- सुनील कुमार बाटू
(1)
घोंसलों
से
उड़े
नहीं
होते
काश
बच्चे
बड़े
नहीं
होते
गर
सलीक़े
से
बात
हो
जाती
घाव
दिल
पर
पड़े
नहीं
होते
मंज़िले ख़ुद हमें बुलाती हैं
हम
हि
उठ
कर
खड़े
नहीं
होते
क़ामयाबी
कभी
नहीं
मिलती
फ़ैसले गर कड़े नहीं होते
बात
बँटवारे
की
नहीं
होती
भाई
- भाई लड़े नहीं होते
अपना
रिश्ता
सुनील
निभ
जाता
हम
जो
ज़िद
पर
अड़े
नहीं
होते
(2)
कुछ
तो
आए
सुकून
कानों को
यार मीठा रखो ज़ुबानों को
बस
धुआँ
आता
कारखानों
का
धूप मिलती नहीं मकानों को
हमको
साहिल
पे
अब
नहीं
जाना
आग लग जाए बादबानों को
धरती खोदो निकाल लो पानी
कब
तलक
तकना
आसमानों
को
जाने
क्या
बीते
इन
गुलाबों
पर
लड़ते देखा है बाग़बानों को
हर
क़दम
पर
वफ़ा
के
दुश्मन
हैं
तुम
भी ताने रहो कमानों को
कुछ
तो
हिम्मत
'सुनील' पैदा कर
छोड़ दे अब सभी बहानों को
(3)
दोष
कुछ
भी
न
था ग़रीबों का
खेल सारा था बस
नसीबों का
दोस्ती दोस्तों की देखी है
साथ देते रहे रक़ीबों का
कल
था
काँटों
से
खौ़फ़
आज
मगर
डर
भी जाता रहा सलीबों का
रोग इतने बढ़े ज़माने में
दम
निकलने
लगा
तबीबों
का
क्यों
सियासत
'सुनील' करते हो
काम ये है नहीं अदीबों का
(4)
ज़िन्दगी क़ामयाब होती है
साथ
में
जब
किताब
होती
है
ज़ीस्त
उसकी
ख़राब
ही
समझो
जिसकी
सुहबत
ख़राब
होती
है
भूखे
लोगों को नींद आए
तो
रोटी
आँखों
का
ख़्वाब
होती
है
देखते वे ही ग़ौर से सूरज
जिनकी
आँखों
में
ताब
होती
है
घर
ग़रीबों
के
बिक
गए
सस्ते
कितनी
मँहगी
शराब
होती
है
जो
सिखाती
नहीं
अदब
हमको
वो
इबादत
ख़राब होती है
जब
ग़मों
से
'सुनील' लड़ लेता
तब
ख़ुशी
दस्तयाब होती है
(5)
बोझ
बेटों
ने
डाल
रक्खा
है
बाप
ने
घर
सँभाल
रक्खा
है
फ़ैसले कब हुए तुझे मंज़ूर
फिर
भी
सिक्का
उछाल
रक्खा
है
उसको
फिर
नींद
कैसे
आयेगी
ख़्वाब
को
जिसने
पाल
रक्खा
है
तुमने
फिर
वो
सवाल
पूछ
लिया
जिसको
बरसों
से
टाल
रक्खा
है
अपने
दुख
से
'सुनील' था बोझिल
फिर तेरा ग़म भी पाल रक्खा है
C-7, मीरा नगर, चित्तोड़गढ़, राजस्थान

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