शोध आलेख : विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में इको-फेमिनिज्म / हेमा विश्वकर्मा

विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में इको-फेमिनिज्म
- हेमा विश्वकर्मा

शोध सार : समकालीन हिन्दी कविता में विनोद कुमार शुक्ल एक ऐसे रचनाकार हैं, जो भाषा की सादगी और विचारों की दार्शनिकता के लिए जाने जाते हैं। इको-फेमिनिज्म अध्ययन के संदर्भ में विनोद कुमार शुक्ल की स्त्री और प्रकृति संबंधी कविता को प्रमुखता से देखा गया है। इको-फेमिनिज्म (पारिस्थितिक नारीवाद), ‘नारीवादी’ चिंतन का ही एक रूप है जो स्त्री के दमन और प्रकृति के दोहन के बीच अंतर्संबंधों को स्थापित करता है। विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में इको- फेमिनिज्म प्रखर वैचारिक रूप में न आकर प्रतीकों, बिंबों और संवेदना के रूप में मौजूद है। स्त्री और प्रकृति दोनों को उपयोग की वस्तु मानकर उसकी क्षति की जाती रही है, जो शुक्ल की कविताओं में स्त्री की असुरक्षा के साथ प्रकृति की असुरक्षा, मौन विद्रोह और साझा शोषण का अनुभव चित्रित है। इसलिए विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं प्रकृति वर्णन या केवल स्त्री विमर्श की बात नहीं करती बल्कि बाजारवादी सभ्यता में शहरीकरण के कारण उत्पन्न उस संकट को भी उजागर करता है, जिसमें प्रकृति और स्त्री दोनों एक साथ प्रभावित हुए हैं।

बीज शब्द : समकालीन हिन्दी कविता, इको-फेमिनिज्म, उत्पीड़न, आधुनिक विकास, मौन विद्रोह, नियंत्रण, असुरक्षा, आर्थिक निर्भरता, साझा शोषण, बाजारवादी सभ्यता, शहरीकरण।

मूल आलेख : इको-फेमिनिज्म वर्तमान समय में एक सिद्धांत बनकर साहित्य और समाज में उभरा है। इको-फेमिनिज्म प्रमुख रूप से पाश्चात्य से आई हुई विचारधारा है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है- ईकोलॉजी और फेमिनिज्म, ईकोलॉजी यानि पर्यावरण या प्रकृति और फेमिनिज़्म का अर्थ नारीवाद या स्त्रीवाद से है। वस्तुतः इन शब्दों का प्रमुख रूप से प्रथम प्रयोग फ्रांसीसी चिंतक फ़्रांसवा द’ ओबेन ने 1974 में किया था। बाद के दिनों में मारिया मीस, कैरोलीन मर्चेन्ट, वंदना शिवा आदि विचारकों ने इसे विस्तार दिया। वस्तुतः हिन्दी साहित्य जगत में इको-फेमिनिज्म किसी आंदोलन के रूप में न आकर इसकी अवधारणा का विस्तार स्त्री विमर्श और पर्यावरण विमर्श के साथ-साथ हुआ। इको फेमिनिज़्म ‘नारीवादी’ विचार का ही एक विशेष रूप है, जो स्त्री और प्रकृति के अंतर्गत उपस्थित अंतर्संबंधों की जांच करती है। डॉ. निधि उप्रेती के अनुसार- “इको-फेमिनिज्म का मूल तर्क यह है कि स्त्री और प्रकृति दोनों के शोषण का आधार एक ही सत्ता-संरचना है। जिस प्रकार प्रकृति को मानव-केंद्रित विकास की अवधारणा के अंतगर्त संसाधन मानकर उसका दोहन किया गया है, उसी प्रकार स्त्री को भी सामाजिक संरचनाओं में नियंत्रित और अधीनस्थ बनाकर देखा गया है।“[1] साथ ही कैरेन जे. वारेन के अनुसार- “स्त्री और प्रकृति के मध्य स्थापित अधीनस्थ संबंध किसी प्राकृतिक व्यवस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता-संरचनाओं द्वारा निर्मित हैं।“[2] अतः उपयुक्त विचारों से स्पष्ट होता है कि स्त्री और प्रकृति दोनों का शोषण एक ही तरह की सामाजिक व्यवस्था के कारण होता है। स्त्री को शोषण और पर्यावरण को विनाश होने से बचाना है तो इस पितृसत्तात्मक व्यवस्था और सोच में परिवर्तन लाना आवश्यक है। समकालीन हिन्दी कविता में विनोद कुमार शुक्ल के काव्य संसार को देखें तो उसमें एक तरह की सरलता, सादगी और संवेदना उपस्थित मिलती है। उनकी कविताओं में निरंतर रूप से घर, स्मृति, प्रकृति, स्त्री, चिड़िया, जंगल, पृथ्वी जैसे बिंब निरंतर आते हैं। पहली बार में उनकी कविता बड़ी शांत दिखाई देती है, लेकिन ध्यान देने पर उनमें आधुनिक विकास मॉडल, भूमंडलीकरण, बाजारवाद और से उत्पन्न हिंसा और संकट के विरुद्ध मौन विद्रोह दिखाई देता है। परमानन्द श्रीवास्तव शुक्ल की कविताओं के बारे में लिखते हैं- “मानवीय आहट को सुनने की लगातार कोशिश ही विनोद कुमार शुक्ल की कविता को हमारे कठिन समय के लिए, हादसों से भरे कठिन समय के लिए, अधिक सार्थक, जरूरी और विश्वसनीय बनाती है।”[3] विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में इको-फेमिनिज़्म (पारिस्थितिक नारीवाद) प्रत्यक्ष किसी सिद्धांत या विचारधारा के रूप में न आकर बिंबों, प्रतीकों और संवेदनात्मक माध्यम से उपस्थित दिखाई देता है।

विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं एक प्रकार से संवेदनात्मक संसार रचती हुई दिखती है। ‘लड़की हरे-भरे पेड़ देखती है’ कविता में कवि स्त्री और प्रकृति के संबंध को अत्यंत सूक्ष्म संवदेना के साथ उनके जीवन, स्वतंत्रता आदि को भी प्रस्तुत करते हैं-

लड़की हरे-भरे पेड़ देखती है
तो उसे आकाश दिख जाता है।
ऊँचे-ऊँचे मिले-जुले मकान देखती है
तो आकाश दिख जाता है।[4]

इस तरह लड़की जब भी हरे- भरे पेड़ देखती है तो उसे आकाश दिखता है। यहाँ पर पेड़ प्रकृति का प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि अनेकों संभावनाओं और स्वतंत्रता का संकेत है। इस आधुनिक चकाचौंध के शहरी जीवन, ऊँचे-ऊँचे मकानों और उनकी बंद खिड़कियों के बीच लड़की का आकाश देखना उसकी मुक्ति की आकांक्षा को अभिव्यक्त करता है। साथ ही यहाँ आकाश स्त्री के दासता रहित जीवन और मुक्त चेतना का प्रतीक भी बन जाता है।

विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं स्त्री और प्रकृति को मात्र एक सामाजिक इकाई या दृश्य के रूप में चित्रित नहीं करते बल्कि दोनों को एक-दूसरे के अस्तित्व के पूरक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जहां घर की चारदीवारी और बाहर के जंगल के बीच की दूरी मिट जाती है। ‘तुम खड़ी क्यों हो’ कविता में स्त्री का ‘चलना’ उसकी स्वतंत्र इच्छा-आकांक्षा और स्वायत्तता का प्रतीक बन जाता है। पहाड़ केवल प्राकृतिक तत्व भर नहीं है, अपितु स्त्री की भावबोध और अस्तित्व का सहयात्री बन जाता है। कवि लिखते हैं-

‘तुम खड़ी क्यों हो
बैठ जाओ।’
‘नहीं अब मैं चलूँगी।’
यह सुनते ही
जाने को कब से उद्धत यह पहाड़ है
जिसकी चोटी पर
एक घर मंदिर है
और एक देवी स्त्री।
वह जा रही मूर्ति थी।
वह पत्थर की तरह कठोर नहीं थी।
उसके चले जाने के समय से
जाने को उद्धत यह पहाड़
किसी एक दिन से
उसके आने की प्रतीक्षा में
उद्धत पहाड़ है।[5]

इस प्रकार कविता में आधुनिक समाज में उपस्थित पितृसत्ता संरचनाओं के सोच का मौन प्रतिरोध दिखता है। जो स्त्री को मात्र पत्थर की मूर्ति और प्रकृति को मात्र वस्तु के रूप में देखती है। इस प्रकार कवि ने स्त्री के साथ-साथ प्रकृति को भी भावनात्मक रूप में दिखाया है जो उसके सजीव होने का प्रमाण है।

वर्तमान समय में स्त्री और प्रकृति का संकट दोनों समकालीन समाज के मुख्य विमर्शों में उपस्थित है। पितृसत्ता और उपभोक्तावादी संस्कृति ने स्त्री को प्रायः उपभोग की वस्तु के रूप में सीमित कर दिया है, जो उसकी इच्छाओं, आकांक्षाओं एवं उसकी स्वतंत्र अस्तित्व को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। जिस कारण स्त्रियों के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा वैचारिक स्वतंत्रता निरंतर संकुचित होती दिखाई देती है। निरंतर जंगलों की कटाई, पहाड़-पर्वतों का विनाश और प्रकृति के संसाधनों का अंधाधुंध दोहन तथाकथित कहे जाने वाले विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बन चुके हैं। समकालीन विकासवादी परियोजनाओं के परिणामस्वरूप अरावली सहित अनेकों प्राकृतिक क्षेत्रों का निरंतर विनाश आधुनिक उपभोक्तावादी विकास-दृष्टि का उदाहरण प्रस्तुत करता है। आधुनिक विकास मॉडल प्रकृति को मात्र संसाधन के रूप में देखता है, जिसके फलस्वरूप पर्यावरण में निरंतर संतुलन प्रभावित हो रहा है। जो ‘उछलती-कूदती’ कविता में देख सकते हैं-

उछलती-कूदती आई लड़की को
फ्रॉक छोड़कर साड़ी पहनने के लिए कहा गया
तो वह दौड़ते हुए लगातार आड़ में होने लगी
पहले एक पेड़ की आड़ हुई
तो पेड़ कट गया
जंगल की आड़ हुई तो
जंगल कट गया।[6]

यहाँ ‘पेड़’ और ‘जंगल’ केवल प्राकृतिक संरचनाएँ नहीं हैं, बल्कि सुरक्षा, आश्रय और स्वतंत्रता के प्रतीक भी हैं। साथ ही जैसे-जैसे पेड़ और जंगल नष्ट होते हैं, वैसे-वैसे स्त्री की सुरक्षा और स्वतंत्रता का भी क्षरण होता है। इस प्रकार कविता यह संकेत करती है कि प्रकृति का विनाश और स्त्री का शोषण एक ही विकासवादी और पितृसत्तात्मक मानसिकता की उपज हैं।

इसी क्रम में विनोद कुमार शुक्ल स्त्री की सामाजिक सीमाओं और आर्थिक निर्भरता को ही केवल नहीं दिखाते, अपितु सार्वजनिक जीवन में उसकी असुरक्षा तथा उस पर समाज की घिनौनी दृष्टि को भी उजागर करते हैं। इस प्रकार ‘काम पर जाती हुई औरत’ कविता में कवि नौकरीपेशा स्त्री के साधारण जीवन के भीतरी स्तर पर छिपे भय, असुरक्षा साथ ही पितृसत्तात्मक मानसिकता को अत्यंत सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत करते हैं। कवि अपनी कविता में लिखते हैं-

काम पर जाती हुई औरत
इतनी सामान्य कि औरत कम
औरत का दृश्य ज्यादा
मेरे देखते कम
सोचते ज्यादा दृश्य में
उस औरत के पीछे-पीछे जाने के लिए
एक लड़का लोहे के कँटीले तार को
रोता हुआ फाँद गया
दूसरा तार के नीचे अधनंगा निकल गया।[7]

इस तरह काम पर जाती हुई वह औरत अपने साथ-साथ, पूरे स्त्री समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जो घर की चारदीवारों से निकल अपनी सीमाओं को तोड़कर स्वावलंबी बनने का प्रयास करती है। परंतु यह समाज को स्वीकार्य नहीं होता। यहाँ ‘कँटीले तार’ स्त्री के रास्ते में आने वाले रुकावट, सामाजिक बाधाओं, डर और नियंत्रण का प्रतीक बनकर उभरा है। अतः स्त्री और प्रकृति दोनों ही मानव-निर्मित सीमाओं एवं नियंत्रण को स्वीकार नहीं करतीं।

बाजारवादी व्यवस्था के प्रभाव के कारण वस्तुओं के साथ-साथ स्त्री और प्रकृति का भी उपयोगितावादी मूल्यांकन बढ़ा है। स्त्रियों को आर्थिक रूप से परावलंबित बनाया जाता है। समाज कभी परंपरा के नाम पर कभी नियमों के नाम पर कभी धर्म और संस्कृति के नाम पर उसकी सीमाओं को सीमित करने की कोशिश करता आया है। वस्तुतः स्त्री विमर्श को देखें तो वह केवल स्त्री की सम्मान या सामाजिक स्वतंत्रता की बात नहीं करता अपितु उसके आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की भी बात करता है। विनोद कुमार शुक्ल ‘ये अबला हैं’ कविता में स्त्री के सामाजिक और आर्थिक रूप को प्रतीकों द्वारा सरल भाषा में चित्रित करते हैं। कविता में कवि लिखते हैं-

ये अबला हैं और दूसरों पर आश्रित भी
इसलिए नहीं कि ये साड़ियाँ पहनती हैं
इसलिए कि इनकी साड़ियों में जेब नहीं होते
जो कमीज, कोट और पतलूनों में होते हैं
ये आश्रित और अबला न हों
इसलिए देख तो रहा हूँ
इनकी साड़ियों में जेब ही जेब
पर अफसोस!
इनकी जेबों को लिपिस्टक, पाउडर और
आईनों से भरे देखा
काश ये अबला न होतीं।[8]

इस प्रकार स्त्री की आर्थिक पराधीनता का प्रश्न "ये अबला हैं" कविता में अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक 'जेब' के माध्यम से व्यक्त हुआ है। यहाँ ‘जेब’ आर्थिक निर्भरता, आत्मनिर्भरता और अधिकार की पहचान के प्रतीक के रूप में मौजूद है। पुरुषों के कपड़े में जेब होना उनकी आर्थिक स्वतंत्रता और निर्णय लेने की सक्षमता को दिखाता है। आधुनिक उपभोक्तावादी समाज ने स्त्रियों को मात्र एक वस्तु और सजावट का समान बनाकर रख दिया है, लड़कियों की जेबों में लिपस्टिक, पाउडर और आईनों से भरा होना इस बात का प्रमाण है कि स्त्री को स्वतंत्र रूप में नहीं बल्कि प्रदर्शन रूप में ये समाज देखता रहा है। इस तरह यह कविता स्त्री-विमर्श और इको-फेमिनिज्म दोनों के केंद्रीय प्रश्न सत्ता, नियंत्रण तथा स्वायत्तता को एक साथ सामने लाती है।

विनोद कुमार शुक्ल आदिवासी जीवन को प्रकृति के सबसे निकट मानते हैं। जो प्रकृति को मात्र उपयोग की वस्तु न मानकर अपने होने की अपने जीने की और अपने परिवार की तरह देखते हैं। उनकी कविताओं में देख सकते हैं, आदिवासियों को जंगलों से डर नहीं लगता बल्कि उस समाज से डर लगता है, जहां आधुनिकता की चोली पहन शोषण को अस्त्र बनाया जाता है। ‘जंगल के दिन भर के सन्नाटे में’ लिखते हैं-

एक अकेली आदिवासी लड़की को
घने जंगल जाते हुए डर नहीं लगता
बाघ-शेर से डर नहीं लगता
पर महुवा लेकर गीदम के बाजार जाने से
डर लगता है।[9]

यहाँ आदिवासी स्त्री को ‘डर’ उस जंगलनुमा रास्ते का नहीं है, अपितु उस शोषणकारी समाज का है, जहां उसे असुरक्षित महसूस कराया जाता है। जंगल उसका घर मात्र न होकर उसकी सुरक्षा कवच है। अतः इस कविता में 'बाजार' पूँजीवादी तथा पितृसत्तात्मक सत्ता-संरचना के रूपक के रूप में उपस्थित होता है।

प्रकृति के विनाश का प्रश्न शुक्ल की अनेक कविताओं में निरंतर उपस्थित हुआ है। कवि ने जंगलों के विनाश के साथ शहरीकरण का कुप्रभाव, मनुष्य की संवेदनहीनता को भी उजागर किया है। शुक्ल अपनी कविता ‘पेड़ के ठूँठ’ में लिखते हैं-

कटे हुए पेड़ के ठूँठ
जंगल कटने के कदम हैं।[10]

यहाँ ‘पेड़ का ठूँठ’ कटे हुए पेड़ों का अवशेष मात्र नहीं है बल्कि प्रकृति के विनाश और घोर शोषण का प्रमाण भी है। यथा एक पेड़ का कटना मात्र एक वृक्ष का समाप्त होना केवल नहीं है अपितु पूरे जंगल के विनाश होने का शुरुआती संकेत है। साथ ही किसी पेड़ को काटकर दरवाजा बनाना उसकी जीवंतता को समाप्त कर देना है, जो किसी समय जीवित था, हरा-भरा, पक्षियों का घर, जंगल का हिस्सा था, लेकिन उपभोक्तावादी समाज विकास के नाम पर प्रकृति का दोहन ही करता रहा है। कवि अपनी कविता ‘एक दरवाजा एक पेड़ से बना है’ में लिखते हैं-

एक दरवाजा एक पेड़ से बना है
कुछ इस तरह होता
कि दरवाजा हरा-भरा पेड़ होता
या पेड़ ही यूँ होता
कि दरवाजे में हरी पत्तियाँ होतीं
दरवाजा खुला होता
एक चिड़िया उड़ती होती
जंगल होता।[11]

अतः इस पेड़ का ‘दरवाजा’ बन जाना केवल पेड़ का वस्तुकरण भर नहीं है, बल्कि उसे संसाधन के रूप में अंधाधुंध क्षति पहुंचाने की मानसिकता को भी प्रकट करता है। जहाँ एक पेड़ केवल नहीं बल्कि पूरा का पूरा जंगल ही इस शहरीकरण का शिकार होते जा रहा है। उनकी ‘जंगल में एक पेड़, फिर एक पेड़ कटता है’ कविता में देख सकते हैं-

जंगल में एक पेड़, फिर एक पेड़ कटता है
और शहर चुपचाप जंगल की तरफ
एक कदम फिर एक कदम बढ़ता है।[12]

इस प्रकार देख सकते हैं कि शहर किस तरह धीमे-धीमे जंगलों की ओर बढ़ता हुआ उसे खत्म कर रहा है। ‘शहर’ केवल भौगोलिक स्थान ही नहीं उपभोक्तावादी और पूंजीवादी मानसिकता का प्रतीक बनकर भी उभरा है। अतः शुक्ल पेड़ का वस्तुकरण तक ही चित्रित नहीं करते हैं बल्कि आधुनिक विकास के नाम पर शहरीकरण और विकासवादी मानसिकता से उत्पन्न हिंसक प्रवृत्ति को भी प्रकट करते हैं।

इन समस्त कविताओं में विनोद कुमार शुक्ल की भाषा अत्यंत सहज, साधारण बोलचाल के निकट और प्रतीकात्मक है। वे कठिन शब्दों के स्थान पर अपने लोक से ही शब्दों का प्रयोग करते हैं। भाषा कृत्रिम न होकर मानवीय अनुभवों की सहज अभिव्यक्ति दिखाई देती है। शुक्ल के काव्य-शिल्प की बड़ी विशेषता उनके प्रतीक और बिम्ब हैं। जिससे वे साधारण वस्तुओं एवं घटनाओं के माध्यम से गहरे अर्थों की अभिव्यक्ति करते हैं। ‘लड़की की इच्छा है’ कविता में उनकी भाषा और शिल्प का सुंदर उदाहरण दिखाई देता है-

लड़की की इच्छा है
नदी बहुत बड़ी होती है।
नदी का एक बूँद पानी
बूँद- भर नदी
बूँद- भर गहरी
बूँद- भर बही।[13]

इस प्रकार कवि ने बड़ी ही सूक्ष्मता से बिंबों का प्रयोग किया है। ‘नदी’, ‘बूँद-भर नदी’, ‘बूँद-भर गहरी’, तथा ‘बूँद-भर बही’ जैसे बिंब यहाँ स्त्री मन की गहराई, कोमलता, उसकी स्वतंत्रता चेतना और जीवन-ऊर्जा का प्रतीक है। जो साधारण शब्दों से असाधारण अर्थ प्रस्तुत करता है। यथा यही काव्य-शिल्प शुक्ल की कविताओं को इको-फेमिनिज़्म दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाता है, क्योंकि वे प्रत्यक्ष वैचारिक घोषणाओं के बजाय संवेदना के माध्यम से प्रतिरोध की भाषा रचते हैं।

निष्कर्ष : विनोद कुमार शुक्ल की कविताओं में इको-फेमिनिज़्म प्रत्यक्ष वैचारिक घोषणाओं के रूप में नहीं है बल्कि प्रतीकों, बिंबों, काव्य-संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। उनकी कविताएं स्त्री और प्रकृति दोनों को समान संवेदनात्मक धरातल और जीवन-सत्ता में रखकर देखते हैं। यही कारण है कि उनकी कविताओं में स्त्री और प्रकृति दोनों के प्रति समान संवेदनशीलता रूप दिखाई देता है। वे आधुनिक विकास, उपभोक्तावादी व्यवस्था, शहरीकरण और बाजारवाद की उस मानसिकता पर प्रश्न उठाते हैं, जो स्त्री और प्रकृति दोनों को उपभोग और उपयोग की वस्तु में बदल देता है। “उछलती-कूदती”, “ये अबला हैं”, “पेड़ के ठूँठ”, “एक दरवाजा एक पेड़ से बना है” और “जंगल के दिन भर के सन्नाटे में” जैसी कविताओं में स्त्री की असुरक्षा, आर्थिक निर्भरता, प्रकृति विनाश तथा साझा उत्पीड़न का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं स्त्री विमर्श एवं प्रकृति विमर्श के बीच एक सशक्त वैचारिक पुल का निर्माण करता है। उनकी कविताओं में प्रयोग होने वाले पेड़, नदी, जंगल, आकाश, घर, पक्षी, लड़की जैसे बिंब केवल काव्य की सुंदरता बढ़ाने के उपकरण केवल नहीं है बल्कि स्वतंत्रता, समानता, सह-अस्तित्व और जीवन के गहरे मानवीय प्रतीक हैं। इस तरह विनोद कुमार शुक्ल की कविताएं स्त्री की मुक्ति और प्रकृति के संरक्षण अभिन्न प्रश्न हैं। अतः विकास की वर्तमान उपभोगतावादी और पितृसत्तात्मक अवधारणाओं का पुनर्मूल्यांकन जब तक नहीं किया जाएगा, तब तक न ही स्त्री की वास्तविक स्वतंत्रता संभव है और न ही पर्यावरणीय संतुलन की पुनर्स्थापना। इस प्रकार विनोद कुमार शुक्ल की इको-फेमिनिज़्म संबंधित काव्य अध्ययन वर्तमान पर्यावरणीय और सामाजिक विमर्शों को नई वैचारिक दिशा प्रदान करता है।

संदर्भ :
1. उप्रेती, निधि। "हिन्दी साहित्य में स्त्री और प्रकृति का अन्तर्सम्बन्ध: एक इको-फेमिनिस्ट अध्ययन।" International Journal of Social Science and Humanities, vol. 8, no. 2, 2026, pp. 247–249. https://doi.org/10.66856/ijssh.2026.8.2.8106.
2. वही. पृ. सं. 248
3. परमानन्द श्रीवास्तव, कविता का अर्थात, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2015, पृ.सं. 160
4. विनोद कुमार शुक्ल, वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ.सं. 34
5. विनोद कुमार शुक्ल, अतिरिक्त नहीं, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, 2023, पृ.सं. 76
6. वही, पृ. सं. 107
7. विनोद कुमार शुक्ल, कविता से लंबी कविता, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ.सं. 91
8. विनोद कुमार शुक्ल, केवल जड़े हैं, हिंद युग्म, नोएडा(उ.प्र.), 2025, पृ.सं. 69
9. विनोद कुमार शुक्ल, सब कुछ होना बचा रहेगा, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ.सं. 21
10. विनोद कुमार शुक्ल, एक पूर्व में बहुत से पूर्व, हिंद युग्म, नोएडा(उ.प्र.), 2024, पृ.सं.13
11. विनोद कुमार शुक्ल, केवल जड़े हैं, हिंद युग्म, नोएडा(उ.प्र.), 2025, पृ.सं. 93
12. विनोद कुमार शुक्ल, एक पूर्व में बहुत से पूर्व, हिंद युग्म, नोएडा(उ.प्र.), 2024, पृ.सं. 36
13. विनोद कुमार शुक्ल, वह आदमी नया गरम कोट पहिनकर चला गया विचार की तरह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 2023, पृ.सं. 33

हेमा विश्वकर्मा
शोधार्थी, हिन्दी विभाग, असम विश्वविद्यालय दीफू परिसर, दीफू, कार्बी आंगलोंग, असम

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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