विज्ञान की दुनिया के अनसुने किस्से : रेडियम वाली मैडम / नीरज श्रीमाली

विज्ञान की दुनिया के अनसुने किस्से : रेडियम वाली मैडम
- नीरज श्रीमाली


  मैडम क्युरी का नाम तो सुना ही होगा आपने, वही रेडियम वाली, जिसने रेडियम की खोज की थी, और रेडियम? इसे तो आप रोज़ देखते हैं, गाड़ियों की प्लेटों पर और घुमावदार सड़कों के साइन बोर्डो पर, वही जो घुप्प अँधेरे में भी चमकता है। रेडियम की इसी चमक ने तो भूचाल ला दिया था, मैरी के जीवन में। दुनिया भर की शौहरत, दुनिया भर की ज़िल्लत और आखिरकार एक दर्दनाक मौत। नीली चमक वाले इस रेडियम ने नीली आँखों वाली क्युरी का पीछा कभी नहीं छोड़ा, मरने के बाद भी नहीं। आज भी उनका ताबूत, उनकी निजी डायरियों सहित तमाम चीजें सीसे के बक्से में बंद हैं, जिन्हें बिना दस्तानों के आप छू भी नहीं सकते। मैडम क्युरी इतिहास की एक मात्र महिला थी जिसे दो नोबेल पुरस्कार मिले, पहला 1903 में भौतिकी और दूसरा 1911 में रसायन विज्ञान के क्षेत्र में।

मैरी ने रेडियम की खोज क्या की, दुनिया इस चमकने वाले अजूबे के लिए पगला सी गयी थी। रेडियम वाला मंजन, साबुन, पानी, चॉकलेट, टॉनिक, त्वचा को गोरी करने वाली फेस क्रीम, और भी जाने क्या-क्या। यूरोप के बाज़ारों में 1913 से 1920 के बीच रेडियम उत्पादों की बाढ़ सी गई थी। मशहूर पबों में केबरे डांसर अँधेरी रातों में रेडियम वाली पौशाकें पहनकर नाचा करती थीं। विज्ञापनों में तो यहाँ तक दावा किया गया कि यदि पुरुष अपने अंडकोषों के पास रेडियम से भरी थैली लटका कर रखें, तो ताउम्र उनकी मर्दानगी बनी रहेगी। इन भ्रामक विज्ञापनों से कंपनियों ने खूब पैसा बनाया। क्युरी दम्पति चाहते तो रेडियम का पेटेंट करवाकर खूब पैसा बना सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका लक्ष्य पैसा बनाना नहीं बल्कि प्रकृति के एक अद्भुत रहस्य को सुलझाना था।

7 नवंबर 1867 को रूसी साम्राज्य के अधीन पोलैंड की राजधानी वारसा में एक बच्ची का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया मारिया स्क्लोडोव्स्का, जो बाद में जाकर हुआ मैरी स्क्लोडोव्स्का और फिर शादी के बाद मैरी क्युरी। मारिया की मां टीबी से संक्रमित थी। वो अपनी नन्हीं बच्ची को खुद से हमेशा दूर रखती थी। चार साल की उम्र से ही मारिया ने हमेशा कमरे की दीवार के किसी कोने में बैठकर दूर से अपनी मां को बिस्तर पर लेटे और खांसते हुए ही देखा। आठ की उम्र में एक बड़ी बहन और दस की उम्र में अपनी मां को खोने का दर्द मारिया के जीवन को हमेशा के लिए ऐसा अवसाद दे गया कि वह जीवन भर उससे उबर नहीं पायी। एक बड़ी सेलिब्रीटी होने के बावजूद भी वो हमेशा चकाचौध, फैशन और दिखावे से दूर रही। काली पोशाक में लिपटा हुआ एक उदास चेहरा जिसके होंठों पर शायद ही कभी मुस्कान आती हो।

            पोलैंड उस समय एक आज़ाद देश नहीं बल्कि रूस के अधीन था। 1815 में वाटरलू में नेपोलियन की हार के बाद से ही रूस के ज़ार ने स्वयं को पोलेंड का राजा घोषित कर दिया था। मारिया के पिता भौतिकी और गणित के शिक्षक थे, जबकि उनकी माँ एक प्रतिष्ठित विद्यालय की प्रधानाचार्या थी। नन्ही मारिया अपने पिता की अलमारी में पड़े वैज्ञानिक उपकरणों को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती थी। शायद यहीं से विज्ञान के प्रति उसका लगाव हुआ। मारिया का परिवार हर तरह से खुशहाल और संपन्न था, लेकीन जल्द ही सब कुछ बदलने वाला था। पोलेंड की स्वतंत्रता और अस्मिता के आन्दोलन से जुड़े रहने के कारण मारिया के माता और पिता, दोनों को नौकरी से निकाल दिया गया। मारिया के संघर्ष की शुरुआत यही से होती है। बड़ी मुश्किल से घर का गुज़ारा हो पाता था। मारिया पढने में काफी होशियार थी। 1883 में उसने स्वर्ण पदक के साथ स्कूल की पढाई पूरी की, लेकिन आगे के दरवाजे बंद थे। उस समय पोलैंड में महिलाओं को विश्वविद्यालयों में पढने की इजाज़त नहीं थी। मारिया का सपना किसी यूनिवर्सिटी में दाखिला लेकर भौतिक विज्ञान पढ़ने का था।

उसकी बड़ी बहन ब्रोन्या डॉक्टर बनना चाहती थी। दोनों बहनों ने एक समझौता किया। पहले मारिया नौकरी करके ब्रोन्या की पढ़ाई का खर्च उठाएँगी, फिर ब्रोन्या डॉक्टर बनकर मारिया को पढ़ने में मदद करेगी। मारिया ने ज़ोराव्स्की नाम के एक धनी परिवार में गवर्नेस की नौकरी शुरू कर दी जहाँ उसे बात-बात पर अहसास दिलाया जाता की भले ही वो प्रतिभाशाली है, लेकिन है वो एक मामूली गरीब लड़की। इन्हीं वर्षों में उसे प्रेम भी हुआ। ज़ोराव्स्की परिवार का बड़ा बेटा युवा कासिमिर, 17 साल की नीली आँखों वाली मारिया को अपना दिल दे बैठा। दोनों की भौतिकी और गणित में गहरी रूचि थी और शायद यही कारण था, उनके नजदीक आने का। कासिमिर ने मारिया से शादी करने तक का वादा किया। कासिमिर में मारिया को अपना जीवन साथी नज़र आने लगा। उसके मायूस जीवन में पहली बार कुछ अच्छा हुआ था। उनका सिलसिला करीब तीन सालों तक चला, लेकिन आगे की कहानी पूरी फ़िल्मी निकली। बाप ने पूछागरीब नौकरानी या जायदाद?” कासिमिर ने जायदाद को चुना। प्यार में मिले इस धोखे से मारिया का दिल टूट गया। उस समय शायद वो आत्महत्या भी कर लेती, अगर उसे अपनी बहन को हर महीने पैसे भजने होते।

इधर बड़ी बहन ब्रोन्या ने डॉक्टरी की पढाई पूरी कर अपना घर बसा लिया था। अब उसकी बारी थी, अपना वादा निभाने की। ब्रोन्या ने मारिया को पेरिस बुला लिया। 1891 में 24 वर्ष की मारिया अंततः पेरिस पहुँचीं। उसने सोरबॉन युनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया। अब से वो मारिया नहीं बल्कि मैरी के रूप में जानी जाएगी। रहना खाना सब ब्रोन्या के घर था, लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिनों तक नहीं चला। ब्रोन्या के पति डॉक्टर होने के अलावा एक सक्रीय सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। उनके घर हमेशा भीड़ और कोलाहल बना रहता जिससे मारिया अपनी पढाई पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर पा रही थी। आखिरकार उसने किसी दूसरी जगह शिफ्ट होने का फैसला कर ही लिया

एक छोटे से किराए के कमरे में उसने अपनी दुनिया बसा ली। पढाई में मैरी इस कदर डूब जाया करती थी कि खाने में केवल ब्रेड, अंडे या चावल ही लेती थी। कई बार भूख और ठंड के कारण वो बेहोश तक हो जाया करती। इन हालातों के चलते मैरी इस कदर कुपोषण का शिकार हुई कि वह मरते-मरते बची। खैर उसकी पढ़ाई फिर भी जारी रही। 1893 में उसने गोल्ड मैडल के साथ भौतिकी में अपनी डिग्री पूरी की, लेकिन यूनिवर्सिटी की किसी भी लेब में उसके रिसर्च के लिए कोई जगह नहीं थी। भौतिकी में डिग्री लेने वाली पहली महिला जो ठहरी, आखिर कोई पुरुष उसे अपने विभाग में पनाह कैसे देता?

एक दिन किसी सीनियर प्रोफ़ेसर की सलाह पर मैरी, पियरे क्युरी नाम के युवा, शांत, गंभीर और प्रतिभाशाली भौतिकविद से मिलने गई। पहली ही मुलाकात में ही बात बन गई और पियरे ने अपनी लेब के एक हिस्से में उसे काम करने की इजाज़त दे दी। दोनों अक्सर एक दूसरे के काम में मदद करते थे। धीरे-धीरे उनकी नजदीकियाँ बढ़ने लगीं, इस कदर की उन्होंने शादी करने का फैसला कर लिया। 1895 में एक सादे समारोह में उनका विवाह हुआ। मैरी स्क्लोडोव्स्का अब मैरी क्युरी बन चुकी थी। हनीमून पर जाने के बजाय दोनों साइकिलों पर घंटो अनजान रास्तों पर घूमने निकल पड़ते। साइकिलों पर भी उनका वैज्ञानिक संवाद जारी रहता।

        1896 में फ़्रांस के ही एक मशहूर भौतिकविद हैनरी बैकेरेल ने एक अद्भुत खोज की। उन्होंने पाया कि यूरेनियम नाम का तत्व अपने आप कुछ रहस्यमयी किरणें उत्सर्जित करता है। मैरी को इस खोज ने इतना आकर्षित किया कि उसने इसे ही अपना शोध-विषय बना लिया। पियरे ने मैरी के अनुसंधान के लिए आवश्यक उपकरण तैयार किए। मैरी ने इस विषय पर अनुसन्धान करते हुए पाया कि ऐसे गुणधर्म कुछ अन्य पदार्थ भी दर्शाते हैं। पदार्थों के इस गुण को मैरी नेरेडियोएक्टिविटीनाम दिया। पियरे ने भी अब अपने मूल विषय चुम्बकत्व को छोड़कर मैरी के साथ रेडियोएक्टिविटी पर काम करना शुरू कर दिया। 1898 में क्युरी दम्पति ने पिंचब्लेड अयस्क पर काम करते हुए रसायन विज्ञान का एक नया तत्व ही खोज लिया, जिसका नाम मैरी ने अपने मातृ देश पोलेंड परपोलोनियमरखा। ये वही पोलेंड था, जहाँ उसे युनिवर्सिटी में पढ़ने तक की भी इजाज़त नहीं थी।

इस खोज के बाद क्युरी दम्पति का रातों-रात विज्ञान की दुनिया में एक बड़ा नाम हो गया, लेकिन असली चमत्कार होना अभी बाकी था। उसी वर्ष दिसंबर में उन्होंने दूसरे नए तत्व “रेडियमकी खोज की घोषणा कर दी, जिसने विज्ञान की दुनिया में तहलका मचा दिया। एक महिला ने दो नए तत्त्व खोज लिए? असंभव! पुरुष प्रधान वैज्ञानिक समुदाय ने इस खोज के पर्याप्त सबूत मांगे जिसके लिए मैरी को पोलोनियम और रेडियम को उनको अयस्कों से शुद्ध रूप में अलग करके दिखाना था, और यही से मैरी के जीवन की सबसे कठिन, दर्दभरी, और शरीर को गला देने वाली यात्रा प्रारम्भ होती है। दरअसल समस्या ये थी कि टनों पिचब्लेंड में भी रेडियम बहुत ही कम मात्रा में उपस्थित था, इतना कम कि लगभग 8 टन पिचब्लेंड को गलाने के बाद उन्हें केवल लगभग 0.1 ग्राम शुद्ध रेडियम मिला। सोचिए, 8,000 किलोग्राम पत्थर से एक चुटकी जितना पदार्थ। लेकिन उसी चुटकी भर रेडियम ने विज्ञान की दुनिया बदल दी।

क्युरी के पास कोई आधुनिक प्रयोगशाला नहीं थी। उन्हें बेसमेंट में एक टूटा-फूटा शेड मिला, जो गर्मियों में भट्टी और सर्दियों में बर्फघर बन जाता था। पिचब्लेंड अयस्क से रेडियम को अलग करने के लिए बड़ी कुशलता की आवश्यकता थी, साथ ही क्युरी दम्पती के पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वह इस काम के लिए मजदूर रख  सके। यह काम मैरी को खुद ही करना पड़ा। एक बार में बीस किलो अयस्क को विशाल लोहे के कड़ाहों में डालकर उबालना पड़ता। कई-कई घंटों तक मैरी भारी लोहे की छड़ों से उबलते हुए मिश्रण को हिलाती रहतीं। उनके कपड़े रसायनों से भीग जाते, हाथ जल जाते, छिल जाते और शरीर थककर चूर हो जाता। मैरी के हाथों में इस कदर तक छाले हो गए थे कि वह ठीक से अपने कपड़ों के बटन भी नहीं लगा पाती थी। चाक़ू से एप्पल को काटने जैसा मामूली काम भी मैरी को असहनीय पीड़ा दे जाता। काम के बीच वो सरपट दौड़कर घर जाती, अपनी छोटी बच्ची को दूध पिलाकर वापस भट्टी को उबालने में लग जाती। मैरी को अपने काम के प्रति इतना जूनून था कि इस असहनीय काम को उसने पुरे चार सालों (1898-1902) तक जारी रखा, जिसका नतीजा था, 0.1 ग्राम शुद्ध रेडियम।

आखिर दुनिया को मानना ही पड़ा कि रेडियम नाम की भी कोई बला होती है जो अपने आप चमकती है। मैरी को अपने पति पियरे क्यूरी और हैनरी बेकेरेल के साथ संयुक्त रूप से वर्ष 1903 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला। वे नोबेल जीतने वाली पहली महिला बनीं। दुनिया भर के अखबारों में उनका नाम छपने लगा। मैरी अब एक बड़ी सेलिब्रिटी साथ दो प्यारी बेटियों की मां बन चुकी थी। क्युरी दम्पति वापस अपने अनुसन्धान में दुगुने जोश से लग गए, लेकिन नियति को कुछ ओर ही मंज़ूर था। 1906 में पियरे क्यूरी एक सड़क दुर्घटना में मारे गए। एक घोड़ा गाड़ी के नीचे आने पर उनका सिर फट गया। एक पल में सब कुछ बदल गया, 38 साल की मैरी अब विधवा हो चुकी थी। अब उसे केवल अपनी दो छोटी बेटियों की देखभाल करनी थी, बल्कि अपने काम को भी जारी रखना था। करीब सालभर तक अवसाद में रहने के बाद मैरी ने पियरे की कुर्सी संभाली। भारी विरोध के बावजूद मैरी अब सोरबोन यूनिवर्सिटी की पहली महिला प्रोफेसर बन चुकी थी।

पॉल लोंगेविन नाम का एक नौजवान, जो कि पियरे की लेब में उनका सहायक था, अब मैरी का शोध सहायक बना। मैरी जब भी पियरे को याद कर भावुक होती, लोंगेविन मैरी के कंधे पर हाथ रख उसे हिम्मत देता। हालांकि पॉल लोंगेविन मैरी से पांच साल छोटा और शादीशुदा भी थालेकिन अकेली और हताश मैरी,  लोंगेविन के जादूई आकर्षण से बच नहीं पाई। उनकी नजदीकियाँ बढ़ने लगीं, इस कदर कि सिर्फ लेब और यूनिवर्सिटी में ही नहीं, बल्कि पूरे शहर में इस अफेयर के चर्चे होने लगे।

जब बात लोंगेविन की पत्नी तक पहुंची तो उसने मैरी के घर जाकर फ़्रांस छोड़ने अथवा मरने के लिए तैयार रहने की धमकी तक दे डाली। इसी बीच एक निजी जासूस ने मैरी और लोंगेविन के प्रेम-पत्र चुरा कर प्रेस में सार्वजनिक कर दिए, जिससे पुरे फ़्रांस में खलबली मच गई। दरअसल उस ज़माने में पुरुषों को खुली छूट थी, लेकिन महिलाओं को नैतिकता के तराजू पर तौलना ज़रूरी समझा जाता था। प्रेस को एक गरमागरम मसाला मिल गया।  फ्रांस के समाचारपत्रों ने मैरी के खिलाफ अभियान सा शुरू कर दिया। वही महिला, जिसे कुछ वर्ष पहले राष्ट्रीय नायिका का दर्जा प्राप्त था, लोग अब उसके घर के बाहर जमा होकर खिडकियों पर पत्थर फैंकने लगे, गालियाँ देने लगे। उसे बदचलन औरत, पोलिश लालची महिला, घर तोड़ने वाली चुड़ैल और यहूदी कहकर अपमानित किया जाने लगा। अखबार और मेग्ज़ीनों में आए दिन उनके अफेयर और निजी पत्रों के नए-नए किस्से छपने लगे।

मैरी के जीवन में जब ये भूचाल आया, उसी वर्ष सन 1911 में उसे रेडियम एवं पोलोनियम को शुद्ध रूप में अलग करने के लिए रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला। मैरी दो अलग-अलग विज्ञानों में दो नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली व्यक्ति बन गईं। लेकिन मैरी को नोबेल के लिए नामित होने के लिए स्टॉकहोम से मिले पत्र को पढ़कर मैरी को ख़ुशी कमदुःख ज्यादा हुआ। पत्र में नोबेल की घोषणा के साथ उसे स्टॉकहोम समारोह में स्वयं उपस्थित होने का संकेत भी दिया गया था। दरअसल मैरी और लोंगेविन के अफेयर की खबर उस समय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोर चुकी थी, जिस कारण से नोबेल कमिटी पर समारोह में मैरी की उपस्थिति को रोकने का दबाव था। ये मैरी के जीवन का अब तक का सबसे बड़ा अपमान था। वो समारोह में नहीं जाने का फैसला कर चुकी थी, लेकिन अलबर्ट आईन्स्टीन सहित कुछ वैज्ञानिकों के समर्थन से मैरी का होसला बढ़ा। आखिरकार मैरी स्टॉकहोम पहुँचीं और अपना दूसरा नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया। उस दिन पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वैज्ञानिक समुदाय में अब उसकी ख्याति ओर बढ़ गई थी।

            मैरी ने लोंगेविन से अपने सम्बन्ध तोड़ लिए थे, वो अब धीरे-धीरे अपनी दुनिया में लौट रही थी। 1913 में अपने देश पोलेंड की राजधानी वारसा में मैरी का एक नायिका की तरह भव्य स्वागत हुआ। मैरी ने पेरिस में अलग से एक रेडियम संस्थान की भी स्थापना कर ली। 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान उसने अपनी प्रयोगशाला छोड़कर नर्स की सफ़ेद पोशाक पहनकर युद्धक्षेत्र का रुख किया। मैरी ने छोटी मोबाइल एक्स-रे इकाइयाँ विकसित कीं जिन्हें सैनिक "लिटिल क्यूरी" कहते थे। हजारों घायल सैनिकों की जान इन्हीं मशीनों से बच पायी। मैरी ने युद्ध के समय अपने संस्थान से एक बड़ी राशि और सोना फ़्रांस की सरकार को दान के रूप में दे दिया।

           जिस रेडियम का उपयोग भविष्य में कैंसर जैसी घातक बिमारियों के निदान और उपचार में होना था, वही रेडियम मैरी को धीरे-धीरे अंदर से गला रहा था। दरअसल  मैरी अक्सर लेब में काम करते वक्त रेडियम से भरी छोटी शीशी को अपनी जेब में रखा करती थी। रेडियम की नीली रोशनी देखकर वो सपनों में खो जाया करती। चमकता हुआ रेडियम उसकी सारी थकान मिटा देता। सोते वक्त भी वो शीशी को अपने पलंग के पास ही रखा करती थी।  रेडियोधर्मी पदार्थों के नियमित संपर्क में आने से उसे अस्थी मज्जा का एक भयंकर विकार हुआ, जिसे विज्ञान की भाषा मेंअप्लास्टिक एनीमियाकहा जाता है, जिसके चलते 1934 में 66 वर्ष की आयु में मैरी क्युरी का निधन हो गया। अगले ही साल उनकी बड़ी बेटी आइरीन को भी अपने पति के साथ संयुक्त रूप से 1935 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।

आज भी सड़क के किसी मोड़ पर जब चमकता हुआ रेडियम दिख जाता है तोरेडियम वाली मैडमसहसा ही आँखों में तैर जाती है, पसीने से भरी हुई, बिखरे हुए बाल, हाथ में लोहे की छड़ लिए गरम कड़ाहे को हिलाती हुई, जिसकी नीली आँखों से पानी रिस रहा है और जिसकी जेब में रखी शीशी से नीली रोशनी निकल रही है।

 

नीरज कुमार श्रीमाली
सहायक आचार्य (वनस्पति विज्ञान)
श्री गोविन्द गुरु राजकीय महाविद्यालय, बांसवाडा, राजस्थान
nirajkani81@gmail.com

अपनी माटी
( साहित्य और समाज का तिमाही दस्तावेज़ )
  Peer Reviewed & Refereed Journal , (ISSN 2322-0724 Apni Maati) Vol. 65, Issue Nu. 1, अप्रैल-जून 2026
सम्पादक : माणिक एवं जितेन्द्र यादव रचनात्मक लेखन सम्पादक : विष्णु कुमार शर्मा

7 टिप्पणियाँ

  1. Dr. Jayana upadhyay vyasजुलाई 28, 2026 11:37 am

    Congratulations on your excellent article! It is insightful, well-written, and thought-provoking. Your clear presentation and meaningful analysis reflect your dedication to quality research and academic excellence. Wishing you continued success and many more valuable contributions in the future. Best wishes!

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  2. विज्ञान कथा को बहुत ही रोचक भाषा में लिखा है, पढ़ कर आनंद आ गया। बहुत खूब। ऐसे ही लिखते रहिए।

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  3. घटनाओं को प्रस्तुत करने की शैली प्रभावशाली होने से सहज ही रोचकता उत्पन्न होती है। आपके इस प्रस्तुतीकरण के प्रभाव से ही मैं आपके अधिकांश आर्टिकल को पढ़ता हूं। ये न केवल आनन्द देते हैं बल्कि महत्वपूर्ण जानकारी भी उपलब्ध कराते हैं। लिखते रहें।👌👌🙏

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  4. उत्साहवर्धन के लिए धन्यवाद भाई साहब🙏

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