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'अपनी माटी' जुलाई-2013 अंक

Written By Manik Chittorgarh on सोमवार, जुलाई 15, 2013 | सोमवार, जुलाई 15, 2013

साहित्य और संस्कृति का प्रकल्प
अपनी माटी 
मासिक ई-पत्रिका 
जुलाई,2013 अंक 

अपनी माटी के मित्रो, पाठक और लेखक साथियो
नमस्कार

इस दौर को विकट कहकर माहौल को निराशाजनक करार देने का मेरा मन है नहीं। असल में चीज़ें जिस तरह से बदल रही हैं तो हमारे लिए कुछ साइड इफेक्ट्स को संभावित मानकर उन्हें दुरुस्त करने के बारे में सोचना ही समीचीन होगा। अच्छी ख़बर यह है कि एक तरफ जहां पत्र-पत्रिकाओं की संख्या में लगातार इज़ाफा हो रहा है और अंतरजाल के प्रभाव में अच्छे लिंक्स साझा करने की परम्पराओं से पाठकीयता भी बढ़ी है। वहीं हमारे आसपास के बदलते वातवरण में हम ये भी अनुभव कर रहे हैं कि पाठक अब ई-माध्यम से भी पूरी तरह वाकिफ़ हो रहे हैं। किताबें लगातार छप रहीं हैं। क़स्बों में भी वैकल्पिक प्रकाशन खुलने लगे हैं।ब्लॉग्गिंग, माइक्रो ब्लॉग्गिंग और सिटीजन जर्नलिज्म की अवधारणा ठीक दिशा में बढ़ रही है। फेसबुकी मंच से अपने मन की बात करने का एक खुला वातावरण बना है। लिखे की पहुँच पाठक तक कुछ आसान हुई  है। रचनाकार अपने पाठक से सीधे जुड़ाव को अनुभव कर रहा है। महत्वपूर्ण किताबें मिलना कुछ आसान हुआ है। ऐसे में सुखद भविष्य का ख़याल करना बुरी बात तो नहीं।

इसी सूचना और ज्ञान की बाढ़ में क्या पढ़े और क्या नहीं  के बीच अटके हुए कई लोगों के सामने चुनाव की समस्या आ खड़ी हुई  है। इस थकन भरी ज़िंदगी में किताबें कहाँ तक ज़रूरी हैं  का प्रशिक्षण दे तो कौन? अजीब तब लगता है जब शोध और अध्यापकी के काम में लगे साथी भी खुद को गैर-अपडेट आदमी की श्रेणी में सहूलियत भरा अनुभव कर रहे हैं। सरकारी नौकरी एक बार लगने के बाद सतत अध्ययन के बजाय प्रोपर्टी के धंधे में वे खुद को आरामदायक पाते हैं। कुछ तो बकरों, पाड़ों और मुर्गियों का धंधा भी स्कूल और कॉलेज के अध्यापन समय में से वक़्त निकाल कर निबटा लेते हैं। बच्चों को दो चार जुमलों में उलझा कर टच स्क्रीन  वाले एंड्रोयड फोन पर अंगुलियाँ फिराते हुए लपर-चपर करने लगते हैं। ऐसे दिशाहीन कमबुद्धि महानुभवों से आप कुछ भी आशा मत रखिएगा। वे पुस्तक मेले में जाने के बजाय माइक्रोमेक्स का केनवास मॉडल लाने को ज्यादा प्राथमिकता देंगे। खैर बढ़ती हुयी पुस्तकें पुस्तकालयों की अलमारियों से बाहर आकर  हवा भी खायेंगी  ऐसी आशा करने के अलावा हमारे पास कोई चारा भी तो नहीं है।

दुनिया जहां चिंतन और विमर्शों पर जोर दे रही हैं हम में से कई रोज़ाना के अखबार से ही आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। अफसोस ये भी है कि ट्रक और ट्रेक्टर छाप शायरी के बल पर स्वयं को रचनाकार समझने वाली नवोदित और उतावली पीढ़ी की स्थिति तो लाइलाज बीमारी के माफ़िक हो चली है। इसी जगह बात चली है तो कहने से क्यों चुकूं कि साहित्य जगत में भी कई टंटे हैं। रचनाकारों को बड़े और छोटे करने के प्रायोजित कार्यक्रम चलाये जाते हैं। तयशुदा मसलों को बहस के केंद्र में लाते हुए पत्रिकाओं में खींचातानी का माहौल है। मगर अच्छी बात ये है कि रचनाकारों के व्यक्तित्व को लेकर भी मसले आकार ले रहे हैं। एक आदमी जब इतना बड़ा हो जाए कि उसका जीवन एकदम सार्वजनिक नेतृत्वकर्ता की भाँत समझा जाने लगे तो उसके चरित्र को भी रचना के साथ जोड़ कर देखा जाना चाहिए। चरित्रहीन लेखक की ऊंची बातें पाठकों को लफ्फाज़ी से ज़्यादा भला क्या नज़र आएँगी। खैर ये दीगर मसला है। मुझे लगता है इस दौर में ही क्या हर दौर में सभी को इस कठिन  रास्ते में आलोचकीय दृष्टि की ज़रूरत होती है जो खुद का सही निरीक्षण कर रिपोर्ट कर सके ।एक तरफ मार्गदर्शकों का अभाव-सा है वहीं एक पीढ़ी गुरू के स्थान को नगण्य करार देती हुयी स्वयं को सम्पूर्ण मानने की जिद पर अड़ी है। इन्हीं तमाम बातों और बिन्दुओं के बीच सफ़र, चिंतन और चिंताएं जारी है।

अपनी माटी के मासिक होने के बाद हम ये चौथा अंक आपकी नज़र करने जा रहे हैं। इस अंक में पढ़ने लायक सामग्री के रूप में कुछ संजोने का प्रयास किया है। कलकत्ता की शोध छात्रा रचना शुक्ला(पाण्डेय) का एक शोध आलेख, अशोक कुमार पाण्डेय के कविता संग्रह पर डॉ राजेन्द्र सिंघवी की टिप्पणी, युवा साथी त्रिपुरारि कुमार  की कवितायेँ ख़ास हिस्सा हैं। वरिष्ठ साथी चंद्रेश्वर जी और युवा चित्रकार मुकेश शर्मा का अपनी माटी में जुड़ना आगे भी रंग लाएगा ऐसा हमारा मानना है।पहली बार शामिल हो रहे साथियों में कौटिल्य भट्ट और सोहन सलिल का स्वागत है। डॉ ममता कुमारी और जाहिद खान की लिखी समीक्षाएं भी अंक का मान बढ़ाएंगी। अभिनव प्रयास के रूप में इसी अंक में पीडीफ संस्करण के रूप में हम डॉ सत्यनारायण व्यास की प्रकाशित पुस्तकों के लिंक साझा कर रहे हैं।

हमारे हल्के-फुल्के सम्पादन का आनंद लिजिएगा। हो सके तो अपने राय भी भेजें। सफ़र में साथ रहने के लिए आप सभी का शुक्रिया।साथ बने रहिएगा।


जुलाई-2013 अंक एक नज़र में
  1. सम्पादकीय:करिए छिमा
  2. झरोखा:फणीश्वरनाथ रेणु
  3. कविताएँ:चंद्रेश्वर
  4. कविताएँ: त्रिपुरारि कुमार शर्मा
  5. ग़ज़ल:सोहन सलिल
  6. ग़ज़ल:कौटिल्य भट्ट ‘सिफ़र’
  7. शोध आलेख:डॉ.नगेन्द्र कीआलोचना में प्रगतिशील मूल्य / रचना शुक्ला (पाण्डेय)
  8. आलेख:फणीश्वरनाथ रेणु:-हर कहानी में नये शिल्प का प्रयोग
  9. समीक्षा:‘समय की धारा का कवि- अशोक कुमार पाण्डेय’
  10. समीक्षा:पहचान के संकट पर एक दस्तावेज़ उपन्यास 'पहचान'
  11. टिप्पणी:चित्रकार मुकेश शर्मा की कृतियाँ
  12. टिप्पणी:लोक संस्कृति को बाजारवाद से बचाना जरूरी हो गया है
  13. टिप्पणी :बदलते ग्राम्य और शहरी जीवन के गीत Vaya टुकड़ा कागज़ का (गीत-संग्रह)
  14. पीडीफ संस्करण:डॉ सत्यनारायण व्यास
   डॉ. सत्यनारायण व्यास 
अध्यक्ष
अपनी माटी संस्थान
29 ,नीलकंठ,छतरी वाली खान,सेंथी, चित्तौड़गढ़-312001,
राजस्थान-भारत,
info@apnimaati.com

 अशोक जमनानी
सम्पादक
अपनी माटी पत्रिका 
 सतरास्ता,होटल हजुरी,
होशंगाबाद,
मध्यप्रदेश-भारत
info@apnimaati.com

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2 टिप्‍पणियां:

  1. जुलाई के अंक में कहानिया और लघु कथा की कमी हे

    उत्तर देंहटाएं
  2. कोई बात नहीं, अगस्त के अंक में मेरी एक दिलचस्प कहानी 'अन्ना की रैली में...' प्रकाशित हो रही है। कहानी ज़रूर पढ़िएगा और प्रतिक्रिया भी दीजिएगा। कहानी पाखंडी जनता के कुकृत्यों का भांडाफोड़ किया गया है। एक ओर तो लोग अन्ना जैसे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ राजनीतिक परिवर्तन लाने की अगुवाई करने वाले नेताओं का साथ देने का स्वांग खेलते हैं तो दूसरी ओर उसी नेता के नाम पर अपने बेईमान इरादों को भी मूर्त रूप देना चाहते हैं। दरअस्ल, जनता ही सबसे ज़्यादा भ्रष्ट है। आप कहानी पढ़कर इस सच्चाई को नकार नहीं सकते हैं। सादर...

    उत्तर देंहटाएं

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