समीक्षा : 'हजारों निशान' : समकालीन हिंदी कविता में शिवांगी गोयल का बेबाक स्त्री-संसार / संतोष विश्नोई

'हजारों निशान' : समकालीन हिंदी कविता में शिवांगी गोयल का बेबाक स्त्री-संसार
- संतोष विश्नोई

पिछले कुछ दशकों में हिंदी कविता के भीतर महिलाओं के लिखने के अंदाज़ में एक बड़ा बदलाव आया है। इसी कड़ी में शिवांगी गोयल का नाम एक ऐसी युवा और संवेदनशील कवयित्री के रूप में सामने आता है, जिनकी कविताएं उनके अपने अनुभवों से शुरू होकर पूरे समाज के सच को बयां करती हैं। उनकी कविताओं की दुनिया महिलाओं के वजूद, इंसानी भावनाओं, सामाजिक न्याय और खुद से जुड़ी लड़ाइयों के इर्दगिर्द घूमती है। वे अपने आस-पास की उलझनों को सिर्फ देखती नहीं हैं, बल्कि उन्हें गहराई से महसूस करके अपनी कविताओं में उतारती हैं। उनकी किताब ‘हजारों निशान’ आज के दौर की हिंदी कविता में एक बेहद ज़रूरी मुकाम रखती है। यह किताब सिर्फ कुछ भावुक कर देने वाली बातें या कोरी कल्पना नहीं है। इसमें एक स्त्री के होने की लड़ाई, हमारे समाज के ताने-बाने, प्यार, घरेलू हिंसा और पुरानी यादों के अनेक कड़वे सच खुलकर सामने आते हैं। इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि ये सिर्फ शिवांगी के निजी अनुभव नहीं हैं, बल्कि यह हमारे समाज की ही एक जीती-जागती तस्वीर है। इस संग्रह की सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें जीवन का हर रंग देखने को मिलता है। इसमें प्यार भी है और परिवार भी।

बिहार के सिवान जिले में 13 जुलाई को जन्मीं शिवांगी पिछले करीब आठ साल से लगातार लिख रही हैं । उनकी कविता यात्रा बहुत आसान नहीं रही। उन्हें अपने परिवार और समाज दोनों के स्तर पर काफी विरोध का सामना करना पड़ा। एक बार उनके पिता ने उनकी लिखी कविताओं के पन्नों को ही आग के हवाले कर दिया था। इस घटना ने उनके कोमल मन को बहुत गहरी चोट पहुँचाई, लेकिन इसी दर्द ने आगे चलकर उनकी कविताओं को और ज्यादा मजबूत और जुझारू बना दिया। उन्होंने अपनी तकलीफों और जज्बातों को दबाने के बजाय, उन्हें अपनी ताकत और विरोध की सबसे बड़ी आवाज़ बना लिया। वे उर्दू शायरी और अशआर में गहरी रुचि रखती हैं, जिसकी हल्की सी झलक और सलीका उनकी हिंदी कविताओं के मिजाज में भी साफ महसूस होता है। 'हजारों निशान' वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनका पहला कविता-संग्रह है। शिवांगी गोयल की कविताओं का सबसे उल्लेखनीय पक्ष उनकी अनुभव-सत्य के प्रति प्रतिबद्धता है। वे न तो संवेदना का अनावश्यक विस्तार करती हैं और न ही प्रतिरोध को नारों में बदलती हैं। उनकी कविताओं में स्त्री अपने समूचे मानवीय अस्तित्व के साथ उपस्थित होती है—वह प्रेम करती है, टूटती है, प्रश्न करती है, असहमति दर्ज करती है और अंततः अपने होने के अधिकार को स्वयं परिभाषित करती है। यही कारण है कि ये कविताएँ किसी एक व्यक्ति की निजी कथा न रहकर हमारे समय की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन जाती हैं। लिखने के तरीके (शिल्प) की बात करें तो शिवांगी की कविताएं किसी बंधे-बंधाए ढर्रे या छंद पर नहीं चलतीं, वे बिल्कुल आज के दौर की आज़ाद कविताएं हैं। उनकी भाषा इतनी सरल और बोलचाल जैसी है कि कोई भी इसे आसानी से समझ सकता है। उन्हें अपनी बात की सच्चाई और अनुभव की ताकत पर पूरा भरोसा है। यही वजह है कि उनकी कविताएं पढ़ते ही पाठक के दिल में उतर जाती हैं। उनकी भाषा में जितनी गहरी भावनाएं हैं, सोच उतनी ही साफ है। आज के बदलते समाज में महिलाएं जिस तरह अपनी सोच और पहचान बना रही हैं, उसे गहराई से समझने के लिए शिवांगी की कविताओं को पढ़ा जाना बेहद जरूरी है। प्रस्तुत समीक्षा इसी दृष्टि से 'हजारों निशान' के काव्य-संसार में प्रवेश करने का एक विनम्र प्रयास है।

इस सग्रह की सबसे पहली कविता है ‘कविता का इतिहास बचाओ’। जब कोई नया रचनाकार लिखना शुरू करता है, आलोचक उसे तराशने या समझने के बजाय उसकी हिम्मत तोड़ने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। शिवांगी के साथ भी ऐसा ही हुआ इसलिए वे कविता की शुरुआत ‘मेरे मन के सम्बल के हत्यारे, मेरे आलोचक... से करती है। वे आगे लिखती हैं कि ‘लगता है बेकार हो गयी मैं, क्या पढ़ा क्या लिखा क्या जिया?’ तो यह महज़ एक लाइन नहीं है, बल्कि उस कलाकार का दर्द है जिसकी पूरी पहचान पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया हो। कवयित्री इस बात को बहुत ही बेबाकी से स्वीकार करती हैं कि हो सकता है उन्हें किताबों का या छंदों का ज्ञान न हो, लेकिन उनके पास जो सबसे बड़ी ताकत है—वह है 'प्रेम' और 'जीवन का अनुभव'। वे उन आलोचकों पर सीधा निशाना साधती है जो कविता को दिल से महसूस करने के बजाय केवल किताबी 'नियमों' से नापते हैं। वे आलोचक को एक खुली चुनौती देते हुए कहती हैं कि अगर मेरी कविता इतनी ही बेकार है और इस पर इतिहास थूकेगा, तो आगे आओ और रोक लो मेरे हाथ। लेकिन सच तो यह है कि किसी आलोचक के पास दिल से बहते इन जज्बातों को रोकने की कोई ताकत है ही नहीं। यह कविता साबित करती है कि कविता का इतिहास छंदों, व्याकरण या संकीर्ण नियमों से नहीं, बल्कि इंसानी जज्बातों, ईमानदारी और अपनी आवाज़ को बचाए रखने के साहस से बचता है।

शिवांगी गोयल की अगली कविता ‘तुम्हें मेरी माँ होना चाहिए’ किसी पुरुष के भीतर छिपी उस 'ममता' और 'स्वीकार्यता' को समर्पित है, जो अक्सर सिर्फ एक माँ के हिस्से मानी जाती है। कविता की शुरुआत में कवयित्री कहती हैं कि ‘मैं दुनिया की शुरुआत से पहले तुम्हारे गर्भ में थी’। यहाँ 'गर्भ' शब्द का इस्तेमाल किसी पुरुष के लिए करना ही अपने आप में एक बहुत बड़ा क्रांतिकारी कदम है। कविता का मध्य भाग उस पुरुष (राहुल पाण्डेय) के बेहद आत्मीय स्वभाव को परत-दर-परत खोलता है। वह एक ऐसा पुरुष है जो कवयित्री की आँखों को देखकर उनकी ‘आदिम भूख’ समझ जाता है, जो उनके रोने से पहले उनके आँसुओं को पहचान लेता है। वह उनकी आदत, उनकी कमियों से भी अच्छी तरह वाकिफ है। विशेष बात यह है कि वह सब कुछ जानते हुए भी, वशीकरण के सारे तंत्र जानते हुए भी, उन्हें कभी कैद करने की कोशिश नहीं करता। वह उनके पैर फिसलने पर उन्हें रोकता नहीं, बल्कि उन्हें अपनी गलतियों से सीखने की आज़ादी देता है। वह इतना पारदर्शी है कि चेहरा देखकर यह भी बता देता है कि इन दिनों वे किसके प्रेम में हैं। यह एक पुरुष का ऐसा रूप है जो ईर्ष्या, अधिकार और असुरक्षा की भावना से कोसों दूर, सिर्फ और सिर्फ शुद्ध प्रेम और भरोसे से बना है। वे आगे कहती हैं कि ‘तुम दूसरे पुरुष हो मुझे आश्चर्य होता है, तुम्हें मेरी माँ होना चाहिए था’। यह कविता साबित करती है कि प्रेम जब अपनी सबसे ऊँची और पवित्र अवस्था में होता है, तो वह जेंडर (लिंग) की सीमाओं को पार कर जाता है। वहाँ कोई पुरुष केवल पुरुष नहीं रह जाता और कोई स्त्री केवल स्त्री नहीं रह जाती, बल्कि वे दोनों एक-दूसरे के लिए एक मुकम्मल संसार बन जाते हैं।

कविता-संग्रह की अगली छोटी लेकिन बेहद तीखी और झकझोर देने वाली कविता ‘रोटियाँ’ है। कविता की शुरुआत एक बहुत ही आम और रोज़मर्रा के घरेलू दृश्य से होती है। एक लड़की, जो अपने मायके से दहेज में कार लेकर नहीं आई है, वह ससुराल के किचन में चुपचाप रोटियाँ बेल रही है। यह दृश्य हमारे समाज के उस कड़वे सच की तरफ इशारा करता है जहाँ आज भी किसी लड़की की कीमत उसके गुणों या उसके वजूद से नहीं, बल्कि वह अपने साथ क्या सामान लेकर आई है, इससे तय होती है। किचन की उस शांति के पीछे एक अजीब सा तनाव और घुटन है, जिसे यह लड़की रोज़ महसूस कर रही है। कविता का अगला हिस्सा उस मानसिक और सामाजिक साज़िश को दिखाता है जो बंद कमरों में बुनी जाती है। सास अपने बेटे के कान में कुछ बुदबुदा रही है। यह बुदबुदाना केवल कोई आम बातचीत नहीं है, यह दहेज के लोभियों का वह फुसफुसाता हुआ ज़हर है, जो किसी भी वक्त एक हिंसक शक्ल अख्तियार कर सकता है। कवयित्री ने यहाँ सीधे तौर इस बुदबुदाहट के ज़रिए उस गहरी साज़िश और असुरक्षा को दिखाया है जो उस लड़की के इर्द-गिर्द मंडरा रही है। कविता का सबसे आखिरी हिस्से में जहाँ बेजान रोटियाँ अचानक चिल्लाने लगती हैं—‘जलना मत’! रोटियों का यह चिल्लाना दरअसल उस लड़की के भीतर छिपे खौफ की गूंज है। समाज में दहेज के चक्कर में न जाने कितनी लड़कियों को 'रसोई की दुर्घटना' का नाम देकर ज़िंदा जला दिया गया। तवे पर जलती हुई वह रोटी उस लड़की को सचेत कर रही है कि कहीं इस घर के लालच और नफ़रत की आग में रोटियों की तरह उसका अपना जीवन भी न जल जाए। शिवांगी ने इस छोटी सी कविता में बेहद सरलता से घरेलू हिंसा और दहेज प्रथा के उस खौफनाक अंत की तरफ इशारा किया है जिससे आज भी कई लड़कियाँ गुज़र रही हैं।

संग्रह की अगली कविता है- 'माँ से झगड़ा'। जहाँ कवयित्री कविता की शुरुआत करते हुए लिखती हैं कि ‘दुनिया का पहला झगड़ा तुमसे था—क्यों पैदा किया मुझे?’ क्योंकि एक बेटी ने माँ को जीवनभर अकेले संघर्ष करते और एकांकीपन में जीते देखा था। कविता के शुरुआती दृश्य अकेला कमरा, टूटती सांसें, छाती पर सवार उदासी और कमरे का वह काला हिस्सा जो मकड़ी के जाले की तरह और उलझता जाता है। उसकी माँ के हिस्से आया था। तब कवयित्री अपनी माँ से एक सीधा सा सवाल पूछती हैं कि "तुमने मेरी माँ होकर क्या पाया? मैं किसी की माँ होकर क्या पाऊँगी?" यह सवाल केवल अपनी माँ से नहीं है, बल्कि यह उस पूरे सामाजिक चक्र पर चोट है जो यह मानता है कि एक स्त्री का जीवन सिर्फ माँ बनने से ही मुकम्मल होता है। वे पूछती हैं कि जिस मातृत्व को त्याग और सुख का चरम माना गया, उसने आखिर अंत में क्या दिया? क्या सिर्फ अकेले रहने की नियति? यहाँ कवयित्री ने केवल एक कमरे का माहौल नहीं खिंचा, बल्कि उस लड़की के दिमाग के भीतर चल रहे अवसाद को शब्दों में बांधा है। जब वह कहती है कि रातें चार पहर से ज़्यादा लंबी लगती हैं और दोपहर ऊब की तरह खिंचती चली जाती है, तो यह उस अंतहीन समय की गूंज है जहाँ कोई आपके साथ खड़ा नहीं होता। वे आगे कहती है कि उसका आखिरी झगड़ा खुद से रहेगा कि ‘क्यों पैदा नहीं होने दिया किसी को?’ यह एक स्त्री का अपने भीतर के मातृत्व से और इस पूरी व्यवस्था से अंतिम विद्रोह है। वह इस कड़वी दुनिया के ढर्रे को देखकर साफ़ एलान कर देती है— ‘मैं माँ नहीं हूँ, नहीं हो सकती, नहीं होना चाहती।‘ वह एक ऐसी दुनिया में किसी नए जीवन को नहीं लाना चाहती जहाँ अंत में सिर्फ अकेलापन और घुटन ही मिलनी है। शिवांगी गोयल ने औरत के जीवन की सच्चाई प्रकट करते हुए लिखा कि ‘जीवन के आख़िरी दिन तुम भी, मैं भी, अकेले कमरे में उदासी के साथ मरेंगे’ अर्थात् पीढ़ियाँ बदल जाएँगी, माँ की जगह बेटी आ जाएगी, लेकिन इस समाज में एक औरत के हिस्से का अकेलापन और कमरे का वह 'काला कोना' कभी नहीं बदलेगा। चाहे आप माँ बनें या न बनें, इस दुनिया की क्रूरता के आगे अंत में सबको उसी अकेले कमरे की उदासी में लौट जाना है।

इस कड़ी की अगली महत्वपूर्ण कविता है ‘आदम की अमरता’। हमारे समाज में पुरुषों द्वारा महिलाओं के साथ की जाने वाली छेड़छाड़, 'मिसबिहेवियर' या रोज़मर्रा की हिंसा को अक्सर कुछ 'बुरे लड़कों' की हरकत मानकर टाल दिया जाता है। लेकिन शिवांगी गोयल की यह कविता इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर देती है। यह कविता पुरुष मानसिकता के उस सामूहिक और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाले ढर्रे को बेनकाब करती है। कविता की शुरुआत ही एक ऐसे दृश्य से होती है जिसे हम सबने शादियों में कई बार देखा है। दोस्तों की बारात में 'इश्क़ तेरा तड़पावे' जैसे गानों पर नाचते हुए बेपरवाह लड़के कब आदमी हो जाते हैं और कब 'अंकल' बन जाते हैं, पता ही नहीं चलता। जहाँ भीड़ का फायदा उठाकर वे किसी लड़की के ‘ब्लाउज़ की कोर से किसी ओर-छोर से झाँकते हुए एक टुकड़ा जन्नत देखने को’ पागल और डरे हुए रहते हैं। यह केवल बारात का सच नहीं है; कवयित्री आगे लिखती हैं कि "कचकचाई हुई बसों में तो कितनी बार किया है ऐसा’। कवयित्री कहती हैं कि जिस लड़की से भी पूछो, वही किसी न किसी ऐसे ‘बदतमीज़ अंकल’ के बारे में बता देगी जो बाहर भले ही किसी का आदर्श पिता हो, किसी का राखी भाई हो। यह हिस्सा दिखाता है कि समाज में जो पुरुष दिन के उजाले में बहुत सभ्य और सम्मानीय बने फिरते हैं, वे ही भीड़ के अंधेरे में या बसों-ट्रेनों के धक्के में एक वहशी बन जाते हैं। इस हरकत की शुरुआत कहाँ से होती है, कवयित्री उसकी जड़ को पकड़ती हैं—लड़कपन में दोस्तों के उकसाने पर किसी जवान छाती पर पहली बार मारी गई कुहनी। यह दिखाता है कि कैसे हमारा पुरुष समाज लड़कों के भीतर इस विकृति को बचपन से ही एक 'मर्दानगी के खेल' की तरह पालता-पोषता है। कवयित्री उस पुरुष दोगलेपन की धज्जियाँ उड़ाती हैं, जहाँ कई लड़के बड़े गर्व से बताते हैं कि वे अपने घर की लड़कियों को भीड़ में, बसों में या बाज़ारों में जाने से बचाते हैं, उनकी रक्षा करते हैं। लेकिन वे कभी यह नहीं स्वीकार करते कि उन्हें अपने घर की लड़कियों को ‘ठीक उनके ही जैसे लड़कों से’ बचाने की ज़रूरत पड़ रही है। इसके बाद कविता सीधे धर्म और शास्त्रों से टकराती है। कवयित्री 'गरुड़ पुराण' का जिक्र करते हुए एक बहुत ही कड़वा सच सामने लाती हैं— ‘पापियों को मिलता है औरत का जन्म’। यहाँ कवयित्री ने साफ कर दिया है कि जिस धर्म और जिन देवताओं ने उन्हें 'पाप की योनि' बताया, उनसे मुक्ति की उम्मीद करना बेकार है। औरतों को अपनी मुक्ति खुद अपनी शर्तों पर लिखनी होगी। कुल मिलाकर, शिवांगी गोयल ने इस कविता में सड़क चलते छेड़छाड़ की एक आम घटना को उठाकर उसे अस्तित्व, धर्म और आत्मा के सबसे बड़े सवाल में बदल दिया है।

शिवांगी गोयल के संग्रह 'हजारों निशान' की कविता 'ईश्वर से' शीर्षक के साथ समाज में गहरी पैठ बना चुकी 'ऑनर किलिंग' (जाति के नाम पर हत्या) पर एक बेहद तीखा और भावुक प्रहार करती है। जब एक पिता सिर्फ दूसरी जाति का होने के कारण किसी निर्दोष प्रेमी की हत्या कर रहा हो, तब एक बेटी का चुप रहना सबसे बड़ी कायरता है। यह रचना इसी मौन को तोड़ने की बात करती है। यहाँ सच्ची आज्ञाकारिता माता-पिता की हर गलत बात को आँख मूंदकर मानने में नहीं, बल्कि उनकी क्रूरता को गलत कहने का हौसला रखने में दिखाई गई है। कविता का अंत बेहद शक्तिशाली और झकझोर देने वाला है, जहाँ बेटी भगवान से गुहार लगाती है कि यदि वह अपनों के जुल्म के खिलाफ आवाज न उठा सके, तो भगवान उससे उसके संस्कार, उसके माता-पिता और उसकी आवाज तक छीन ले। यह एक बेहद जरूरी और साहसिक रचना है जो हर पाठक को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या परंपराओं का सम्मान किसी इंसान की जान और इंसानियत से भी बढ़कर है।

शिवांगी गोयल की कविता 'लाश की आत्महत्या' हमारे समाज, कानून और व्यवस्था के सबसे घिनौने और संवेदनहीन चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा है। कवयित्री ने उस कड़वी और डरावनी हकीकत को उकेरा है जहाँ बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों के बाद पीड़िता को ही दोषी ठहराने का खेल खेला जाता है। कविता में इस्तेमाल किए गए बिंब (जैसे चाकू से खुद गला रेतती, एसिड के नीचे सिर देती, खुद पर पेट्रोल छिड़कती लाश) इतने भयावह हैं कि पाठक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह डरावना विरोधाभास सीधे तौर पर उस पूरी व्यवस्था पर कटाक्ष करता है। जो रसूखदार हत्यारों और बलात्कारियों को बचाने के लिए पूरी कहानी को ही पलट देती है। जब अदालतों, पुलिस और पोस्टमार्टम रिपोर्टों में एक पीड़ित महिला के चरित्र पर सवाल उठाकर उसके साथ हुई बर्बरता को 'उसकी अपनी मर्जी' या 'आत्महत्या' साबित कर दिया जाता है। तब ऐसा लगता है मानो न्याय खुद कातिल के साथ खड़ा है। ‘गलत नहीं कोई हत्यारा, गलत नहीं न्यायपालिकाएँ...’ इन पंक्तियों में छिपा गहरा व्यंग्य और आक्रोश पाठक के दिल को अंदर तक झकझोर देता है। यह कविता कागजों और फाइलों में सिमट कर दम तोड़ चुकी इंसानियत और न्याय प्रणाली की मर चुकी अंतरात्मा का एक बेहद कड़वा, सच्चा और संवेदनशील दस्तावेज़ है।

‘पत्नी की इज़्ज़त’ इस संग्रह की एक अत्यंत सशक्त कविता है। ‘पत्नी की इज़्ज़त’ कविता अपने छोटे कलेवर में विवाह, प्रेम, नैतिकता और स्त्री की सामाजिक स्थिति पर गहरे प्रश्न खड़े करती है। पहली दृष्टि में यह कविता पति-पत्नी के संबंधों की साधारण कथा प्रतीत होती है, किंतु जैसे-जैसे कविता आगे बढ़ती है, यह स्पष्ट हो जाता है कि कवयित्री प्रेम और ‘इज़्ज़त’ जैसे शब्दों के बीच छिपे सामाजिक अर्थों को उजागर कर रही हैं। कविता में बार-बार दोहराया गया वाक्य—‘मैं अपनी पत्नी की इज़्ज़त करता हूँ’। पहले ये पंक्ति एक आदर्श पति का परिचय देता हुआ प्रतीत होता है, लेकिन धीरे-धीरे यही वाक्य व्यंग्य का सबसे प्रभावशाली माध्यम बन जाता है। कवयित्री बहुत सूक्ष्मता से यह संकेत करती हैं कि प्रेम और सम्मान का दावा करने वाला पुरुष एक साथ किसी दूसरी स्त्री से प्रेम करने की बात भी सहजता से कह देता है। इस प्रकार कविता यह प्रश्न उठाती है कि यदि प्रेम के साथ ईमानदारी और समानता नहीं है, तो केवल ‘इज़्ज़त’ का दावा क्या वास्तव में स्त्री को गरिमा प्रदान कर सकता है? कविता में स्त्री हर बार सोचती है कि “पति को इतना ही संवेदनशील होना चाहिए”, “इतना ही वफ़ादार होना चाहिए” और अंततः “इतना ही समझदार होना चाहिए।” इन वाक्यों में एक गहरी विडंबना छिपी है। कवयित्री दिखाती हैं कि समाज ने स्त्री की अपेक्षाओं को कितना सीमित कर दिया है; वह प्रेम की संपूर्णता नहीं, बल्कि केवल इतना चाहती है कि उसके हिस्से का सम्मान बचा रहे। यही बिंदु कविता को मार्मिक बना देता है। कविता का अंतिम कथन ‘क्योंकि प्रेम मर सकता है, ‘इज़्ज़त’ बरकरार रहती है’। कवयित्री इस सोच पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं कि यदि किसी संबंध में प्रेम समाप्त हो जाए और केवल सामाजिक मर्यादा शेष रह जाए, तो क्या वह संबंध वास्तव में जीवित कहा जा सकता है? यह प्रश्न कविता के समाप्त होने के बाद भी पाठक के भीतर लंबे समय तक बना रहता है।

इस संग्रह में ‘निरर्थक बहस’, 'बेहतर देना', समझदार लड़कियाँ', ‘हमने दुनिया भर के मर्दों को कुत्ता कहा', ‘नये अत्याचार', 'कमाऊ पतोहें' आदि कुछ बेहतरीन कविताएं और हैं जो स्त्री के अस्तित्व, उसकी सामाजिक भूमिका और उससे जुड़ी रूढ़िवादी अपेक्षाओं पर एक बेहद तीखा और गहरा प्रहार करती है। शिवांगी गोयल के कविता संग्रह 'हज़ारों निशान' समकालीन हिंदी कविता में स्त्री-विमर्श का एक बेहद ज़रूरी और तीखा दस्तावेज़ है. इस संकलन की विभिन्न कविताओं (जैसे 'बेहतर देना', 'समझदार लड़कियाँ', 'हमने दुनिया भर के मर्दों को कुत्ता कहा' और 'नये अत्याचार') का जब हम एक साथ तुलनात्मक अध्ययन करते हैं, तो कवयित्री के वैचारिक विकास और उनकी गहरी सामाजिक समझ की एक पूरी श्रृंखला उभरकर सामने आती है। भाषा की दृष्टि से कविता संग्रह अत्यंत सरल और संवादधर्मी है। इसमें किसी प्रकार की अलंकारिक जटिलता नहीं है, फिर भी इसकी अर्थवत्ता अत्यंत गहरी है। छोटे-छोटे वाक्य, पुनरावृत्ति और सहज कथन-शैली कविताओं के व्यंग्य को और अधिक धारदार बना देते हैं। यही सादगी उनकी कविताओं की सबसे बड़ी कलात्मक शक्ति बन जाती है।

समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में अनामिका, कात्यायनी, सविता सिंह और निर्मला पुतुल जैसी स्थापित स्त्रीवादी कवयित्रियों के साथ जब हम शिवांगी गोयल की तुलना करते हैं, तो पीढ़ियों का वैचारिक और भाषाई बदलाव बहुत स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आता है। जहाँ अनामिका की कविताओं में स्त्री के दुख और अस्मिता की लड़ाई को मिथकों, घरेलू ब्योरों, लोक और एक बेहद बारीक सांस्कृतिक बुनावट के साथ पेश किया जाता है, वहीं शिवांगी गोयल इस सांस्कृतिक मुलम्मे को पूरी तरह हटा देती हैं। अनामिका जहाँ भाषा में एक कोमलता और गहरी आंतरिक छुअन बनाए रखती हैं, वहीं शिवांगी की शैली में एक तात्कालिक आक्रोश और संकोचहीनता है जो पाठक को संभलने का मौका नहीं देती। इसी तरह कात्यायनी की स्त्रीवादी कविताएँ सीधे राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था से टकराती हैं, जिनमें एक मजबूत वैचारिक और जनवादी चेतना होती है। कात्यायनी समाज को बदलने के लिए एक संगठित प्रतिरोध और वैचारिक दृढ़ता की बात करती हैं। इसके विपरीत, शिवांगी गोयल की कविताएँ व्यवस्था के राजनीतिक ढांचे से ज़्यादा हमारे रोज़मर्रा के सामाजिक पाखंड और डिजिटल युग के 'नये अत्याचारों' पर ध्यान केंद्रित करती हैं। वे 'हमने दुनिया भर के मर्दों को कुत्ता कहा' जैसी कविताओं के माध्यम से उस आंतरिक पाखंड को भी बेबाकी से उजागर करती हैं जहाँ औरतें खुद इस दमनकारी व्यवस्था का हिस्सा बन जाती हैं—एक ऐसा कड़वा आत्मनिरीक्षण जो कात्यायनी की राजनीतिक कविताओं से थोड़ा अलग, अधिक व्यक्तिगत और सामाजिक मनोविज्ञान पर आधारित है। सविता सिंह की कविताओं में स्त्री विमर्श का एक दार्शनिक और अस्तित्ववादी रूप देखने को मिलता है, जहाँ भाषा बहुत शांत, गंभीर और अमूर्त बिम्बों से भरी होती है। सविता सिंह स्त्री के एकांत, उसकी आंतरिक दुनिया और उसकी चेतना के एकाकीपन को टटोलती हैं। शिवांगी गोयल की कविताएँ इस दार्शनिक एकांत के ठीक उलट एक कोलाहल, एक चीख और सीधे यथार्थ की ज़मीन पर खड़ी हैं। शिवांगी अमूर्त बिम्बों के बजाय 'डिक-पिक', 'डीपफेक' और 'लोहे की रॉड' जैसे नग्न, समकालीन और क्रूर शब्दों का इस्तेमाल करती हैं, जो सभ्यता के चेहरे पर सीधा तमाचा मारते हैं। आदिवासी चेतना की कवयित्री निर्मला पुतुल की बात करें, तो उनकी कविताएँ जल, जंगल, ज़मीन और बाज़ारवाद के खिलाफ स्त्री के संघर्ष को दिखाती हैं, जिसमें प्रकृति और लोक की एक सोंधी महक होती है। वहीं, शिवांगी गोयल की दुनिया मुख्य रूप से शहरी और अर्ध-शहरी मध्यमवर्ग के उस आधुनिक समाज की दुनिया है जो तकनीक से लैस तो है, लेकिन उसकी मानसिकता और विकृत हो चुकी है। संक्षेप में कहें तो पुरानी पीढ़ी की कवयित्रियों ने जहाँ स्त्री विमर्श के लिए एक दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ज़मीन तैयार की, वहीं शिवांगी गोयल उस ज़मीन पर खड़े होकर आज के डिजिटल और व्यावहारिक युग के कड़वे सच को बिना किसी लाग-लपेट के, अपनी अनूठी और मारक सपाटबयानी के साथ दर्ज करती हैं।

समकालीन समय में शिवांगी गोयल जैसी लेखिका द्वारा किए जा रहे इस तीखे और नग्न यथार्थवादी लेखन के सामने अनेक गंभीर सीमाएँ और चुनौतियाँ खड़ी होती हैं। सबसे बड़ी चुनौती पाठक वर्ग की स्वीकार्यता और संवेदनशीलता को लेकर है। जब कविता में 'योनि', 'डिक-पिक' या 'छिनाल' जैसे कड़े और वर्जित माने जाने वाले शब्दों का सीधा इस्तेमाल होता है, तो हमारा पारंपरिक और रूढ़िवादी समाज अक्सर मुख्य विषयवस्तु से ध्यान हटाकर केवल भाषा की 'अश्लीलता' या 'मर्यादा' पर बहस करने लगता है। इससे कविता का मूल संदेश और सामाजिक सरोकार कहीं पीछे छूट जाता है और पाठक वैचारिक रूप से जुड़ने के बजाय रक्षात्मक या आक्रामक हो जाता है। दूसरी बड़ी चुनौती सपाटबयानी के कारण कविता के शिल्पगत सौंदर्य का संकट है। इस शैली में रूपकों, प्रतीकों और काव्यात्मक बिम्बों का अभाव होता है, जिससे कई बार कविता सिर्फ एक 'अखबारी रिपोर्ट' या 'बयानबाज़ी' जैसी लगने लगती है। कलात्मकता की इस कमी के कारण रचना में वह ठहराव या गहराई नहीं आ पाती जो पाठक को बार-बार उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करे। लंबे समय में इस तरह के लेखन में एकरसता आने का खतरा रहता है, क्योंकि हर बार वही आक्रोश और वही सीधे शब्द पाठक को वैचारिक रूप से तो झकझोर सकते हैं, लेकिन साहित्यिक स्तर पर उनकी नवीनता खोने लगती है। इसके अलावा, आज के डिजिटल युग में सेंसरशिप, ट्रोलिंग और सुरक्षा की चुनौती भी बहुत बड़ी है। जब कोई लेखिका सामाजिक पाखंड और पुरुष-तंत्र की विकृतियों पर इतना सीधा और तीखा हमला करती है, तो उसे आभासी दुनिया में भारी विरोध, व्यक्तिगत हमलों और साइबर बुलिंग का सामना करना पड़ता है। विडंबना यह है कि जिन 'नये अत्याचारों' का ज़िक्र कविता में है, लेखिका को खुद उन्हीं का शिकार बनाने की कोशिश की जाती है। यह डर अनेक लेखकों को खुलकर लिखने से रोकता है। अंततः, एक बड़ी सीमा व्यवस्था की संवेदनहीनता भी है। आज का समाज और व्यवस्था इतनी क्रूर घटनाओं को रोज़ न्यूज़ चैनलों पर देखने के आदी हो चुके हैं कि अब शब्दों का यह तीखापन भी उन्हें केवल थोड़ी देर के लिए बेचैन करता है। इस तरह के यथार्थवादी लेखन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस 'असंवेदनशील हो चुके समाज' की चेतना को स्थायी रूप से कैसे जगाए, ताकि कविता केवल पन्नों पर दर्ज एक आक्रोश बनकर न रह जाए, बल्कि ज़मीनी बदलाव का जरिया बन सके।

शिवांगी गोयल के इस संकलन का शीर्षक 'हज़ारों निशान' अपने आप में एक गहरा और बहुआयामी प्रतीक है। यह कोई साधारण नाम नहीं है, बल्कि यह उन अदृश्य और दृश्य ज़ख्मों का लेखा-जोखा है जिन्हें एक स्त्री अपने जीवन के सफर में समाज, परिवार और व्यवस्था से अनवरत पाती है। यह अपने समय की उन दरारों को दर्ज करता है जहाँ स्त्री का जीवन, उसका मौन, उसका प्रतिरोध, उसका प्रेम और उसका आत्मसम्मान एक साथ उपस्थित दिखाई देते हैं। यहाँ कविताएँ किसी पूर्वनिर्धारित वैचारिक आग्रह की पुनरावृत्ति नहीं करतीं, बल्कि जीवन की तपिश से निकले हुए अनुभवों को पूरी ईमानदारी के साथ शब्द देती हैं। जब हम इस शीर्षक के अंतर्निहित अर्थ और कवयित्री की भाषा-शैली को गहराई से टटोलते हैं, तो इसके कई परतदार पहलू सामने आते हैं। शिवांगी गोयल की कविताएँ किसी भाषाई आडंबर या बनावटी प्रतीकों का सहारा नहीं लेतीं, बल्कि स्त्री के मन पर लगे गहरे जख्मों को बेहद सादगी और ईमानदारी से बयां करती हैं। लेखिका का मानना है कि जब एक स्त्री दुनिया के दुखों और अपने संघर्षों को पन्नों पर उतारती है, तो उसे किसी जटिल बिंब की ज़रूरत नहीं होती; उसकी सादा और बेबाक अभिव्यक्ति ही पाठक को झकझोर देती है। इन रचनाओं में पुरुष-प्रधान समाज की तानाशाही और उसके थोपे गए नियमों पर सीधा प्रहार किया गया है, जहाँ 'हम पूछेंगे तुमसे सारे सवाल' जैसी पंक्तियाँ एक मुखर आक्रोश बनकर उभरती हैं। कविता का कैनवास सिर्फ गुस्से तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पृथ्वी की तरह सब कुछ सहने की गहरी उदासी और मन के भीतर मचने वाला एक कभी न थमने वाला सैलाब भी शामिल है।

शिवांगी के लेखन की सबसे बड़ी खूबसूरती उनकी भाषा का अनूठा प्रवाह है, जिसे उन्होंने उर्दू कविता के संस्कारों से सींचा है। उनकी रचनाओं में हिंदी और उर्दू का एक ऐसा मेल दिखाई देता है जिसे 'दोआब की रवानी' कहा जा सकता है। उनकी कविता की पंक्तियाँ प्रेम के उस दर्दनाक और स्याह पहलू को उजागर करती हैं जहाँ केवल तड़प, अवसाद और बेचैनी है। ये कविताएँ दिखाती हैं कि जब प्रेम जैसी बेहद नाज़ुक और खूबसूरत भावना को समाज की कठोर ज़मीन से धकियाया जाता है, तो इंसान की पीड़ा उसके हलक तक भर जाती है, जिसे लेखिका ने बेहद संवेदनशीलता के साथ पन्नों पर उकेरा है। शिवांगी गोयल की रचनाएँ पारंपरिक उपमाओं और घिसे-पिटे बिंबों के बंधनों को तोड़कर एक बेहद साहसी और बेबाक कविता की ज़मीन तैयार करती हैं। रूपम मिश्र के अनुसार, कवयित्री की सबसे बड़ी ताकत इन असहनीय संवेदनाओं को कविता के संकोच में छिपाने के बजाय बिल्कुल 'टका सा' यानी सीधे और दो टूक शब्दों में कह देने का अनूठा साहस है। यह कविता 21वीं सदी की आधुनिक युवा स्त्री के अंतर्मन का एक प्रामाणिक दस्तावेज़ है, जिसमें उसकी महत्वाकांक्षाएँ, सपने, घरेलू और सामाजिक दायरे तथा संचित आक्रोश पहली बार इतनी बेचैनी और निर्भीकता के साथ भाषा में ढलकर सामने आए हैं। हालाँकि इन उग्र भावनाओं में एक तरह की हड़बड़ाहट और सबकुछ तुरंत कह देने की उद्विग्नता दिखाई देती है, लेकिन यही बेखौफ़ आज़ादी और न्याय पाने की ज़द्दोजहद इस कविता को नया और प्रासंगिक बनाती है। अंततः, पितृसत्तात्मक ढाँचे पर सटीक चोट करती ये रचनाएँ समकालीन संवेदना और आधुनिक वैचारिकता के साथ पूरी तरह न्याय करती हैं, जो भविष्य में एक अधिक परिपक्व और संयत अभिव्यक्ति की उम्मीद भी जगाती हैं।

सन्तोष विश्नोई
सहायक प्राध्यापक एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग लक्ष्मी नारायण दूबे महाविद्यालय, मोतिहारी, बिहार
(बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय, मुज़फ्फरपुर)

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

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