारा, बरिस्ता, मटर की कचौड़ी, पानतुआ, ए-वन समोसा से जुड़े रोचक किस्से. अनिमेष बताते हैं कि राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय फ़लक पर क्यों भारत के सारे चर्चित शेफ़ कपूर, कोहली, मान, बरार, भाटिया वगैरह हैं. सैंतालीस के बँटवारे के बाद भारत में दिल्ली के आसपास आकर बसे रिफ्यूजियों ने कैसे बदली भारतीय मेन्यु की तस्वीर और तकदीर. तंदूर किस तरह बन गया उत्तर भारतीय जनजीवन का अभिन्न अंग. कैसे भारतीय उच्च वर्ग से होता हुआ मध्यमवर्ग की शादियों में आया बुफे का चलन. कैसे पनीर ने सभी देसी सब्जियों को बेदख़ल कर दिया. क्यों कहा जाता है. जे. इन्दर सिंह कालरा की किताब ‘प्रसाद’ को इंडियन क्विजिन की बाइबिल. पानतुआ और गुलाब जामुन में क्या अंतर है. दिल्ली में मजनूं का टीला क्यूँ स्वाद प्रेमियों का तीर्थस्थल है आदि-आदि.
और अंत में अनिमेष देते हैं हम सभी को एक सूत्र-
“दुनिया को बदलना हो या ख़ुद को बदलना हो तो यात्राएँ करनी चाहिए.”
05.05.2026
कहीं पढ़ा कि सूर्यबाला के उपन्यास ‘कौन देस को वासी : वेणु की डायरी’ को व्यास सम्मान मिला है. यह अमेरिकी जीवन की कहानी है. अमेरिका के बारे में जानने का मन भी था तो इसे ऑर्डर किया. डायरी शैली में लिखा गया है तो मेरी रुचि इसमें थोड़ी और बढ़ गई. पढ़ना शुरू किया तो पढ़ता ही चला गया और तीन दिन में इसे ख़त्म कर दिया. उपन्यास का नायक है वेणु माधव शुक्ला. निम्न मध्यम्वर्गीय माता-पिता सारी जमा पूँजी लगाकर वेणु को अमेरिका भेजते हैं. पूरी दुनिया के महत्त्वाकांक्षी युवाओं के सपनों के देश अमेरिका में. तेज दौड़ती दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाने की जद्दोजहद करता वेणु. उसके बाद डॉलर से मध्यवर्गीय परिवार की जरूरतों को पूरा करता वेणु. शादी के बाद अमेरिकी जीवन शैली के प्रति जुनूनी हद तक आकृष्ट पत्नी और परिवार की जरूरतों के बीच संतुलन साधता वेणु. अमेरिका में जन्मे और अमेरिका में पले-बढ़े अपने बच्चों में भारतीय संस्कार रोपने में अक्षम वेणु.
वेणु के माध्यम से लेखिका ने दो संस्कृतियों के भेद को उजागर किया है. विडंबना है कि दो में से आप एक को ही पा सकते हैं. अच्छी जीवन शैली का अमेरिकी जीवन या संबंधों के पारिवारिक-सामाजिक सुखों वाला भारतीय जीवन. वेणु और उसके माता-पिता इसी द्वंद्व में जीते हैं. और यह द्वंद्व वेणु का ही नहीं वरन हर भारतीय का है.
14.05.2026
‘ठाकुरबाड़ी’ अनिमेष मुखर्जी की पहली किताब है. इसमें गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के कुटुंब का वृत्तांत है. किताब में इतिहास को उन्होंने अपनी चिर-परिचित किस्सागोई या कहें कि आख्यान शैली में प्रस्तुत किया है. यह आपको एक उपन्यास का सा आनंद भी दे सकता है. इसमें गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के कुटुंब के वृत्तांत के समानांतर भारत में औपनिवेशिक शासन की स्थापना से लेकर स्वाधीनता आन्दोलन का इतिहास भी गति करता है. साहित्य, संगीत, चित्रकला, भोजन आदि के क्षेत्र में रबीन्द्रनाथ टैगोर के कुटुंब के लोगों के अवदान के बारे में पढ़ा तो मैं दंग रह गया. इतिहास की टेक्स्ट बुक्स में जहाँ हम उनके योगदान को एक-दो पंक्तियों में बस एक तथ्य के रूप में पढ़ते आए हैं, कैसे थे वे लोग. कैसा था उनका बाहरी और भीतरी संघर्ष. कैसे बदला उन्होंने भारतीय जीवन को. ख़ासकर रबीन्द्रनाथ टैगोर के कुटुंब की महिलाओं ने. यह सबकुछ आश्चर्यचकित करने वाला है.
रबीन्द्रनाथ टैगोर के बड़े भाई और भारत के पहले आईसीएस सत्येन्द्रनाथ ने किस तरह अपनी पत्नी ज्ञानदानंदिनी को परिवार से लड़कर नई दुनिया से परिचय कराया. इन्हीं ज्ञानदा ने फिर ठाकुरबाड़ी में फेमिनिज्म का झंडा लहराया और दूसरी बहु-बेटियों में इसके बीज रोपे. सास-सुसर नाराज हुए तो किराए का अलग मकान लेकर रहने लगी लेकिन परिवार से संपर्क बनाए रखा. जॉइंट फैमिली से अलग होकर न्यूक्लियर फैमिली का भी यह अनूठा उदाहरण हैं. इसके बावजूद ज्ञानदा ने न केवल परिवार से संपर्क बनाए रखा बल्कि पूर्ण सहयोग दिया, अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया. इन्हीं ज्ञानदा ने भारतीय महिलाओं में साड़ी के साथ ब्लाउज का चलन चलाया. उलटे पल्लू की साड़ी पहनने का रिवाज शुरू किया ताकि दायाँ हाथ काम करने के लिए फ्री रह सके. केक काटकर परिवार के सभी छोटे-बड़ों के बर्थ डे सेलिब्रेट करना शुरू किया. शाम के चार-पाँच बजे साहित्य-संगीत और दूसरे विषयों पर चर्चा के लिए ‘चाय-पे-चर्चा’ की शुरुआत की जिसमें घर की महिलाएँ भी भाग लेने लगीं. इन चर्चाओं में बाहर के पारिवारिक पुरुष-मित्र भी भाग लेते थे. इससे पहले ठाकुरबाड़ी की महिलाएँ बाहर के पुरुषों से बात नहीं कर सकती थीं. बात तो दूर वे घर से बाहर भी नहीं निकल सकती थीं. वे असूर्यम्पश्या कहलाती थीं अर्थात् सूरज नहीं देख सकती थीं. ज्यादा से ज्यादा पालकी में बैठकर गंगा स्नान जा सकती थीं जहाँ वे पालकी सहित डुबकी लगाकर लौट आती थीं. ज्ञानदा ने कुटुंब की महिलाओं को इन बेड़ियों से मुक्त कराया. ज्ञानदा ने बाल-साहित्य रचा. पत्रिका का संपादन किया. अकेले लंदन की यात्रा की. थियेटर में अभिनेत्री के रूप में काम किया. पाककला में भी वे कुशल थीं. मल्लब हर वह काम जिसकी तत्कालीन समाज में वर्जना थी ज्ञानदा ने किया. देहाती परिवेश से आई रबीन्द्रनाथ की पत्नी (बालिका वधू) को परिवार की बौद्धिक विरासत के अनुकूल ग्रूमिंग की.
रबीन्द्रनाथ की दूसरी भाभी (और बाल्यसखी भी) कादंबिनी उनकी रचनाओं की पहली पाठक और आलोचक थी. रबी को कविगुरु रबीन्द्रनाथ बनाने में उनकी बड़ी भूमिका रही. रबीन्द्रनाथ की बहन स्वर्ण कुमारी ने कई उपन्यास लिखे. वे बेस्टसेलर लेखिका थीं. उनके उपन्यास कई भाषाओं में अनूदित हुए. स्वर्ण कुमारी ने बांग्ला का पहला ऑपेरा ‘बसंत उत्सव’ लिखा. कादंबिनी गांगुली और पंडिता रमाबाई उनकी सहेलियाँ थीं. ख़ुद रबीन्द्रनाथ ने बोर्नविटा, गोदरेज साबुन, लिप्टन चाय जैसे उत्पादों की मॉडलिंग की. रबीन्द्रनाथ की भतीजी प्रज्ञासुंदरी ने ‘आमिष ओ निरामिष’ नाम से रेसिपी बुक लिखी. वे भारतीय भोजन में मेन्यु का कॉन्सेप्ट लेकर आईं.
ज्ञानदा से लेकर शर्मिला टैगोर तक इस वंश परंपरा में एक से बढ़कर एक महिलाएँ हुईं जिन्होंने इस देश की जीवनशैली में क्रांतिकारी बदलाव किए, रूढ़ियों को तोड़ा. बदलाव की बयार लेकर आईं.
नई पीढ़ी के बच्चों को अपने सच्चे इतिहास से रूबरू कराने के लिए यह एक जरूरी और रोचक किताब है.
16.05.2026
संबंधों की शिक्षा यूँ तो हम परिवार से ही सीखते हैं. थोड़ा बहुत मैंने सीखा भी. बिल्कुल सिरे से तो इंकार नहीं कर सकता लेकिन ज्यादा मैंने किताबों से ही सीखा-समझा. माँ-पत्नी का खयाल रखना हो या उनकी घरेलू कामों में मदद करनी हो... सब किताबों के पात्रों से ही सीखा. प्यार भी और दोस्ती भी. संबंधों की बेहतरी के लिए सॉरी और थैंक यू कहना भी. कुछ चीजें फ़िल्मों से भी सीखीं. साहित्य में मुझे आत्मकथाएँ और यात्रा-वृत्त पसंद आते हैं. इसी तरह संस्मरण और डायरियाँ भी. विनीत की ‘बैचलर्स किचन’ पढ़कर विनीत की अपनी माँ मनोरमा से बॉन्डिंग के बारे में पढ़ा तो रश्क हुआ. हालाँकि किताब के हिसाब से शुरूआती सौ-सवा सौ पृष्ठों में मनोरमा पुराण का ओवरडोज़ खलता है. किताब के अंत में लेखक की जापान यात्रा सबसे सुंदर प्रसंग लगा. बकौल लेखक “जापान के लोग बिना फोन के जीवन जीते हैं. अस्सी-पचासी साल की उम्र के दिखते स्त्री-पुरुष किताबें पढ़ते नज़र आए. सार्वजनिक स्थलों पर एक भी शख़्स फोन पर बात करते हुए नहीं देखा. संवाद एवं संपर्क का, उनके बीच पारंपरिक तरीका अभी भी ज़िंदा नज़र आया.” यह अपने तरीके की अनूठी किताब है. विनीत की ‘मीडिया का लोकतंत्र’ भी मेरी विश लिस्ट में है.
17.05.2026
इन दिनों पॉडकास्ट की धूम है. यू-ट्यूब पर कई सारे पॉडकास्ट सुनता हूँ. नीलेश मिसरा के ‘स्लो इंटरव्यू’ के अधिकतर इंटरव्यू सुने. अंजुम के ‘संगत’ के भी. शुरुआत लल्लन टॉप के गेस्ट इन द न्यूज़रूम से हुई थी. सौरभ अब इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी चैनल में हैं. उनकी टीम के अधिकांश सदस्य भी अब लल्लन टॉप को अलविदा कह चुके हैं. सौरभ के लल्लन टॉप छोड़ने के बाद मैंने टॉप का कोई वीडियो नहीं देखा. ये सब डेढ़ से दो ढाई घंटे के इंटरव्यू होते हैं.
जनगणना-2027 हेतु पिछले दिनों जयपुर ओटीएस में चार दिनों का प्रशिक्षण लिया. वहाँ ‘वयस्क कैसे सीखते हैं?’ पर एक लेक्चर था. साथ ही प्रशिक्षक को कैसा होना चाहिए, यह भी सिखाया गया. पहले मैं बार-बार समझाने के बाद भी बुनियादी सवाल पूछे जाने पर या बेवकूफ़ी भरे सवाल पूछे जाने पर इरिटेट हो जाता था, अब इस ट्रेनिंग के बाद मुझमें थोड़ा धैर्य और बढ़ा है. थोड़ा चुनौतीपूर्ण काम है लेकिन मैंने हाँ कर दिया था. साल के आठ महीने परीक्षाओं के बोरिंग शेड्यूल से मुक्ति की चाह में.
18.05.2026
आदमी अब मैं, मेरा/मेरी पति/पत्नी और मेरे बच्चे तक सीमित होता जा रहा है. आप चाहकर भी एकमेक होना चाहें तो वे आपको आपकी सीमा बता देंगे या लगातार इस तरह का बर्ताव करेंगे कि आप सोचेंगे कि मैं ही क्यों संबंध निबाहने को, परिवार बचाने को इतना आतुर हूँ जब सामने वाला चाह ही नहीं रहा. ऐसे में परिवार की जगह आप दोस्तों से भरने लगते हैं. दोस्त भी परिवार ही हैं. मैं इनकार नहीं कर रहा. लेकिन परिवार भी हो, दोस्त भी हों, दोनों हों तो कितना आनंद आए? फिर दोस्तों को परिवार की जगह लेने को भी परिवार प्रश्नांकित करता है. ये खाई थोड़ी और चौड़ी हो जाती है.
22.05.2026
ओशो का कहना है कि जो व्यक्ति माता-पिता से प्रेम करता है उसे ही मैं मनुष्य कहता हूँ. अपनी संतान से तो सभी प्रेम करते हैं लेकिन जो माता-पिता से प्रेम करे वही मनुष्य कहलाने का अधिकारी है. अपनी संतान से प्रेम तो बायलॉजिकल है. माता-पिता से प्रेम चेतना की ऊँचाई को दिखाता है.
अपने चारों और देखता हूँ तो मुझे तो ऐसे लोग कम ही दिखलाई पड़ते है. अपनी संतान के तो हम सारे गुनाह माफ़ कर देते हैं. जैसा भी हो उसे झेलते हैं, वहीं माता-पिता के ऐब हमें दिखाई देते हैं. कुछ तो यहाँ तक कह देते हैं कि आपने हमारे लिए किया ही क्या है? जन्म देकर कोई अहसान कर दिया क्या? जन्म तो सूअर-कुत्ते भी देते हैं.
माना कि उन्होंने हमारे लिए अधिक न किया हो, अच्छी शिक्षा, पोषण और संपत्ति न दे पाए हों लेकिन जन्म देने के बाद पाल-पोष कर बड़ा तो कर ही दिया. जीने लायक तो बना ही दिया. यही तो चेतना की ऊँचाई है कि जिसने हमारे लिए अधिक न किया हो उसके लिए भी हम प्रेमपूर्ण होंवे. “वही मनुष्य है जो मनुष्य के लिए मरे.”
24.05.2026
विश्व मधुमक्खी दिवस 20 मई को मनाया जाता है. मधुमक्खी पालन में अग्रणी योगदान के लिए एंटोन जान्शा के जन्मदिन को संयुक्त राष्ट्र ने विश्व मधुमक्खी दिवस घोषित किया. उनका जन्म 20 मई, 1734 को स्लोवेनिया के एक गरीब मधुमक्खी पालक परिवार में हुआ. उन्होंने मधुमक्खी पालन के पारंपरिक तरीकों को बदलकर वैज्ञानिक तरीके विकसित किए. इस पर हिन्दवी (रेख्ता) का एक कविता पोस्टर फेसबुक पर देखने को मिला. उसमें कानेको मिसुजु की कविता थी-
फूल रहता है बगीचे में
बागीचा रहता है चहारदीवारी में
चहारदीवारी रहती है शहर में
शहर रहता है जापान में
जापान रहता है संसार में
संसार रहता है देवता में
और फिर
देवता रहता है
छोटी सी मधुमक्खी में”
25.05.2026
कुछ पंक्तियाँ, कुछ जीवनोपयोगी सूत्र और कुछ कविताएँ:
वस्तुएँ
खुश हैं न उदास
सिर्फ़ वे बढ़ती जा रही हैं. – केदारनाथ सिंह
भीगी हुई इक शाम की दहलीज़ पे बैठे
हम दिल के सुलगाने का सबब सोच रहे हैं. –- शकेब जलाली
वफ़ा तुमसे करेंगे
दुःख सहेंगे, नाज़ उठाएँगे
जिसे आता है दिल देना
उसे हर काम आता है. –- आरज़ू लखनवी
पुलिस बची है
दिल्ली में
उम्मीद नहीं बची. –राजेश जोशी
इश्क़ कुन वक्त ज़ाया मकुन. –- बाबुषा कोहली
28.05.2026
नौतपा में भी गिलोय की बेल लकदक हो रही है. कनेर अब फूलने लगा है. कनेर और गिलोय में गेट के दायीं ओर साथ-साथ जमीन पर लगे हैं. कनेर के साथ गिलोय को भी भरपूर पानी मिल रहा है. इसे आयुर्वेद में अमृता कहा गया है. पिछली गर्मियों में बिल्कुल सूख गई थी, फिर चौमासे में हरी हो गई. इस बार गर्मियों में भी सावन सी हरी है. मम्मी जब भी आती है, कुछ गमले इधर-उधर कर जाती है. अपराजिता को छाया से निकाल कर गिलोय के यहाँ धूप में रख गई. दो दिन में अपराजिता सूख गई. फिर मैंने उसे फिर से छाया में रखा. संगिनी बोली- ये तो गई. लेकिन हम देखते हैं कि तीन-चार दिन बाद चार-पाँच फीट की ऊँचाई तक जा चुकी अपराजिता के ऊपर के पत्ते तो झड़ गए लेकिन नीचे से फिर हरा गई. मैंने कहा कि देखो, यूँ ही नहीं इसका नाम अपराजिता पड़ा. तुलसी अभी तक बची हुई है. पिछली गर्मियों में लू के थपेड़ों से बच नहीं पाई थी. सदाबहार को रोज पानी चाहिए. पत्थरचट्टा और ग्वारपाठा कम पानी में भी सर्वाइव कर लेते हैं. स्नेक प्लांट भी दो गमलों में लगा है और जस का तस है. अलबत्ता मनी प्लांट इस बार खूब सब्ज है. ऊपर बालकनी में कमरे के दरवाजे के दोनों ओर दो गमले मनी प्लांट के रखे हैं. दोनों ने मिलकर उसे तोरणद्वार से सजा रखा है. नीचे गिलोय की दो शाखाएँ इस तरह से ऊपर चढ़ी हुई हैं मानो अतिथियों के स्वागत के लिए हार बनाया हो. अतिथि यानी जिसके आने की तिथि ज्ञात न हो. अब अतिथि नहीं आते. जो आते हैं पहले से बाकायदा सूचना देकर आते हैं. गर कोई बिना सूचना आ भी जाए तो संभवतः उसका वैसा स्वागत न हो. बल्कि आतिथेय अधिकांशतः हर्ष का अनुभव न करें. क्योंकि हम सब इतने व्यस्त हैं. हमारी व्यस्तता में थोड़ा भी व्यवधान आया नहीं कि हम परेशां हो उठते हैं. अब बुआएँ गर्मियों की छुट्टियों में कहाँ आ पाती हैं. बच्चे कहाँ नानी के जा पा रहे हैं, उनके समर कैम्प हैं, हॉबी क्लासेज हैं, स्कूल के प्रोजेक्ट और होमवर्क हैं. जिन घरों में बुआएँ गर्मी की छुट्टियों में आ रही हैं वे भाग्यशाली हैं. जो बच्चे नानी के जा रहे हैं वे भाग्य के बली हैं. जो ननद-भाभी आपस में ये तय कर रही हैं कि पहले आप जाओ फिर मैं भी अपने मायके जाऊँगी, उनकी किस्मत का क्या कहिए.
29.05.2026
बशीर बद्र साहब दुनिया को अलविदा कह गए. कई मानीखेज़ शे’र आपने कहे हैं. अभी एक याद आ रहा है-
बहुत तलाश किया कोई आदमी नहीं मिला”
कार्टून, कविताएँ और कॉमेडी मिलकर प्रतिपक्ष रच रहे हैं. जो यह बताता है कि हम ज़िन्दा हैं. पिछले दिनों डायर के व्हाट्सअप स्टेटस पर ऐसा ही कुछ था- “लीडर का काम होता है चुनौतियों के समय लीड करना, लीद करना नहीं”.

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